.
 

रुबल नहीं आया -- जगदीश बाली

0 comments

 कहानी


मंगलू चाचा का मकान गांव में से गुज़रते रास्ते से सटा हुआ था। मिट्टी, कंकर-पत्थर से बना मकान था। छत बड़ी-बड़ी अलग-अलग आकार की स्लेटों को बेतरतीब जोड़कर बनी थी। बस दो मंज़िलें थी- धरातल और ऊपर वाली मंज़िल। ऊपर की मंजिल के आगे लकड़ी के तख्तों का खुला बरामदा था। बरामदे में एक चौरस खोल था। बरामदे में आने-जाने के लिए इस खोल से एक तंग लकड़ी की सीढ़ी लगी थी। इस सीढ़ी पर सर झुका के चढ़ना-उतरना पड़ता था। निचली मंजिल में तीन कमरे थे जिनकी ऊंचाई छ-सात फ़ुट के आसपास थी। मंगलू खेती बाड़ी करता था और एक कमरे में उसके बैल बंधे होते थे। दूसरे कमरे में चाचा की रसोई थी। तीसरे कमरे में चाचा की छोटी सी दुकान थी। ऊपर के कमरों में चाचा और उसका बेटा रुबल सोते थे। एक कमरा मेहमानों के लिए भी था। एक छोटी सी दुकान चलाते थे मंगलू चाचा। खेतों में काम न होता, तो चाचा बरामदे में बैठते और ग्राहक आने पर उतर कर दुकान पर आ जाते। चाचा बीड़ी-तंबाकू बेचते थे। साथ में बच्चों के लिए टॉफी और छोटी-छोटी मीठी गोल-गोल गोलियां भी, जिन्हें हम अंग्रेज़ी मिठाई कहते थे, रखी रहती थी। 10 पैसे में 9 आ जाती थीं। मंगलू चाचा कभी-कभी 10 भी दे दिया करते थे। दुकान पर कंचे और गुड़ भी रखा रहता था। गांव के बच्चे कंचे खरीद कर निकट ही खेला करते थे और गुड़ का आंनद भी लेते। उस ज़माने में गुड़ किसी शाही मिठाई से कम न होता था। बच्चे गुड़ को बड़े चाव व खुशी से एक दूसरों को चिढ़ा-चिढ़ा कर चाटते और खाते। बस इतना सा सामान बेचते थे मंगलू चाचा। कमाते कुछ नहीं थे, न कमाने का लालच था उनमें। लोगों व बच्चों का आना-जाना लगा रहता। मंगलू का एक बेटा था। रुबल नाम था उसका। रूबल को जन्म देते समय मंगलू की पत्नी की मौत हो गई थी। पत्नी की मौत पर बहुत रोया था मंगलू। पर इसे नियति मान कर मंगलू बहुत लाड़-प्यार से रूबल को पाल-पोस रहा था। यूं कहिए रूबल के लिए मंगलू मा-बाप दोनों थे। वो बड़े शौक से उसे पढ़ा लिखा रहे थे। अगले वर्ष उसे डॉक्टर बनने शहर भेजना चाहते था। मंगलू राह गुज़रते लोगों को राम-राम कहते और थोड़ी घड़ी बैठने का इसरार ज़रूर करते। कहते, "अरे काम वाम तो होता रहेगा। तनिक बैठ कर कुछ गप-शाप करते हैं।" वो उन्हें चाय, बीड़ी, तंबाकू भी पेश करते। किसी को रुपए-पैसों की ज़रूरत होती तो चाचा तुरंत दे देते। मंगलू को यह सब बहुत अच्छा लगता। ये सब करने के बाद उनके दिल को सकून मिलता और चेहरे पर संतोष की आभा झलकती। राह से गुजरने वाला हर कोई मंगलू की आओभगत, अपनेपन व स्नेह के कायल थे। एक बार जब चाचा बीमार हुए थे, तो पूरा गांव खड़ा हुआ था उनकी तीमारदारी के लिए। चाचा खेती-बाड़ी भी करते थे। घर की ड्योढ़ी के साथ मंगलू चाचा ने एक पोस्टर मेख से फंसा कर लटका रखा था। इस पोस्टर में एक स्त्री हाथ जोड़ कर खड़ी दिखती थी और इस पर 'स्वागतम' लिखा होता-  मंगलू की स्नेहशीलता और आओभगत से बिल्कुल मिलता जुलता पोस्टर। 

रूबल ने 12वी कक्षा अच्छे अंको में पास कर ली। पूरे 90 प्रतिशत अंक लिए थे उसने। मंगलू बहुत खुश था। उसे अपना सपना साकार होते दिख रहा था। उसने रूबल को प्री-मेडिकल टैस्ट की कोचिंग के लिए चंडीगढ़ भेज दिया। रूबल ने यह टैस्ट पास किया और उसे इंदिरा गांधी मैडिकल कॉलेज शिमला में दाखिला मिल गया। इधर रूबल डॉक्टरी का कोर्स पूरा करने के लिए मेहनत कर रहा था और उधर मंगलू चाचा उसके डॉक्टर बनने की बाट जोह रहे था। वह छाती-फैला कर कहता, 'अपना बेटा डॉक्टर बनेगा। देखना मुझे बुढ़ापे में भी बीमार न होने देगा।' रूबल ने डॉक्टरी का कोर्स पूरा किया। जब वह घर आया था, तो पूरा गांव उसे देखने के लिए उमड़ पड़ा था। आखिर गांव का पहला डॉक्टर था रुबल। सब कहते, "भई मंगलू चाचा की तपस्या रंग लाई। कोई कमी न रखी है उसने बेटे की परवरिश व लिखाई- पढ़ाई में।" ऐसा लगा जैसे रूबल मंगलू चाचा का ही नहीं, बल्कि पूरे गांव का बेटा है।

रुबल शहर से अपने बाबा के लिए एक सैल फोन भी लेता आया था। गांव में यह नई चीज थी। उसने चाचा को इसका इस्तेमाल करना भी सीखा दिया।

रूबल जब शहर जाने लगा, तो मंगलू चाचा से बोला, "बाबा मैं अमेरिका जा कर डॉक्टरी का पेशा करना चाहता हूं। वहां बहुत पैसा है।" यह सुन कर चाचा चुप हो गए। सोचने लगे कि बेटा अमेरिका चला जाएगा, तो वो बिल्कुल अकेले हो जाएंगे। रूबल समझ गया। वह बोला, "बाबा, चिंता मत करो। तीन-चार साल में लौट आउंगा। तब तक काफी पैसा कमा लूंगा। हर महीने तुमको फोन करता रहूंगा और हर साल आता रहूंगा। लौट कर यहीं डॉक्टरी करूंगा।' चाचा कुछ देर कुछ न बोले। फिर मुकुराते हुए कहने लगे, "ठीक है बेटा। कुछ सालों की तो बात है।" रूबल शहर चला गया। कुछ दिनों बाद उसे अमेरिका से ऑफर भी आ गया। रूबल अब अमेरिका में डॉक्टरी कर रहा था। उधर मंगलू चाचा गांव में अपना खेती बाड़ी का काम करते रहे और दुकान भी चलाते रहे। रूबल का फोन पहले तीन-चार महीने तो लगातार आते रहे। फिर फोन का सिलसिला कम होने लगा। एक साल बाद फोन आने लगभग बंद हो गए। एक दिन रूबल का व्हाट्सएप पर मैसेज आया, "बाबा मेरी शादी की चिंता न करना। मैने शादी कर ली है।" अपनी गोरी मैम साहिबा का फोटो भी भेजा था उसने। चाचा बहुत दुखी हुए थे उस दिन। रूबल ने पहले बताया तक नहीं शादी के बारे में। चाचा खुद को दिलासा देते रहे और मन को मनाते रहे, 'वक्त ही नहीं मिला होगा बताने का। व्यस्त जो इतना रहता है।'

पर मन ही मन बहुत दुखी रहने लगे थे चाचा। लोग रूबल के बारे में पूछते तो अपना दुख छुपाते हुए कहते, "बस आने ही वाला है कुछ हफ्तों में।" फिर एक दिन अचानक मंगलू चाचा बिमार हो गए। बेटे को सूचना भेजी गई, पर जवाब आया, "अभी छुट्टी नहीं है। नज़दीक के किसी डॉक्टर को दिखा लो।" यह जवाब पा कर पूरा गांव सन्न था। सब आपस में बुदबुदाते, "सोचा न था मंगलू का रूबल भी ऐसा निकलेगा। ये है आज के वच्चों को पढ़ाने-लिखाने का नतीज़ा। इससे अच्छे तो हम रहे भैया। पढ़ा न सके अपने बच्चों को, पर हैं तो हमारे पास ही न। दुख-सुख में साथ तो हैं।" जब रूबल नहीं आया' तो गांव वाले मंगलू चाचा को शहर के डॉक्टर के पास ले गए। मंगलू को ट्यूमर हो गया था। ट्यूमर अंतिम स्टेज पर था। डॉक्टर ने कह दिया, "बचना मुश्किल है। घर पर ही सेवा करो।" गांव वाले मंगलू को घर ले गए। खूब तीमारदारी की थी गांव वालों ने मंगलू चाचा की। फिर एक सुबह मंगलू चाचा ये कहते हुए चल बसे, "मेरा रूबल नहीं आया।" रूबल को उसके पिता के देहांत की खबर दे दी गई। इस बीच गांव वाले मंगलू चाचा के दाह संस्कार की तैयारी करने लगे। एक दूसरे से कहते, "पता नहीं भैया रुबल आता भी है या नहीं।" उधर मंगलू चाचा की अर्थी अपने बेटे के कंधों का इंतज़ार कर रही थी। खैर गांव वाले मंगलू चाचा की अर्थी ले कर शमशान घाट की ओर चल पड़े। एक के बाद एक कंधा अर्थी को कंधा देने आ रहा था, परंतु जिन कंधों को होना चाहिए था, वे अभी कहीं और व्यस्त थे। चाचा की अर्थी को चिता पर लिटा दिया गया और जल्द ही उनका मृत शरीर पंच तत्वों में विलीन हो गया। गांव वाले अस्थियों को इकट्ठा कर रहे थे ताकि गंगा में बहायी जा सके। तभी रूबल अपनी मैम साहिबा के साथ पहुंचता है। उन्हें देख अस्थियां इकट्ठा कर रहे दो-तीन गांव वाले कहने लगे, "आ गए बेटा। तुम्हारे बाबा तो रहे नहीं, बस उनकी अस्थियां बची हैं। वक्त है तुम्हारे पास इन्हें गंगा में बहाने का?" रुबल अस्थियां ले लेता है, पर कोई जवाब नहीं दे पाता। गांव वाले मंगलू चाचा का क्रिया-कर्म सब पूरे विधी-विधान व शास्त्रानुसार करते हैं। रुबल अस्थियां गंगा में बहाने के बाद गांव आता है। उसके साथ शहर का एक  बड़ा 

प्रॉपर्टी डीलर भी आता है। रुबल चाचा की सारी ज़मीन व पुश्तैनी घर उसे बेच देता है।  प्रॉपर्टी डीलर उसे 50 लाख का चैक देता है। इन्हीं 50 लाख में कहीं पुश्तैनी संस्कार व जज़्बात भी बिक जाते हैं। चाचा के खेतों की जगह अब बहुत बड़ा फार्म हाउस है। पुराने मिट्टी के घर की जगह एक आलीशान भवन है जिसके गेट पर 'स्वागतम' करती महिला के पोस्टर की जगह एक लोहे की तख्ती लटकी है, जिस पर लिखा है "कुत्तों से सावधान।"

Read more...

कहानी : रिश्ते का कत्ल ---- नन्द लाल भारती

0 comments

 


सुखी भईया काहें मुंह गिराये बैठो हो । कुछ कामधाम करना नहीं हैं का आज।

खुशी भैया जब दिल ही टूट गया तो काम कर क्या करेंगे।दो वक्त की दो रोटी चाहिए परमात्मा की कृपा से उतना कमा लिए हैं। जीवन बीत जायेगाभूखे मरने की नौबत नहीं आयेगी।

एकदम से तुमको क्या हो गया ?   कैसी बहकी बहकी बातें कर रहे सुखी।तुम्हारे सपनों का क्या होगातुम्हारे जैसे सपने बोने वाले  निराशावादी बन जायेंगे तो ? ऐसी क्या बात हो गई कि दिल टूट गया । दूसरों को रोशनी दिखाने वालेअंधेरे का मुसाफिर क्यों बन रहे सुखी भैया खुशी बोले ।

बहू ने अरमानों का कत्ल कर दिया हैडर है कि यह विपदा किसी मोढ़ पर सांस भी न छिन ले ।

कौन सी बहू की बात कर रहे हो ?

खुशी भैया एक ही तो बहू आई है। छोटे का तो अभी ब्याह करना बाकी है।बड़ी बहू ने तो आते ही नरक का दुख देने लगी है।

क्या कह रहे हो सूखी,खुशी माथा ठोकते हुए बोला ।

सच कह रहा हूँ खुशी भैय्या पांच साल से कभी पूरी नींद नहीं सो पाया हू,रमन की मां के तो आंसू सूख गए हैंआंखें पथरा सी गई है सुखी बोला ।

शादी के पहले तो सती सावित्री बन रही अब डायन हो गई खुशी बोला ।

हां......भैया ना जाने किस जन्म का पाप भोग रहा हूँ। शादी के तुरंत बाद ही बहू कैकेयी का यौवन धारण कर ली थी।ठगिनी बहू और उस के लूटेरे मां-बाप ने ना जाने कौन सा ऐसा मन्त्र रमन के कान में फूंक कर  रमन को भी  दिया है ।रमन को तनिक परिवार की सूधि आती है तो साईको बहू तरह-तरह के टार्चर खुद करती हैअपने मां -बाप से करवाती है। बेटा हाथ से निकलता जा रहा है खुशी भैया ।

शादी से पहले तो बड़ी तारीफ कर रहे थे एकदम से सब कुछ उलटा कैसे हो गया ?

खुशी भैय्या जो कुछ बतायादिखाया सब झूठ निकला। बहू का बाप खुद को बडी कम्पनी के सामानों का डिस्ट्रिब्यूटर बताया था,लड़की को पोस्टग्रेजुएट और प्रोफेशनल ग्रेजुएट बताया था पर निकला सब कुछ झूठ ।

सुखी बाबू ठग गिरोह के झांसे में आकर कर लिए  बिना दहेज की शादी करने का वादा,देखो तुम्हारी वफा का क्या सिला दिया ठगों। 

खुशी भैया इल्जाम मत मढ़ो। काश मै बेटों के बचपन मे अपने किए  बिना दहेज की शादी करने का मित्र से वादा तोड़ दिया होता तो ऐसे दुर्दिन नहीं आते ।

वादा किया है तो निभाना भी चाहिए,भले ही पुर्जे-पुर्जे टूट जाओ ? खुशी आधे मुसकियाते हुए बोला ।

हंस लो खुशी भैया। मैं आदमी को पहचान नहीं पाया। तुम क्या सब हंसते हैं। कहते हैं बड़ा समाज सुधारक बनने चला था।दूल्हा बाजार मे दस लाख कीमत थी पर लात मार करदेखो खुद टूट कर बिखर गये।खुशी भैय्या उम्मीद है बेटा वापस आयेगाभले ही अछूतानंद की समाधि से अवैध कमाई करने वाले ठग की बेटी ना आये ।

 तुम्हारा समधी किसी खतरनाक गिरोह का आदमी है क्या खुशी पूछा।

भैया समधी मत कहो। रिश्ते के नाम पर कलंक है फरेबरतनघातक , उसकी घरवाली रामकुमारी और उसका परिवार।इस इंसान ने बेटे को बंदूकअसलहातलवार और दहेज के केस मे पूरे परिवार को जेल भेजवाने का डर दिखाकर मेरे परिवार का बागी बना दिया है।चार बेटियों और एक बेटे का बाप फरेबरतन हमारे कत्ल की धमकी भी फोन पर दिया। बेटे पर दबाव बना रहा है कि वह आधा दर्जन बच्चों की पढाई लिखाईब्याह का खर्चा उठाये। रिश्ते के दुश्मन को समधी कहना गाली लगता है।फरेबरतन शादी के दिन से ही तन्त्र मन्त्रसम्मोहन,ना जाने और क्या जादू टोना कर बेटवा के दिलोदिमाग पर कब्जा किये हुआ है।समझाने की कोशिश करता तो कहता अभिलाषा के साथ समन्दर मे कूद कर जान दे दूंगा।डायन अभिलाषा और उसके मां बाप ने हमें सौतेला मां बाप साबित कराने का भी प्रयास किया,इसके लिए डायरी भी तैयार करवाई गयी थी। ठग फरेबरतन की विषकन्या के इश्क मे रमन इतना डूबा की खुद को भूल गया। यही तो ठग परिवार चाहता था। पूरी तनख्वाह और बचत पर विषकन्या का कब्जा हो गया। फरेबरतन ने अपनी बेटी को रमन की सेरोगेटवाईफ बना दिया।रमन की कमाई विषकन्या से लूटवाकर दो मंजिला मकान खड़ा कर दिया।बेटा तंगहाली मे रहता है । दो वक्त की रोटी को मोहताज फरेबरतन की विषकन्या ऐय्याशी लाइफस्टाइल इंज्वॉय कर रही है ।भैय्या खुशी सेरोगेट डाटर- इन- ला अभिलाषा ने परिवार का ही नहीं अब बेटे का भी जीवन नरक बना दिया है।

रमन को ठग की बेटी से जितना जल्दी छुटकारा मिले ले लेना चाहिए । एक बात कहूं सुखी भैया नाराज नहीं होना खुशी बोला ।

अरे भैया बोलो नाराज क्यों होऊंगा ।

देखो तुम्हारा रमन बहू की नाक में पहले नकेल डाल देता तो ये साइको सेरोगेट बहू इतनी तो बेकाबू नहीं होती। बेटा साइको को सिर पर चढा कर खुद के पैर में कुल्हाड़ी मार लिया है।रुपया से जब तक सेरोगेट वाईफ का मुह भरता रहेगा तब मौन रहेगीजैसे ही कमी किया बौरा जायेगी। साइको को अपनी गृहस्थी की चिंता नहीं लगती हैपति की कमाई छिन कर मां बाप को अमीर बनाने पर तूली हुई है खुशी बोला।

भैया ये सब तुम को कैसे मालूम ?

भैया कान्हपूरिया बहू लाये होअक्सर कान्हपूरिया बहूये ऐसा ही करती हैं। तीन लोगों को जानता हूँ जो कान्हपूरिया बहू खुशी-खुशी लाये पर अब रो रहे हैं। एक बिजनेसमैन ने तो सिर्फ अस्सी लाख बहू भोज पर खर्च किया पर बहू आते ही घर का सुख चैन छिनने लगी आखिरकार तलाक हुआ इसके लिए बहुत मोटी रकम ली थी।तुम्हारी तो लूटेरे मां बाप की बेटी तलाक भी नहीं देगी भले चिल्ला चिल्ला कर तलाक मांगती रहे पर रमन का पीछा एक मिनट के लिए भी नहीं छोड़ेगी ।

 

 

हां भैया खुशी  मैं भी यह बात समझ गया हूँ। उसके मां बाप का हमारे परिवार में शादी करने का मकसद सिर्फ बेटे की कमाई ऐंठना और प्रापर्टी हड़पना भी हो सकता है।एक मां बाप इतने कसाई हो सकते हैं ? बेटी की पहली डिलीवरी मायके मे होती हैखर्च मायके वाले करते हैं। ये कसाई लोग बेटे की सारी जमा पूंजी दस लाख से उपर लूट लिए। अपने घर को अच्छा लूक देने के लिए घर की रिपेयरिंग पहली मंजिल का घर बनाने के लिए और कलर करवाये वह भी दमाद की आंख में मिर्च छोक कर सुखी बोला।

खुशी माथा ठोंकते हुए बोला मेरे पिताजी ने मेरा परिवार बर्बाद होने से बचा लिए ।

वो कैसे सुखी बोले ?

पिताजी मरने से पहले आगाह कर दिये थे,बेटा मेरे पोतों की शादी भले ही अन्तर्जातीय कर देना पर कान्हपूरिया बहू मत लानामैंने वही किया वरना मुझे कण्डे से आंसू पोछना पड़ता खुशी बोला।

काश मेरे पिताजी को भी ऐसी जानकारी रही होती कहते हुए सुखी गमछा से आंसू छिपाने लगा।

भैया सुखी तुम फरेबरतन घातक जैसे शिकारी के जाल में कैसे फंस गए खुशी बोला ।

अतिसंवेदनशील होनाबर्बादी का कारण बन सकता है और यही हमारे साथ हुआ। ठग फरेबरतन घातक फेंक तो बहुत ऊंची ऊंची रहा था कि मेरा बड़ा शोरूम हैकई लोग काम करते हैं।उस फरेबी का सफेद झूठ तो मेरे समझ मे आ गया था।चार बेटियों के बाप पर दया आ गईमैंने सोचा मुझे बिना दहेज की शादी करनी हैइसकी अमीरी से क्या लेना।दूसरे वह पहली बार ही बेटी को साथ लेकर दिखाने मेरै घर आया था। हम बहुत संवेदनशील हो गए और मना नहीं कर पाये । मै अपनी अतिसंवेदनशीलता के बदले आज आंसू गार रहा हूँ,ठग चोर की बेटी ने जीवन नरक बना दिया है  सुखी बोला ।

बेटी को तुम्हारे घर आकर दिखाना पासा की चाल थी। खैर अब तो लूट गए दोस्त। अब तलाक ही निदान है पर तुम यह भी नहीं कर सकते खुशी बोला।

गोद के बच्चे का भी भविष्य देखना है। खैर बच्चा तो ठग की बेटी ने सिर्फ पैसा ऐंठने के लिये शायद लेबरपेनरहित आपरेशन से पैदा की  है। लेबरपेन वह क्या जाने । रमन को गाली दे रही बचवा को तेरी मां ने पैदा किया हैबहुत मोहगर बन रही है।डायन कभी डायपर बदली न कभी  छाती से दूध बच्चे को पिलायी।बच्चे को रुलाने के लिए उसके गले में उंगलियां घुसा देती,बच्चा तिलमिला कर उल्टी करने लगतासोते वक्त बच्चे को चिकोटी काटती रहतीतरह के अत्याचार फूल जैसे बच्चे पर करती है। वही उसी बच्चे को मोहरा बना रमन की कमाई पर नागिन की तरह फन काढे बैठी हैं। मांं-बाप के लिए खुद मोहरा बनी बैठी हैमेरा बेटा और परिवार त्राहि त्राहि कर रहा है सुखी बोला ।

तुम्हारी अभिलाषा बहू है या बहू के रुप मे डायन ?

डायन ही मान लो,जो पत्नी पति से बच्चे का डायपर बदलवाये,छाती से दूध न पिलाये,पलंग पर पड़ी रहे,पति से घर का काम करवाये,अंग्रेजों के जमाने के जेलर की तरह पति का टार्चर करे ,अपने ठग-गुण्डे  मां- बाप से करवाये,नवजात  बच्चे का टार्चर करे,सास-ससुर,ननद,देवर और परिवार की इज्ज़त को सड़क पर लाकर नंगी  कर बेइज्जत करने की धमकी दे,पति को लूटकर बाप की तिजोरी भरे ,सास-ससुर की की कमाई पर गिद्ध दृष्टि लगाये हो तो ऐसी बहू को डायन नहीं तो क्या कहेंगे सुखी नजरे झुकाये  हुए बोला ?

ये बहू तो बड़ी जालिम निकली,तुम्हारे सपनों को जलाकर राख कर दी । बहू के मां बाप नटवर लाल लगते हैं खुशी बोला ।

हां भैया ठीक ही कह रहे हो,बच्चों में  संस्कार तो मां- बाप से ही आते हैं।     शादी जब से हुई है तब से घर नहीं आई। मेरे पिता जी मर गए,मेरी पत्नी सर्प दंश की शिकार हुईमहीनो बीमार रहीमर कर जीयी,मै खुद अस्पताल मे भर्ती रहा पर न तो डायन बहू और न उसके ठग मां बाप कभी हालचाल पूछे।ठग परिवार जीवन का श्राप बन गया है सुखी बोला ।

खुशी-इस श्राप से मुक्ति तो बस तलाक है।

यही तो सब चाह रहे हैं पर ठग की बेटी खून चूस रही हैजब से आई तब बस परिवार के खिलाफ सबूत इकट्ठा कर रही है।बचवा का बाल उतरवाने के लिए रमन गांव ले गया था। बाल उतरवाने के बाद तो बड़ा बवाल मचा दी। चौराहे पर खड़ी होकर चिल्ला रही थी देखो गांव वाले सब परिवार वाले मिलकर कर मार रहे हैं। थाने जा रही हूँ कहते हुए एक कमरे मे घुसी और अन्दर से दरवाजा बंद कर लीलोगों को लगा आत्महत्या न कर ले घण्टों की मसकत के बाद दरवाजा खुलाइसके बाद बेटा और भाई उसके बाप के घर कान्हपुर छोड़ आये। इसके बाद अपने बाप को रमन से वसूली के लिए भेजी शायद बेटा पैसा नहीं दिया । वसूली करने आया उसका बाप खाली हाथ वापस चला गयाखाली हाथ लौटने की खबर सुनकर बेटा की सेरोगेट वाईफ अभिलाषा पगला गई । काकी सास सुजाता को फोन पर बहुत गंदी गंदी गालियां दी थी जबकि बेचारी सुजाता अपने सगे भाई की मौत संस्कार मे मायके मे थी।

बाप रे ऐसी बहू किसको बर्दाश्त होगी  खुशी माथा ठोंकते हुए बोला ।

भैया ना जाने किस अनजाने अपराध का दुख भोग रहा हू। बड़े अरमान से बहू को बेटी का दर्जा दिया था।पांच साल हो गए वह न घर आती है न रमन को आने देती हैउसके फोन पर पहरा लगाये रहती है। चार दिन कान्हपुर रही चालीस बार तलाक की धमकी दे चुकी है,सुना है बेशर्म चरित्रहीन मां बाप की बेटी मदलोर पहुंच गई है।रमन को वह पति नहीं एटीएम समझती है सुखी सुबकते हुए बोला।

सुखी भैय्या जिस फरेबरतन और उसकी पत्नी रामकुमारी ने तुम्हारे हिस्से का बेटा का सुख बहू का सुख और पौत्र का सुख लूटा है ईश्वर इस दगाबाजों को सात जन्म तक इन सुखो से कोसों दूर रखेंयह मेरा श्राप है।

सुखी भैया क्या कह दिये ?

रिश्ते का कत्ल करने वालों को क्या कहे ?

अपनी साइको बेटी को तुम्हारे बेटे से धोखे मे रखकर ब्याह कर परिवार का सुख लूट लिया है ,देखना तुम्हारे खून पसीने की कमाई पर कोई साजिश कर कबजिया न ले खुशी बोला ।

हां भैया डर तो यह भी है। बदमाश बेटवा को  किसी साजिश के तहत् मदहोश कर हमें पागल घोषित करवा कर बुढापे का आसरा न छिन ले। बेटवा सुखबहू का सुखपौत्र का सुख परिवार के चैन पर  फरेबरतन ने कब्जा तो कर ही लिया है ।अब तो साइको बहू बेटा रमन को लूटने के लिए  पौत्र को मोहरा बना रही है। बेटा क्या परिवार  के सभी लोगों को बचवा से बहुत प्यार करते हैं।  हम बदनसीब को बचवा को जन्म से लेकर आज गोद मे खिलाने अंगुली पकड़ कर चलने

 तरस रहे है।साइको बहू और उसके दगाबाज मां बाप को रिश्ते मे नहीं बेटवा को लूटना  और सम्पत्ति मे दिलचस्पी है।

बाप रे क्या मां बाप हैं  अपनी ही ब्याहता बेटी को सेरोगेट डाटर-इन-ला,सेरोगेट वाईफ और  सेरोगेटमदर बनाकर पवित्र रिश्तों का कत्ल कर ।

नन्द लाल भारती

 

 

Read more...

कविता --- बोधिस्‍तव कस्‍तूरिया.

0 comments

 महात्मा गाँधी और लाल बहादुर  के जन्मदिन पर


है शपथ हर.भारतवासी को उनके जीवन बलिदान की।

सत्य,शान्ति और अहिंसा पर जो हुए सदा न्यौछावर,

नव भारत निर्माण हेतु चलाए गए उनके अभियान की।।

विश्व शांति के उन्ही मानदंडों की शपथ तुम्हैं भारतवासी

भर्ष्टाचार और शोषण मुक्त समाज के उनके अरमान की।।

न रहे कोई वर्ग शोषित,दलित,पिछड़ा  भारतीय समाज का,

नही ज़रूरत बर्बर बाबर और चंगेज़ी औरंगजेब संतान की।।

बुद्ध और महावीर की धरती सदा नमन करती है तुमको,

रहे सदा दम्भ हमे, शांति दूतों के गौरवशाली बलिदान की।।


बोधिस्‍तव कस्‍तूरिया

Read more...

कहानी :अपराधिनी -- नन्द लाल भारती

0 comments


वैभव बाबू और गरिमा के पुत्र कनक का ब्याह
  अशुद्ध रतन  और अपवित्रा की बेटी आख्या के साथ बड़ी धूमधाम से सम्पन्न हुआ था । वैभवबाबू ने बेटे के ब्याह मे दिल खोल कर खर्च किया परन्तु दहेज एक पैसा नहीं लिये। हां   आख्या को दहेज मे एक बड़ी पीतल की परात और पांच तगारी फल के अलावा और कुछ नहीं मिला,गहना गुरिया तो अशुद्ध रतन के बूते की बात भी नहीं थी। शेखी ऐसी जैसे बावन बीघा पुदीना बोये हो। खैर वैभव बाबू को एक सुलक्षणा बहू चाहिए थी जो घर परिवार की जिम्मेदारी सम्भाल ले। वैभव बाबू दहेज न लेने की कसम तो कनक के जन्म के बाद ही ले लिए थे।

आख्या देखने तो आधुनिक लग रही थी पर उसने जो लक्षण दिखाये निहायत पारिवारिक थे। गरिमा को पूरा विश्वास हो गया कि आख्या के हाथ में परिवार और मर्यादा सुरक्षित रहेंगे। बातों पर यकीन कर वैभव और गरिमा ने हामी भर लिया था,और कनकबाबू ने भी अपनी सहमति की मुहर लगा दिया था।कनक को तो लगाना ही था अपनी सहमति की मुहर ।

 

आख्या से वैभव बाबू और उनके कुटुम्ब को बड़ी उम्मीदें थी। आख्या ने भी वादा किया था।आख्या के ब्याह के महीने भी नहीं बीते थे कि उसके सारे स्वांग धूल गए वह अपने असली रूप मे आ गई। सास-ससुर ननद-देवर पर इल्जाम लगाने लगी । राक्षसी प्रवृति वाली आख्या घर परिवार का चैन छिनने लगी । दो रोटी भी नहीं बनाती कहती मै सास-ससुर को रोटी बना कर खिलाने नहीं आयी हैं। जिस घर मे खुशियां थी अपराधिनी आख्या ने दर्द देना शुरू कर दिया। गरिमा की आंखें आंसुओं से लबालब भरी रहने लगी।आख्या आत्महत्या की धमकी देने लगी, वैभव बाबू का एच आई जी का मकान झोपड़ी लगे लगा।लाख रुपये महीना तनख्वाह पाने वाले वैभव भीखारी लगने लगे।

आख्या के पागलपन के दौरे से वैभव बाबू और गरिमा का जीवन महीने भर में नरक जैसा हो गया। आख्या को   ननद रोशनी और देवर चमन फूटी आंख नहीं भा रहे थे। समाज मे प्रतिष्ठित वैभव बाबू को भीखारी देवर को गुण्डा और ननद को चोरनी कहने लगी।

 

बेटी से बड़े तो आख्या के मां बाप बड़े डकैत निकले। घर परिवार अपराधिनी के आतंक मे जी रहा था। इसी बीच  अपराधिनी का बाप आया और वैभव बाबू से बिना किसी विमर्श के अपने साथ लेकर चला गया क्या भगा ले गया।

अशुद्ध रतन पागल बेटी को उसकी ससुराल से तो हांक ले गया।कनकबाबू पर दबाव डालकर हवाई जहाज की टिकटें बुक करवाया  पागल आख्या को लेकर अपने परिवार के साथ कनकबाबू के पास सिकन्दराबाद पहुंच गया। डकैत अशुद्ध रतन अब कनकबाबू को परिवार का विद्रोही बनाने की पाठशाला शुरू कर दिया जैसे आतंकवादी सरगना शरीफ परिवार के बच्चों को अगवा कर नक्सली बनाते हैं। हर तरह का टार्चर, दहेज के केस में पूरे परिवार को  जेल भेजवाने की धमकी के आगे कनक हार मान लिया। कनक जो आदर्श की प्रतिमूर्ति था वह अपराधी प्रवृति के सास ससुर अशुद्ध रतन,अपवित्रा पागल पत्नी के आगे घुटने टेक दिया।

 

आख्या थी तो ठग की पागल बेटी पर शौक बिगड़े रईसों की औलादों जैसा था।कनकबाबू का घर परिवार से रिश्ता तोड़वा चुकी आख्या को शापिंग करना बड़े बड़े होटलों मे खाना खाना और बिस्तर पर पड़े रहना उसकी आदत मे शुमार थे। ठग की बेटी को दस हजार से कम की पोशाक नहीं भाती, पांच -पांच हजार के ब्लाउज तक खरीदने मे जरा भी नहीं हिचकती, कनक का डेबिट और क्रेडिट कार्ड अपने कब्जे मे रखती।

 

कनक सीनियर इंजीनियर और आख्या शायद फर्जी डिग्रियों की मालकिन पति को घर परिवार से  अलग कर पति का खू़न पीने वाली अपराधिनी तनख्वाह मिलने से सप्ताह भर पहले कैकेयी बन जाती  । डकैतों के झुंड से घिरा कनकबाबू आख्या को समझाने की कोशिश करता पर पागल कहां समझने वाली पति को लूट कर ठग बाप की तिजोरी भरना ही उसके शादी का मूल उद्देश्य था। कनक ठगों के हाथ की कठपुतली बन चुका था। ना उसे पेट भर खाने को मिलता न पहनने को । 

मां-बाप को बेटा से दूरी बर्दाश्त नहीं हो रही थी। बेटा के वियोग मे गरिमा बिस्तर मे सिमट रही थी,वैभव बाबू भी बीमारियों के जाल में फंसते जा रहे थे। कनक से सम्पर्क करने की कोशिश करते तो वह ढंग से बात नहीं करता,इतने गंदे ताने मारता बातें कहता की कलेजा मुंह को आ जाता। 

 

अपराधिनी आख्या कनक के तन मन और धन पर पूरी तरह से कब्जा तो किए हुए उसके फोन पर आने वाली हर काल और किससे क्या बात हुई पूरा रिकॉर्ड रखती, खुद टार्चर करती उसका डकैत बाप भी धमकाता कहता बहुत परिवार वाले हुए हो। एक शरीफ मां बाप की शरीफ औलाद का जीवन अपने आर्थिक लाभ के लिये रिश्ता विरोधी डकैतों ने नरक बना दिया था।

 

अपराधिनी आख्या ने तिरिया चरित्र के भरोसे कनक को परिवार से अलग किया, उसकी कमाई पर फन काढकर बैठ गई ।कनक खुद की कमाई की दो रोटी चैन से खाने को तरस आ रहा था।

उधर ठग परिवार हवाई यात्राएं कर रहा था,जश्न मना रहा था एक मां -बाप के बुढापे की लाठी छिनकर,भाई का हौशला तोड़कर, बहन का गुमान भाई छिनकर। अपराधिनी बेसुध पति की कमाई छिनकर हफ्ता वसूली करने वाले डकैत मा -बाप और आधा दर्जन भाई बहनों पर लूटा रही थी  खुद के भविष्य से बेखबर। कनक बाबू के जूनियर क्लासमेट्स कार बंगला के मालिक बन चुके थे जबकि अधिक कमाई के बाद भी रोटी कपड़ा के लिए वह संघर्ष कर रहा था। अपराधिनी आख्या खुद के शौक और बाप की मदद करने के लिए अपने पति को अवसाद मे ढकेल रही थी,.डेबिट कार्ड के साथ क्रेडिट का भरपूर दुरुपयोग कर रही थी। कनक को धोबी का कुत्ता बनाकर छोड़ दी थी।कनक मां -बाप की समझाइश को लतिया कर ठगों के जाल मे बुरी तरह फंस चुका था।

 

मां-बाप लाचार आंसू बहा रहे थे।कनक डकैत सास ससुर और उनकी विक्षिप्त बेटी के हाथों की कठपुतली बना हुआ था। वैभव और गरिमा जब फोन करते तो रुष्ट हो जाता शायद फोन पर बात करने पर पाबंदी थी,कभी बात भी कर लेता कनक तो महाभारत हो जाती क्योंकि ठग की बेटी ने कोई ऐसा सिस्टम लगा रखा था जब कोई फोन करता तो अपराधिनी आख्या पूरी बात सुनती और कनक का जीना दुश्वार कर देती, उधर उसका गुण्डा बाप भी धमकाता, इतना ही नहीं वैभव बाबू और उसके परिवार को दहेज के केस मे जेल भेजवाने की  कत्ल करवाने की सुपारी देने की धमकी भी देता। एक बेटी के बाप की इतनी दबंगई, कहते हैं ना अपना ही सिक्का खोटा हो तो कोई भी कुछ कह और कर सकता है।

 

कनक विषधर मां बाप की विषकन्या के मोहफांस मे मां- बाप के अरमानों का स्वाहा तो कर ही दिया था पर खुद भी सुखी और सुरक्षित नहीं था। कनक के लाचार मां-बाप के सामने परमात्मा की आराधना के अलावा कोई रास्ता भी न था। मां-बाप का दिल कहा मानता है बेटे के वियोग मे मरे जा रहे थे। कनक मां बाप भाई बहनों के सामने शेर की तरह दहाड़ता था ठग बाप की बेटी और उसके खूनी मां-बाप के सामने भीगी बिल्ली हो चुका था। अनजाने मे डकैत की बेटी से ब्याह क्या हुआ जीवन के अरमान ठगों ने लूट लिए ।

 

कभी -कभी कनक चोरी छिपे किसी दूसरे के फोन से बात करता, कनक का दुःख सुनकर कलेजा मुंह मे आ जाता। इस सब के लिए वह खुद ही जिम्मेदार था। डकैतों की बात मे आकर घर आना भी छोड़ दिया,विषकन्या के इश्क ने भाई बहन तक को दुश्मन बना दिया था।इकलौती बहन से राखी बंधवाने की याद न आती ।काश मां बाप की समझाइश पर गौर कर लिया होता तो इतने बुरे दिन नहीं देखने पड़ते।

 

आख्या के मां बाप खुद वैभवबाबू के घर आये थे,शराफत और संस्कार का उच्चतम प्रदर्शन किया।आख्या ने भी सभ्यता, संस्कृति और पारिवारिक जिम्मेदारियों का इतना श्रेष्ठतम प्रदर्शन किया की किसी को तनिक भी शक नहीं हुआ। आसपड़ोस की कई माताओं-बहनों ने भी बहुत तारीफ किए और यह भी कहा कि गरिमा तुम्हारे भाग्य बहुत प्रबल हैं लक्ष्मी,सरस्वती और अन्नपूर्णा की प्रति मूर्ति आख्या तुम्हारे घर चलकर आयी है, बहू बना लो । किसी को क्या पता थी कि आख्या डकैत मां-बाप की लिखी कहानी का सजीव मंचन कर रही है।

 

ब्याह पर कानूनी मुहर लगते ही ठग की बेटी अपने असली कैकेयी के रौद्र रुप मे आ गई थी। धीरे धीरे कई साल बीत पर आख्या की प्रेतात्मा मे वैवाहिक जीवन की दृष्टि से देवत्व का विकास नहीं हुआ।वह नरभक्षी की तरह पति को नोंच नोंच कर अपने मां बाप को अमीर बना रही थी खुद की गृहस्थी से बेखबर ।

 

इसी बीच आख्या गर्भवती भी हो गई जिसकी सूचना चोरी छिपे कनक ने दिया था।कुछ महीनों के बाद कनक का विदेश जाना हुआ जिसकी भनक वैभव बाबू को नहीं लगने दी गई। कनक विदेश उड़ान भरने के पहले अपनी मां गरिमा को बताया तब जाकर पता चला। इतनी बड़ी खुशी आख्या ने कनक के परिवार से छिन ली । देर से ही सही खुशी का समाचार सुनते ही वैभवबाबू ने बेटे कनक को फोन लगाया तब कनक की फ्लाइट दुबई एअरपोर्ट पर थी वहां से दूसरी फ्लाइट पकड़ना था।वैभव बाबू ने कनक को जी भर कर दुआएं और शुभकामनाएं दिये। फ्लाइट का समय हो गया था....हैप्पी जरनी कहते ही फोन डिसकनेक्ट हो गया।

 

उधर आख्या अपने डकैत मां बाप और भाई बहनों के साथ लूट का माल लेकर मायके पहुंच गई। कनक बाप भी बन गया जिसकी खबर ठग अशुद्ध रतन ने नहीं दिया।अब ठगों के हाथ कनक को लूटने का पख्ता मोहरा  कुलदीपक आ गया। कनक विदेश की मियाद पूरी होते ही सीधे ससुराल कानपुर पहुंचा महीनों ससुराल मे रुका पर घर आने की सुधि नहीं आई या ठगों की डर से घर की तरफ रुख नहीं किया। सीधे लूटेरा परिवार से विदा होकर आख्या और कुलदीपक को लेकर सिकन्दराबाद की  उड़ान भर लिया ।आख्या ने बेटा पैदा करने की कीमत दस लाख कनक से लूटकर डकैत मां बाप की झोली मे डाल दी। बेचारा कनक निरीह सा देखता रह गया। कनक के मां बाप कुटुम्ब परिवार राह ताकते ही रह गये।भाई का हौसला, बहन की राखी,बूढ़े मां-बाप के अरमानों का आसमान अशुद्ध रतन और उसकी जादूगर पत्नी ने छल से छिन लिया था। वैभव बाबू और गरिमा दुखी तो बहुत थे पर बेटे के लौटने की उम्मीद बलवंत थी।

 

सेरोगेट मां आख्या अपने ही तन से पैदा किये कुलदीपक को छाती का दूध नहीं पी लायी नहीं कभी डरायपर बदली नौकरी के साथ घर का काम बच्चे की देखरेख सब कनक के जिम्मे था। कनक ही कुलदीपक का बाप और मां दोनों था। कनक के जबान पर जैसे ही मां बाप का नाम आता चोर की बेटी कनक का जीना हराम कर देती उपर से उसके डकैत मां बाप दहेज के केस मे पूरे परिवार को जेल भेजवाने की धमकी देते । हाफमाइण्ड हाफ ब्लाइण्ड पत्नी द्वारा पीडित कनक के आगे विरान ठहरा हुआ था। उसे अपनी गलती का एहसास होने लगा था। मां बाप के दुख से चिन्तित तो था पर बेबस।

 

ठग अशुद्धरतन खुद और  अपनी बेटी  आख्या  द्वारा दादा ससुर की मौत,सास के कई बार सीरियस होने पर हास्फिटलाइजेशन, सांप डंसने, हफ्तों जीवन के लिए संघर्षरत रहने, ससुर के कोरोना जैसी मौत के मुंह मे फंसे होने के वक्त एवं अन्य बुरे वक्त मे बहिष्कार करवा दिया सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए ।

 

पत्नी पीड़ित कनक के पांव के नीचे की जमीन तब खिसक गई जब बेशर्म अशुद्धरतन ने अपने बच्चों की पढाई और उनके शादी-ब्याह की जिम्मेदारी कनकबाबू के कंधों पर डालने पर जोर देने लगा । कनक की अचेतन अवस्था तो टूटी पर ठग की बेटी का जुल्म बढ़ गया।ठग की बेटी की निगाहें कनक की कमाई के साथ उसके बाप की चल-अचल सम्पत्ति पर भी ठहरी हुई थी। लाचार को विचार क्या पुत्रमोह में ठग की बेटी आख्या की शर्तों पर जीने को बेबस हो गया । कनक जरा भी आनाकानी करता तो अपराधिनी कालोनी की घर बिगाड़ू महिलाओं को बुलाकर जुलूस निकलवा।ये महिलाएं  पत्नी पीड़ित कनक की एक ना सुनती ,उसे और उसके मां बाप बहू उत्पीड़न का आरोप लगाती ।

 

कनक के माता पिता के सामने अंधेरा पसरा हुआ था,आंखें डबडबाई हुई थी पर उन्हें उम्मीद थी कि उनके जीवन और परिवार के अच्छे दिन आयेंगे ।

उधर ठग अशुद्धरतन  और उसका परिवार दमाद को प्रताड़ित कर उसकी कमाई पर डांका डाल रहा था । बेटी के बूढ़े सास-ससुर की लाठी छिनवाकर, देवर का हौसला तोड़वाकर,ननद के राखी बांधने के हक को मारवाकर बेटी का भविष्य लूटकर,परिवार की उम्मीदें लूटकर अपनी ही बेटी आख्या का घर उजाड़ रहा था अपनी ही हाफमाइण्ड हाफब्लाइण्ड बेटी आख्या को अपराधिनी बनाकर ।

 

डां नन्द लाल भारती

 

Read more...

लघुकथा : बसन्त की आशा

0 comments

 

काका रामशरण के पिताश्री अनपढ़ खेतिहर थे।उनकी इस अयोग्यता ने एक मिशाल गढ़ दी थी,उन्होंने अपने बेटे को गाँव का सबसे ज्यादा पढा -लिखा दिया।रामशरण के लिए माता-पिता ही भगवान थे। शादीशुदा रामशरण नौकरी की तलाश मे जब शहर पहुंचा तो उसका सिर चकरा गया।अपने भी अनजान और पराये लग रहे थे। बेरोजगारी का भूत डरा रहा था।शो रुम के कपड़ों के डिस्प्ले को देखता तो खड़ा होकर निहारता और मन ही मन सोचता काश मैं अपने मां बाप और बच्चे के लिए खरीद पाता। 

पंचवर्षीय बेरोजगारी के बाद उसने अपने पिता के हर सपने को सजाया,बच्चों की ऊंची तालिम के लिए खुद टूटता रहा परन्तु किसी को भनक नहीं लगने दिया ।

 

बेटी की डोली उठी बहू की डोली रामशरण के घर भी आई। बहू को परिवार मे मान-सम्मान और ऊंचा दर्जा मिला परन्तु यह सम्मान बहू के मां बाप को नहीं भाया उन्होंने ने बेटी को ससुरालजनों का विरोधी बना दिया ताकि उसके मां बाप अपने आधा दर्जन बच्चों का घर बसा सके ।

दिमाग से पैदल बेटी ने मां बाप का साथ दिया, पति का टार्चर खुद और उसके मां बाप ने किया। रामशरण का बेटा  ध्यानदत्त सास-ससुर और पत्नी के शरणागत  हो गया ताकि दहेज के जुर्म मे उसके मां- बाप,भाई-बहन को सलाखों के पीछे ना जाना । बहू और उसके मा -बाप की साजिश ने बूढ़े रामशरण और उनकी पत्नी को आंसू से रोटी गीला करने को मजबूर कर दिया ।

बूढ़े रामशरण बूढी सगुनी उम्मीद मे जी रहे थे कि उनकी खुरापाती बहू का मोहभंग एक दिन होगा। बहू लालची मां- बाप की चौखट का त्याग कर अपने गृहस्थ जीवन को खुशहाल बनायेगी। सास ससुर की पतझड़ सी जिन्दगी को बसन्त सरीखे सजायेगी  

लम्बी तपस्या के बाद बूढ़े रामशरण बूढी सगुनी विश्वास यकीन मे तो बदला,बसन्त की आशा अलंकृत हुई । बहू के मां -बाप समाज की नजरों मे बहुत नीचे तक गये थे परन्तु  रामशरण ने हाथ बढ़ा दिया था।

 

डां नन्दलाल भारती

 

Read more...
 
[ साहित्‍य सुगंध पर प्रकाशित रचनाओं की मौलिकता के लिए सम्‍बधित प्रेषक ही उतरदायी होगा। साहित्‍य सुगंध पर प्रक‍ाशित रचनाओं को लेखक और स्रोत का उललेख करते हुए अन्‍यत्र प्रयोग किया जा सकता है । किसी रचना पर आपत्ति हो तो सूचित करें]
stats counter
THANKS FOR YOUR VISIT
साहित्‍य सुगंध © 2011 DheTemplate.com & Main Blogger. Supported by Makeityourring Diamond Engagement Rings

[ENRICHED BY : ADHARSHILA ] [ I ♥ BLOGGER ]