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निशब्द के शब्द -- सीताराम शर्मा सिद्धार्थ

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मैं हो गया हूं मौन
कुछ कहते हैं
कोई कहता है कि भटक गया हूं
कठोर प्रतिक्रियाएं मुझे उद्वेलित नहीं करती
देखता हूं दुनिया को
आंखें बंद करके मुस्कुरा देता हूं
और कई बार रोता  हूं चीखता भी हूं 
मौन ही इतनी जोर से 
मेरा मौन गहराता जाता है
मेरी चीख जम जाती है 
हिमखंड की तरह  
कठोर जला देने वाले अतिशीत शब्दों में
जो धीरे-धीरे निकलते हैं
पिघल पिघल कर 
लेखनी की जिव्हा के बाहर

एक मुस्कान के साथ प्रवेश करता हूं
 कभी अंतःद्वार से आत्मा तक
भासित होता है  स्वर्णिम पथ
मेरी एक नजर में झूमने लगते हैं फूल
उड़ती है कुछ पंखुड़ियां कुछ लाल होते पत्ते
ह्रदय से फूट पड़ती है  
 फैल जाने को किसी फलक पर  निशब्द
 सरस सलिल शब् सीताराम शर्मा सिद्धार्थ



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कविता वैराग्य -- राजीव डोगरा

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मेरा वैराग्य,
वास्तव में मेरा सौभाग्य है।
मेरी हस्ती,
उस खुदा की मस्ती है।
मेरा निश्चल प्रेम,
उस ईश्वर का प्रतिरूप है।
मेरी स्तुति,
उस ईश् की अभिव्यक्ति है।
मेरी वंदना,
उस अलख निरंजन की अनुभूति है।
मेरी भक्ति,
उस तत्पुरुष के लिए आस्था है।
मेरी शक्ति 
परब्रह्म स्वरूप की मात्रा अंश है।

राजीव डोगरा
कांगड़ा हिमाचल प्रदेश
(भाषा अध्यापक)
गवर्नमेंट हाई स्कूल,ठाकुरद्वारा।
पिन कोड 176029
9876777233
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मत खींचो भाषाओं के दायरे -- जगदीश बाली

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वास्तव में भाषा वही है जो दिलों में उतर जाए। जो भाषा दिल में नहीं उतरती, वो जनमानस की भाषा नहीं बन सकती और जो भाषा जनमानस की नहीं बन सकती, वो कभी विकसित नहीं हो सकती। यह महत्वपूर्ण है कि किसे कौनसी बात किस भाषा में समझ आती है। इस बात में कोई संदेह नहीं कि निज भाषा में ही हम सबसे पहले अपने ज़ज़बातों व अहसासों को शब्दों का रूप देते हैं, परन्तु किसी की निज भाषा क्या है, यह एक व्यक्तिगत प्रश्न है।
 महनीय कवि भारतेन्दु हरिशचन्द्र ने कहा है - निज भाषा को उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल। परन्तु उनके इस कथन को आज की बदलती और सिमटती दुनियाँ के परिपेक्ष में देखने की आवश्यकता है। उनके कथन का आज ये आशय नहीं निकाला जा सकता कि सब की निज भाषा एक ही हो। मेरी निज भाषा हिंदी हो सकती है और आपकी कोई और तथा किसी तीसरे की कोई और। हाँ, इतना ज़रूर है कि हर किसी को अपनी भाषा का प्रचार करने का हक है और उसे ऐसा करना भी चाहिए।
 हमारे देश के संविधान में बहुत सी भाषाओं को मान्यता दी गयी है, तो किसी एक भाषा को निज भाषा कैसे करार दिया जा सकता है। हिंदी वाले हिंदी का, अंग्रेज़ी वाले अंग्रेज़ी का, संस्कृत वाले संस्कृत का और कोई अन्य भाषा वाले अपनी अपनी भाषाओं का प्रचार करें। इसमें कोई समस्या नहीं। किसी क्षेत्र की सभ्यता और संस्कृति को जानने के लिए आवश्यक है हम उस जगह की भाषा को समझें क्योंकि भाषा अपने साथ संस्कृति भी लेकर आती है। फ़िर आज तो हम गुगल, फ़ेसबुक और व्ट्सएप के प्रचार और संप्रेषण के उस युग में रह रहे हैं जहाँ हर देश पड़ोसी ही लगता है। रोज़गार के लिए या फ़िर अन्य किसी प्रयोजन से लोग एक-दूसरे देश आ जा रहे हैं। ऐसे में बहुभाषिया होना एक खूबी है। कालिदास के अभिज्ञान शाकुन्तलम् का जर्मन भाषा में अनुवाद करने वाले विचारक योहान वुल्फगांग फ़ान गेटे ने कहा है - ”जिसे किसी विदेशी भाषा का कोई ज्ञान नहीं, उसे अपनी भाषा का भी कोई ज्ञान नहीं होता।”
 निसंदेह हमें हिंदी को तरज़ीह देनी ही चाहिए, परन्तु इसके मायने ये भी नहीं है कि अन्य भाषाओं को हिकारत भरी निगाहों से देखा जाए। भारतेन्दु जी स्वयं बहुत सी भाषाओं का इल्म रखते थे। जितनी अधिक भाषाएं आप जानते हैं, उतना ही बेहतर आप अपने विचारों का आदान प्रदान कर सकते हैं। वास्तव में भाषाएं बहनों की तरह होती हैं। वे कभी नहीं टकराती। टकराती तो भाषा के प्रति हमरी मानसिकता है।
 अगर हम अपनी-अपनी भाषाओं के दायरे खींच ले, तो न तो भाषाओं का आदान-प्रदान होगा, न उनका विकास होगा और न ही हम एक दूसरे की संस्कृति से पूरी तरह वाकिफ़ हो पाएंगे। यदि सभी अपनी-अपनी भाषा का राग अलापने लगेंगे, तो भाषाओं का परस्पर मेल नहीं हो पाएगा। सोचिए अगर भाषाएं एक दूसरे से न मिलती, तो श्रीमदभगवद गीता को केवल हिंदु पढ़ पाते, कुरान मुसलमान ही पढ़ते, आदिग्रन्थ केवल सिक्ख जानता और बाइबल केवल ईसाईयों तक सीमित रहती, परन्तु इन पुस्तकों का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद उपलब्ध होने से विश्व के लोग इन्हें पढ़ पाते हैं।
 हमारे देश की आज़ादी में भी कई भाषाओं का योगदान रहा है। राष्ट्रगीत ’वंदे मातरम’ और राष्ट्रगान ’जन गण मन’ हमें बांग्ला ने दिए और ’सारे जहां से अच्छा...’ इकबाल की उर्दू भाषा में लिखी गई देश प्रेम की ग़ज़ल है। अगर ’दिल्ली चलो’, 'करो या मरो' 'जय हिंद' जैसे नारे हिंदी के हैं, तो क्रांति का प्रतीक ’इंक़िलाब ज़िन्दाबाद’ का नारा उर्दू ज़बान का है। मुंशी प्रेमचंद की कहानियों और दुष्यंत कुमार की गज़लों में हिंदी व उर्दू जिस तरह से मिली हुई हैं, वह साहित्य को एक ख़ूबसूरत आयाम देता है। जहां हिंदी, उर्दू और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं ने देश की आज़ादी में अहम भूमिका निभाई, वहीं आधुनिक भारत के जनक राजाराम मोहन राय ने अंग्रेज़ी का इस्तमाल भारत पुनर्जागरण के लिए किया। उन्होंने इस भाषा को अंग्रेज़ों और भारतीयों के बीच सेतु स्थापित करने के लिए भी किया। ये भी नहीं भूलना चाहिए कि पंडित नेहरू. आर के नारायनन, राजा राव, किरन देसाई, अरुनधति रॉय, जैसे भारतीय लेखकों ने अंग्रेज़ी भाषा का इस्तमाल करके ऐसी साहित्यिक रचनाएं लिखी जिनसे विश्व में देश का नाम रोशन हुआ है।
 किसी भी भाषा के विस्तार और विकास के लिए ज़रूरी है कि यह दूसरी भाषाओं के प्रति उदार रहे। जैसे हिंदी भाषा के चपाती, बिनदास जैसे शब्दों की तरह दूसरी भाषा में नहीं मिलते, ठीक वैसे ही दूसरी भाषा के कई शब्द ऐसे हैं जिनकी बराबरी के शब्द हिंदी में नहीं जैसे उर्दू के इरशाद, तख़लिया’ या अंग्रेज़ी के स्पैम व गुगल इत्यादि।
 किसी भी भाषा के विस्तार और विकास के लिए ज़रूरी है कि यह दूसरी भाषाओं के प्रति उदार रहे। दूसरी भाषा को खुद मे अपना लेना और खुद को दूसरी भाषा में मिला लेने की खूबी ही भाषा को विकसित करती है। इस बात से किसी को कोई गिला नहीं हो सकता की हिंदी हमारी बिंदी है। परंतु यह बात भी कम महत्वपूर्ण नहीं कि विविधताओं से परिपूर्ण इस देश में हिंदी के अलावा भी अन्य कई भाषाएं हैं जिन्हें बराबरी, प्रेम व सम्मान की दृष्टि से देखना आवश्यक है अन्यथा हम भाषाई अलगाववाद को बढावा देगा। भाषा किसी की बांदी नहीं होती। इसे किसी खूंटे से नहीं बांधा जाना चाहिए अन्यथा यह ऐसे पिंजरे के पंछी की तरह हो जाती है जिसे ज़ीने के लिए दाना तो मिलता है, पर उसकी ऊड़ान कुंद रह जाती है। तेरहवीं शताब्दी के इंग्लैंड के प्रसिद्ध वैज्ञानिक और दार्शनिक रोजर बेकन ने कहा था - ज्ञान की चॊटी पर हम विभिन्न भाषाओं को जान कर पहुंच सकते हैं। भाषा का इस्तेमाल दिलों की हदें मिटाने के लिए करें, हदें बनाने के लिए नहीं। दिलों की हदें जब टूटती हैं, तो दिल जुड़ते हैं और जब दिल जुड़ते है तो हम मुस्कुराते हैं और मुस्कुराने की कोई एक खास भाषा नहीं होती।
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प्रेस क्लब ने दिया रतन चंद निर्झर को साहित्य सेवा सम्मान

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बिलासपुर प्रेस क्लब में मंगलवार को साहित्यिक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसमें सुखराम आजाद मुख्यतिथि व कमांडेंट सुरेंद्र शर्मा अध्यक्ष तथा डा. एआर सांख्यान व डा. प्रशांत आचार्य विशेष रूप से उपस्थित रहे। इस अवसर पर जाने माने कवि लेखक रतन चंद निर्झर को मुख्यतिथि द्वारा टोपी व स्मृति चिन्ह देकर साहित्य सेवा सम्मान से सम्मानित किया गया। मंच का संचालन रविंद्र भटटा ने किया। कुलदीप चंदेल ने प्रेस क्लब में 2018 में आयोजित हुई साहित्यक संगोष्ठियों का लेखा जोखा प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि हर माह प्रेस क्लब में नियमित रूप से साहित्यकारों ने साहित्यक संगोष्ठी सजाई। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी के निधन पर 18 अगस्त को गोष्ठी में कविताओं के रूप में श्रद्धाजंलि भर दी गई। प्रदीप गुप्ता ने गजल गायिका जरीना बेगम को लेकर पत्र वाचन किया। अमर नाथ धीमान ने पहाड़ी गजल मना रे मन च आएगे दीऊ से जलाईगे, राम पाल डोगरा ने लिखूं गरीब की कहानी, हुसैन अली ने मेरी कबर के पत्थर पर हिंदुस्तान लिख देना, जीतराम सुमन ने दुनिया के रिश्ते कितने अजीब हो गए। शिव व पाल गर्ग ने यार जिंदगी जी कर चले गए, जिंदगी  क्या है हम यही सोचते रह गए,। प्रतिभा शर्मा ने त्यौहार खास होते हैं, अटल बिहारी वाजपेयी के जन्म दिवस पर कहा कि अटल सा ही चाहिए भारत मां के हर लाल , समपर्ण भाव से करते थे हर काम, रतनचंद निर्झर ने कूड़ादान को लेकर यूं कहा कि मुहल्ले के कोने में सुबह -सुबह खिल उठता है कूड़ादान, अश्विनी सुहिल ने मेहनत से उठा हूं, मेहनत का दर्द जानता हूं, ओंकार कपिल ने मुह मद रफी का गीत तुम जो मिल गए हो सुनाया। कुलदीप चंदेल ने अपने को महाज्ञानी समझने लगे हैं, कुछ मित्र मेरे शहर के , डा. जय नारायण कश्यप ने कोई उंगलियों में नचाए कोई उंगलियां चबाए, किशोक अलौकिक ने राजा रंक लड़ाई का होता अंत बुराई का। डा. प्रशांत आचार्य ने पूजने जब चला में शिव कला और श्यामल ,प्रदीप गुप्ता ने कई मुखौटे , जमुना ने त्याग कर गांव को मानव, जब शहर को भागा, अरूण डोगरा ने मंच के एक ओर द्वीप प्रज्जलवित था, रविंद्र भटटा ने जीवन के इस मोड पर कहां खो गया हूं। डा. एआर सां यान ने तू दबे पांव चोरी छिपे न आ, सामने वार कर फिर मुझे आजमा, सुरेंद्र शर्मा ने शहर में हर शख्स हैरान क्यों हैं। तथा सुख राम आजाद ने किस किस री गल करिए, कुण कुण इति उत हुऊ गया

साभार  http://www.janwaqtalive.com/प्रेस-क्लब-ने-दिया-रतन-चंद/
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मंथन का प्रथम साहित्यिक समागम --- जगदीश बाली

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कुमारसैन में ’मंथन’ ने लिखी हिमालय साहित्य मंच व हिमवाणी के साथ शब्द सृजन की ऐतिहासिक इबारत
साहित्यिक रूप से लगभग शांत पड़ी कुमारसैन की फ़िजाओं ने उस वक्त नई हवाओं की खुशबू का एहसास किया जब दुनिया के शोर-शराबे से दूर आइ टी आई के भव्य भवन के सुंदर सभागार में साहित्य मंच ’मंथन’ ने अपनी पहली साहित्य गोष्ठि का आयोजन कर क्षेत्र में शब्द सृजन की एक नई इबारत लिखी। 18 दिसंबर 2018 को 25 कवियों व 100 से अधिक सुधि ग्रामीण श्रोताओं की 250 से ज्यादा आंखें मशहूर लेखक एस आर हर्नोट व ’मंथन’ के हाथों मां सरस्वती के चरणों में साहित्य की लौ जलने की साक्षी बनीं। ’मालूम नहीं उन्हें बीज़ हैं लफ़्ज़ मेरे, नव सृजन का ऐलान करते हैं।’ मंच संचालक की प्रभावशाली आवाज में इन्हीं शब्दों के साथ कवि गोष्ठि का आगाज़ हुआ। मशहूर लेखक हरनौट जी की टीम, जो "हिमालय साहित्य संस्कृति मंच" व 'हिमवाणी संस्था' के साहित्यकारों से लवरेज़ है, ने ’मंथन’ के साथ मिल कर अपनी 'आम जन तक साहित्य 2018’ को यादगार विराम दिया और इस तरह ’मंथन’ का शानदार आगाज़ हुआ। कवियों की शालीनता और स्तर हर किसी के दिल में उतर गए जो एक साहित्यकार के आदर्श व्यक्तित्व की वानगी है। इस कार्यक्रम को सफ़ल बनाने में किसी ने दीवार चीनी तो किसी ने छत बिछाई अर्थात एक सांझे प्रयास के बाद इतना बेहतरीन कार्यक्रम आयोजित किया जा सका।
सर्वप्रथम प्रतिभा मेहता ने अपनी गज़ल ’हंस के हर ज़ख्म पिए जाते हैं’ को तरन्नुम में प्रस्तुत कर एक बढ़िया शुरुआत की। युवा कवयित्री शिल्पा ने अपनी कविता ’बादल ने दी जीवन जीने कि प्रेरणा’ ने सबको प्रभावित किया। कुलदीप गर्ग तरुण के शेरों ने भी अंतर्मन को छुआ। इसी बीच कवियों के बीच होती हल्की-फ़ुल्की टिका टीप्पणियों व नौक-झौंक से सभागार ठहाकों से भी गूंजता रहा। पूजा शर्मा की कविता ’वर्षों बाद मिल गया पुराना दोस्त था मेरा’ व वंदना राणा की ’इधर भी हैं मज़बूरियां गीत क्या गाने लगा है शहर’ वर्तमान माहौल पर करारा कटाक्ष था। अपने चिर-परिचित हास्यपूर्ण आंदाज़ में नरेश देवग ने जहां नौजवानों को सुसंस्कृत व नशे से दूर रहने की सलाह दी, वहीं नव वर्ष पर उनकी कविता ने श्रोताओं को ठहाके लगाने पर मज़बूर कर दिया। उन्होंने तरन्नुम में नेताओं पर भी तंज़ कसे। ’मंथन’ मंच के संयोजक हतिंदर शर्मा ने ’मां जीना सिखा दिया’ और ’निरुत्साहित नहीं निष्फ़ल हूं’ जैसी छोटी छोटी रुहानी कविताओं से सबके दिलों को छुआ। मंच प्रचारक व स्थानीय युवा कवि दीपक भारद्वाज ने ’जाड़े की धूप’ कविता से काफ़ी असर छोड़ा। ’पत्थर तोड़ती औरत’ कविता संग्रह के लेखक मनोज चौहान ने अपनी कविता से सबको आकर्षित किया। प्रसिद्ध कवि आत्मा रंजन की ’यूं आए नया साल’ सबको भा गई। मोनिका छटू की कविता ’दुख’ में चौसर का खेल काफ़ी गहराई लिए हुए लगा। ’मंथन’ के सलाहाकार अमृत कुमार शर्मा ने कविता ’मैं लिखूंगा किताब जब तब देखना’ के माध्यम से राजनीतिज्ञ व अफ़सरशाही पर व्यंग्य साधा। ’मंथन’ के सचेतक रौशन जसवाल की कविता ’मैं बच्चा बनना चाहता हूं’ भी बहुत सराही गई। गुपतेश्वर उपाध्याय के संक्षिप्त काव्यपाठ ने सब के मन को छू लिया। उमा ठाकुर ने पहाड़ी भाषा में अपने कविता पाठ से स्थानीय उत्सवों, रीति-रिवाजों व पकवानों से अवगत करवाया। रीतिका और ज्ञानी शर्मा ने पहाड़ी झूरियों से गोष्ठि को नया आयाम दिया। ’मंथन’ के सदस्य ताजी राम वनों की हरयाली पर कविता से सबको प्रभावित किया। युवा कवयित्री कल्पना गांगटा की कविताओं ने युवाओं को समाज के लिए कुछ करने का संदेश दिया। डॉ. स्वाती शर्मा ने अपनी कविता के माध्यम से नारी की व्यथा को दर्शाया तथा युवा कवि राहुल बाली ने अपनी कविता ’हम अकेले थे’ से बहुत प्रभाव छोड़ा। लगभग साड़े चार घंटे तक चली इस गोष्ठि में मंच संचालन भी उत्कृष्ठ रहा। संचालक ने अपने शेर-गज़लों, क्षणिकाओं, हाज़िर जवाबी व ठिठोली से श्रोताओं को खूब गुदगुदाया। वास्तव में ’मंथन’ का ये पहला कार्यक्रम पहला होते हुए भी सबके दिल में उतर गया। भविष्य जब कुमरसैन के इतिहास के पन्नों को पलटेगा, इसके एक पन्ने पर ये भी लिखा होगा कि 18 दिसंबर 2018 को ’मंथन’ ने ’हिमालय साहित्य संस्कृति मंच’ व हिमवाणि मंच के साथ मिलकर साहित्य की लौ जला कर एक शब्द सृजन की इबारत लिखी थी। इस इबारत लिखने में आई टी आई के प्रधानाचार्य हितेश शर्मा, उनके स्टाफ व छात्रों के योगदान को ’मंथन’ हमेशा याद रखेगा।
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