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ग़ज़ल शय क्या है -- जगदीश बाली

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ग़ज़ल शय क्या है---
जगदीश बाली (कॉपी राइट सुरक्षित)
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हिमाचल प्रदेश के नामी शायर मरहूम मनोहर 'साग़र' पालमपुरी साहब दुरुस्त कहते हैं, ’जिससे रंगीन है ज़िन्दगी, सोच का वो लहू है ग़ज़ल।’ ग़ज़ल सुनने का शौक है। अक्सर सुनते सुनते खो सा जाता हूं। ग़ज़ल कभी कायल बनाती है और कभी घायल कर देती है। अभी-अभी एक ग़ज़ल सुन रहा था- तुमने बदले हमसे गिन गिन के लिए ...। सुनते-सुनते इसी में रम गया। जब अपने में आया तो ख्यालों में एक सवाल उभर आया, ‘ये गजल भी क्या नायाब चीज़ है। अनायास ही लबों से निकल आया, 'गजल शय क्या है जान लीजिए, मय का प्याला है मान लीजिए।‘ इस पर मत जाइए कि ये मेरा शे'र बना या नहीं बना है। शे'र बना न बना अलग मुद्दा है। मैंने तो यहां ग़ज़ल की बाबत एक ख्याल जाहिर किया है क्योंकि आदमी के ज़ेहन में ख्यालों का उभरना एक पैदाइशी फितरत है। ग़ालिब साहब ने सही कहा है, 'है आदमी बजाए खुद एक मशहर-ए-ख्याल।' इस ख्याल का इजहार अपने हिसाब आदमी कैसे भी कर सकता है। लोग अपने ख्यालों को शब्दों की सूरत अता कर कागज़ पर उतार लेते हैं। इजहार-ए-ख्याल की इस सूरत को ही साहित्य या अदब कहते हैं। साहित्य या अदब की अपनी अपनी विधाएं हैं। उर्दू अदब की इस्तमाहत की अगर बात की जाए, तो ग़ज़ल एक अहम मुकाम रखती है। ग़ज़ल में कशिश ऐसी है कि हर कोई इसकी ओर खींचा चला जाता है, फिर वो चाहे पढ़ने वाला हो, सुनने वाला हो या फिर लिखने या कहने वाला। हिंदी भाषा में भी ग़ज़ल अपना स्थान रखती है। महनीय कवि दुष्यंत कुमार ने हिंदी ग़ज़ल को एक ऊंचे मुकाम पर पहुंचाया। हालांकि हिंदी में ग़ज़ल का समतुल्य छंद है और हिंदी छंद की अपनी अहमियत है, परंतु फिर भी बहुत से लेखक उर्दू ग़ज़ल की तर्ज़ पर ही हिंदी में गज़ल लिख रहे हैं। मुख्य अंतर वज़्न करते समय मात्राओं का है। अब तो ग़ज़ल नेपाली, गुजराती, अवधी, मैथिली, भोजपुरी भाषाओं में भी लिखी और कही जा रही है। हिमाचल प्रदेश में भी कई लोग पहाड़ी बोलियों में गज़लें प्रस्तुत कर रहे हैं। हालांकि गजल कहने या लिखने का शउर हर लेखक के पास नहीं, परन्तु फिर भी बहुत से काव्यकार ग़ज़ल लिख रहे हैं या लिखना चाहते हैं। वज़्न पर ज़्यादा ध्यान न देते हुए वे रदीफ़ और काफिया का इस्तेमाल करते हुए अपने ख्यालों का इजहार करते हैं और इसे वे मान ग़ज़ल मान लेते हैं या कह देते हैं। यह ग़ज़ल की मकबूलियत और कशिश की बानगी है। 
हालांकि ग़ज़ल अरूज़ का अत्यंत लोकप्रिय व दिलकश अंदाज़-ए-बयां है, परंतु यह चर्चा व उलझन का सबब भी रही है। उर्दू के एक आलोचक ने इसे ‘नंग-ए-शायरी’ कहा है। एक आलोचक ने इसे 'क़ाबिले गर्दन ज़दनी’ कहा है मतलब ग़ज़ल को जड़ से उखाड़ फेंकना चाहिए। ग़ज़ल के कई तनकीदकार ‘ग़ालिब’ साहब के इस शे'र का ज़िक्र भी करते हैं, ’बक़द्रे शौक़ नहीं ज़र्फे तंगना-ए-ग़ज़ल, कुछ और चाहिए वसुअत मेरे बयां के लिए।’ अर्थात मेरे जेहन की उत्कट भावनाओं को व्यक्त करने के लिए ग़ज़ल एक तंग माध्यम है। मुझे अपनी बात कहने के लिये किसी और विस्तृत माध्यम की आवश्यकता है। परंतु ये कहना अनुचित नहीं होगा कि गालिब के इस शे'र को ग़ज़ल पर तंज नहीं कहा जा सकता। वे इस शे'र के माध्यम से ये कहना चाह रहे हैं कि उनके उत्कट ख्यालों को काव्य या अरूज़ की कोई विधा काफी नहीं है। ये शे'र दर्शाता है कि 'गालिब' की अप्रतिम व अजीम अदबी प्रतिभा को कोई साहित्यिक विधा नहीं बांध सकती। लिहाजा उनके इस शे'र को ग़ज़ल की मुज़्ज़मत नहीं कहा जा सकता। ये बात भी काबिल-ए-गौर है कि गज़लों के माध्यम से ही गालिब को शौहरत व आला मुकाम हासिल है।
तंज-ओ-तनकीद कितनी भी कर लो, इसके बावजूद ग़ज़ल की लोकप्रियता को ग्रहण नहीं लगा। उर्दू अदब के सुप्रसिद्ध आलोचक रशीद अहमद सिद्दीक़ी ने ग़ज़ल को 'आबरू-ए-शायरी’ कहा हैं। बशीर बद्र ग़ज़ल को ’सल्लतनत’ कहते हुए कहते हैं, ’मुझे खुदा ने ग़ज़ल का दयार बक्शा है, मै ये सल्तनत मोहब्बत के नाम करता हूँ।’ ज़ाहिर है ग़ज़ल की मिठास व कशिश को नकारा नहीं जा सकता। मैं गज़ल और छंद को एक दूसरे से बेहतर या खराब घोषित नहीं कर रहा। दोनों काव्य की अनुपम विधाएं हैं और अपनी-अपनी भाषाओं में अहम स्थान रखते हैं। बहरहाल यहां मैं केवल गज़ल की बात कर रहा हूं। 
इब्तिदाई दौर में ग़ज़ल पर्शियन और अरबी से उर्दू में आयी। तब ग़ज़ल औरतों की सुंदरता व उनसे मुहब्बत को व्यक्त करती थी। इन रिवायती गज़लों का सिलसिला अब भी चल रहा है। कतील शिफ़ाई साहब कहते हैं, ’हुस्न को चांद जवानी को कंवल कहते हैं, उनकी सूरत नज़र आए तो गज़ल कहते हैं।’ गज़लों में जो मिठास है, जो दर्द है, करुणा है, ज़ज़्बात हैं, वे हर किसी को छू जाते हैं। ‘फिराक’ गोरखपुरी साहब ने ग़ज़ल को परिभाषित करते हुए कहा है कि ग़ज़ल उस दर्द भारी आवाज़ को बयां करती जो उस हिरण के कंठ से निकलती है, जब कोई आखेटक शिकारी कुत्तों के साथ उसका पीछा करता है और वह किसी झाड़ी में फंस जाता है। अब रिवायती गज़लों के साथ मानवीय जीवन से जुड़े हर मुहाज़ पर ज़दीद गज़लें लिखी और कही जा रही हैं। 
बेशक ग़ज़ल एक ग़ज़ब हुनर है, जिसे हासिल करने के लिए बरसों के अभ्यास की ज़रूरत है। इकबाल अशर कहते हैं, ’इतनी आसानी से मिलती नहीं फ़न की दौलत, ढल गई उम्र तो गज़लों में जवानी आई।’ ताहम आजकल बहुत से शायर केवल काफ़िया और रदीफ़ को घ्यान में रख कर गज़लें लिख व कह रहे हैं, जिन्हें रिवायती गज़ल गो वज़्न की दृष्टि से खारिज कर देते हैं। शायर दीक्षित दनकोरी कहते हैं, ‘शेर अच्छा बुरा नहीं होता, या तो होता है या नहीं होता।’ वे अपनी जगह सही हैं, परंतु इस बात को भी दरकिनार नहीं किया जा सकता कि साहित्य में गणितीय आंकड़े का विशुद्ध प्रयोग हमेशा उचित नहीं। इस मुतल्ल्क मनोज मुंतशिर कह्ते हैं, ’साहित्य कुछ भी हो सकता है, परंतु गणित नहीं हो सकता।’ ये बात भी गौरतलब है कि साहित्य केवल साहित्यिकारों की नुक्ताचीनी के लिए ही नहीं होता, बल्कि खसूसी तौर पर पाठकों व श्रोताओं के लिए होता है। अगर उन्हें भा गया तो समझो गज़ल, नज़्म, छंद, कविता सब हो गया। ख़्याल तो आज़ाद हैं। ख़्याल अपना-अपना, इज़हार-ए-ख्याल अपना-अपना और अंदाज़-ए-बयां सबका अपना-अपना। परंतु यह भी सत्य है कि गज़ल या छंद जादू नहीं, पर जादू जैसी कोई चीज़ ज़रूर है।
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निशब्द के शब्द -- सीताराम शर्मा सिद्धार्थ

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मैं हो गया हूं मौन
कुछ कहते हैं
कोई कहता है कि भटक गया हूं
कठोर प्रतिक्रियाएं मुझे उद्वेलित नहीं करती
देखता हूं दुनिया को
आंखें बंद करके मुस्कुरा देता हूं
और कई बार रोता  हूं चीखता भी हूं 
मौन ही इतनी जोर से 
मेरा मौन गहराता जाता है
मेरी चीख जम जाती है 
हिमखंड की तरह  
कठोर जला देने वाले अतिशीत शब्दों में
जो धीरे-धीरे निकलते हैं
पिघल पिघल कर 
लेखनी की जिव्हा के बाहर

एक मुस्कान के साथ प्रवेश करता हूं
 कभी अंतःद्वार से आत्मा तक
भासित होता है  स्वर्णिम पथ
मेरी एक नजर में झूमने लगते हैं फूल
उड़ती है कुछ पंखुड़ियां कुछ लाल होते पत्ते
ह्रदय से फूट पड़ती है  
 फैल जाने को किसी फलक पर  निशब्द
 सरस सलिल शब् सीताराम शर्मा सिद्धार्थ



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कविता वैराग्य -- राजीव डोगरा

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मेरा वैराग्य,
वास्तव में मेरा सौभाग्य है।
मेरी हस्ती,
उस खुदा की मस्ती है।
मेरा निश्चल प्रेम,
उस ईश्वर का प्रतिरूप है।
मेरी स्तुति,
उस ईश् की अभिव्यक्ति है।
मेरी वंदना,
उस अलख निरंजन की अनुभूति है।
मेरी भक्ति,
उस तत्पुरुष के लिए आस्था है।
मेरी शक्ति 
परब्रह्म स्वरूप की मात्रा अंश है।

राजीव डोगरा
कांगड़ा हिमाचल प्रदेश
(भाषा अध्यापक)
गवर्नमेंट हाई स्कूल,ठाकुरद्वारा।
पिन कोड 176029
9876777233
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मत खींचो भाषाओं के दायरे -- जगदीश बाली

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वास्तव में भाषा वही है जो दिलों में उतर जाए। जो भाषा दिल में नहीं उतरती, वो जनमानस की भाषा नहीं बन सकती और जो भाषा जनमानस की नहीं बन सकती, वो कभी विकसित नहीं हो सकती। यह महत्वपूर्ण है कि किसे कौनसी बात किस भाषा में समझ आती है। इस बात में कोई संदेह नहीं कि निज भाषा में ही हम सबसे पहले अपने ज़ज़बातों व अहसासों को शब्दों का रूप देते हैं, परन्तु किसी की निज भाषा क्या है, यह एक व्यक्तिगत प्रश्न है।
 महनीय कवि भारतेन्दु हरिशचन्द्र ने कहा है - निज भाषा को उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल। परन्तु उनके इस कथन को आज की बदलती और सिमटती दुनियाँ के परिपेक्ष में देखने की आवश्यकता है। उनके कथन का आज ये आशय नहीं निकाला जा सकता कि सब की निज भाषा एक ही हो। मेरी निज भाषा हिंदी हो सकती है और आपकी कोई और तथा किसी तीसरे की कोई और। हाँ, इतना ज़रूर है कि हर किसी को अपनी भाषा का प्रचार करने का हक है और उसे ऐसा करना भी चाहिए।
 हमारे देश के संविधान में बहुत सी भाषाओं को मान्यता दी गयी है, तो किसी एक भाषा को निज भाषा कैसे करार दिया जा सकता है। हिंदी वाले हिंदी का, अंग्रेज़ी वाले अंग्रेज़ी का, संस्कृत वाले संस्कृत का और कोई अन्य भाषा वाले अपनी अपनी भाषाओं का प्रचार करें। इसमें कोई समस्या नहीं। किसी क्षेत्र की सभ्यता और संस्कृति को जानने के लिए आवश्यक है हम उस जगह की भाषा को समझें क्योंकि भाषा अपने साथ संस्कृति भी लेकर आती है। फ़िर आज तो हम गुगल, फ़ेसबुक और व्ट्सएप के प्रचार और संप्रेषण के उस युग में रह रहे हैं जहाँ हर देश पड़ोसी ही लगता है। रोज़गार के लिए या फ़िर अन्य किसी प्रयोजन से लोग एक-दूसरे देश आ जा रहे हैं। ऐसे में बहुभाषिया होना एक खूबी है। कालिदास के अभिज्ञान शाकुन्तलम् का जर्मन भाषा में अनुवाद करने वाले विचारक योहान वुल्फगांग फ़ान गेटे ने कहा है - ”जिसे किसी विदेशी भाषा का कोई ज्ञान नहीं, उसे अपनी भाषा का भी कोई ज्ञान नहीं होता।”
 निसंदेह हमें हिंदी को तरज़ीह देनी ही चाहिए, परन्तु इसके मायने ये भी नहीं है कि अन्य भाषाओं को हिकारत भरी निगाहों से देखा जाए। भारतेन्दु जी स्वयं बहुत सी भाषाओं का इल्म रखते थे। जितनी अधिक भाषाएं आप जानते हैं, उतना ही बेहतर आप अपने विचारों का आदान प्रदान कर सकते हैं। वास्तव में भाषाएं बहनों की तरह होती हैं। वे कभी नहीं टकराती। टकराती तो भाषा के प्रति हमरी मानसिकता है।
 अगर हम अपनी-अपनी भाषाओं के दायरे खींच ले, तो न तो भाषाओं का आदान-प्रदान होगा, न उनका विकास होगा और न ही हम एक दूसरे की संस्कृति से पूरी तरह वाकिफ़ हो पाएंगे। यदि सभी अपनी-अपनी भाषा का राग अलापने लगेंगे, तो भाषाओं का परस्पर मेल नहीं हो पाएगा। सोचिए अगर भाषाएं एक दूसरे से न मिलती, तो श्रीमदभगवद गीता को केवल हिंदु पढ़ पाते, कुरान मुसलमान ही पढ़ते, आदिग्रन्थ केवल सिक्ख जानता और बाइबल केवल ईसाईयों तक सीमित रहती, परन्तु इन पुस्तकों का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद उपलब्ध होने से विश्व के लोग इन्हें पढ़ पाते हैं।
 हमारे देश की आज़ादी में भी कई भाषाओं का योगदान रहा है। राष्ट्रगीत ’वंदे मातरम’ और राष्ट्रगान ’जन गण मन’ हमें बांग्ला ने दिए और ’सारे जहां से अच्छा...’ इकबाल की उर्दू भाषा में लिखी गई देश प्रेम की ग़ज़ल है। अगर ’दिल्ली चलो’, 'करो या मरो' 'जय हिंद' जैसे नारे हिंदी के हैं, तो क्रांति का प्रतीक ’इंक़िलाब ज़िन्दाबाद’ का नारा उर्दू ज़बान का है। मुंशी प्रेमचंद की कहानियों और दुष्यंत कुमार की गज़लों में हिंदी व उर्दू जिस तरह से मिली हुई हैं, वह साहित्य को एक ख़ूबसूरत आयाम देता है। जहां हिंदी, उर्दू और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं ने देश की आज़ादी में अहम भूमिका निभाई, वहीं आधुनिक भारत के जनक राजाराम मोहन राय ने अंग्रेज़ी का इस्तमाल भारत पुनर्जागरण के लिए किया। उन्होंने इस भाषा को अंग्रेज़ों और भारतीयों के बीच सेतु स्थापित करने के लिए भी किया। ये भी नहीं भूलना चाहिए कि पंडित नेहरू. आर के नारायनन, राजा राव, किरन देसाई, अरुनधति रॉय, जैसे भारतीय लेखकों ने अंग्रेज़ी भाषा का इस्तमाल करके ऐसी साहित्यिक रचनाएं लिखी जिनसे विश्व में देश का नाम रोशन हुआ है।
 किसी भी भाषा के विस्तार और विकास के लिए ज़रूरी है कि यह दूसरी भाषाओं के प्रति उदार रहे। जैसे हिंदी भाषा के चपाती, बिनदास जैसे शब्दों की तरह दूसरी भाषा में नहीं मिलते, ठीक वैसे ही दूसरी भाषा के कई शब्द ऐसे हैं जिनकी बराबरी के शब्द हिंदी में नहीं जैसे उर्दू के इरशाद, तख़लिया’ या अंग्रेज़ी के स्पैम व गुगल इत्यादि।
 किसी भी भाषा के विस्तार और विकास के लिए ज़रूरी है कि यह दूसरी भाषाओं के प्रति उदार रहे। दूसरी भाषा को खुद मे अपना लेना और खुद को दूसरी भाषा में मिला लेने की खूबी ही भाषा को विकसित करती है। इस बात से किसी को कोई गिला नहीं हो सकता की हिंदी हमारी बिंदी है। परंतु यह बात भी कम महत्वपूर्ण नहीं कि विविधताओं से परिपूर्ण इस देश में हिंदी के अलावा भी अन्य कई भाषाएं हैं जिन्हें बराबरी, प्रेम व सम्मान की दृष्टि से देखना आवश्यक है अन्यथा हम भाषाई अलगाववाद को बढावा देगा। भाषा किसी की बांदी नहीं होती। इसे किसी खूंटे से नहीं बांधा जाना चाहिए अन्यथा यह ऐसे पिंजरे के पंछी की तरह हो जाती है जिसे ज़ीने के लिए दाना तो मिलता है, पर उसकी ऊड़ान कुंद रह जाती है। तेरहवीं शताब्दी के इंग्लैंड के प्रसिद्ध वैज्ञानिक और दार्शनिक रोजर बेकन ने कहा था - ज्ञान की चॊटी पर हम विभिन्न भाषाओं को जान कर पहुंच सकते हैं। भाषा का इस्तेमाल दिलों की हदें मिटाने के लिए करें, हदें बनाने के लिए नहीं। दिलों की हदें जब टूटती हैं, तो दिल जुड़ते हैं और जब दिल जुड़ते है तो हम मुस्कुराते हैं और मुस्कुराने की कोई एक खास भाषा नहीं होती।
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प्रेस क्लब ने दिया रतन चंद निर्झर को साहित्य सेवा सम्मान

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बिलासपुर प्रेस क्लब में मंगलवार को साहित्यिक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसमें सुखराम आजाद मुख्यतिथि व कमांडेंट सुरेंद्र शर्मा अध्यक्ष तथा डा. एआर सांख्यान व डा. प्रशांत आचार्य विशेष रूप से उपस्थित रहे। इस अवसर पर जाने माने कवि लेखक रतन चंद निर्झर को मुख्यतिथि द्वारा टोपी व स्मृति चिन्ह देकर साहित्य सेवा सम्मान से सम्मानित किया गया। मंच का संचालन रविंद्र भटटा ने किया। कुलदीप चंदेल ने प्रेस क्लब में 2018 में आयोजित हुई साहित्यक संगोष्ठियों का लेखा जोखा प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि हर माह प्रेस क्लब में नियमित रूप से साहित्यकारों ने साहित्यक संगोष्ठी सजाई। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी के निधन पर 18 अगस्त को गोष्ठी में कविताओं के रूप में श्रद्धाजंलि भर दी गई। प्रदीप गुप्ता ने गजल गायिका जरीना बेगम को लेकर पत्र वाचन किया। अमर नाथ धीमान ने पहाड़ी गजल मना रे मन च आएगे दीऊ से जलाईगे, राम पाल डोगरा ने लिखूं गरीब की कहानी, हुसैन अली ने मेरी कबर के पत्थर पर हिंदुस्तान लिख देना, जीतराम सुमन ने दुनिया के रिश्ते कितने अजीब हो गए। शिव व पाल गर्ग ने यार जिंदगी जी कर चले गए, जिंदगी  क्या है हम यही सोचते रह गए,। प्रतिभा शर्मा ने त्यौहार खास होते हैं, अटल बिहारी वाजपेयी के जन्म दिवस पर कहा कि अटल सा ही चाहिए भारत मां के हर लाल , समपर्ण भाव से करते थे हर काम, रतनचंद निर्झर ने कूड़ादान को लेकर यूं कहा कि मुहल्ले के कोने में सुबह -सुबह खिल उठता है कूड़ादान, अश्विनी सुहिल ने मेहनत से उठा हूं, मेहनत का दर्द जानता हूं, ओंकार कपिल ने मुह मद रफी का गीत तुम जो मिल गए हो सुनाया। कुलदीप चंदेल ने अपने को महाज्ञानी समझने लगे हैं, कुछ मित्र मेरे शहर के , डा. जय नारायण कश्यप ने कोई उंगलियों में नचाए कोई उंगलियां चबाए, किशोक अलौकिक ने राजा रंक लड़ाई का होता अंत बुराई का। डा. प्रशांत आचार्य ने पूजने जब चला में शिव कला और श्यामल ,प्रदीप गुप्ता ने कई मुखौटे , जमुना ने त्याग कर गांव को मानव, जब शहर को भागा, अरूण डोगरा ने मंच के एक ओर द्वीप प्रज्जलवित था, रविंद्र भटटा ने जीवन के इस मोड पर कहां खो गया हूं। डा. एआर सां यान ने तू दबे पांव चोरी छिपे न आ, सामने वार कर फिर मुझे आजमा, सुरेंद्र शर्मा ने शहर में हर शख्स हैरान क्यों हैं। तथा सुख राम आजाद ने किस किस री गल करिए, कुण कुण इति उत हुऊ गया

साभार  http://www.janwaqtalive.com/प्रेस-क्लब-ने-दिया-रतन-चंद/
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[ साहित्‍य सुगंध पर प्रकाशित रचनाओं की मौलिकता के लिए सम्‍बधित प्रेषक ही उतरदायी होगा। साहित्‍य सुगंध पर प्रक‍ाशित रचनाओं को लेखक और स्रोत का उललेख करते हुए अन्‍यत्र प्रयोग किया जा सकता है । किसी रचना पर आपत्ति हो तो सूचित करें]
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