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गुनाह के रास्ते चलता बचपन..---- जगदीश बाली

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जो हाथ गुरु से आशीर्वाद पाने के लिए उठने चाहिए, जिन हाथों को कलम थाम कर अपना भविष्य लिखना चाहिए, जिन हाथों में किताबें शोभा देती हैं, अगर उन हाथों में चाकू-बंदूकें आ जाएं तो हम कैसे समाज और राष्ट्र निर्माण की ओर बढ़ रहे हैं, हर कोई अंदाज़ा लगा सकता है। जिस नाज़ुक उम्र में व्यक्तित्व तराशा जाता है और भविष्य संवारा जाता है, अगर वो बचपन गुनाह के रास्ते पर चलने लगे, तो ज़रा सोचिए उस राष्ट्र का मुस्तकबिल क्या होगा। जिस ज्ञान के मंदिर में ज्ञान की लौ जलनी चाहिए, उस मुकद्दस जगह पर अगर गोलियों की आवाज़ें आए, हिंसा की चीख-पुकार सुनाई दे, तो सोचिए - हमारी अति स्वछंदवादी शिक्षा व्यवस्था किस ओर जा रही है। जिस छात्र को अध्यापक अनुशासन का पाठ पढ़ा कर सही राह दिखाता है, अगर वो हाथ उस अध्यापक के गले तक जा पहुंचे, तो हमारी ’गुरु कुम्हार शिष कुंभ’ वाली परंपरा का क्या? जहां आदर्श व्यक्तित्व के बीज बोए जाते हैं, वहां चाकूबाज़ व बंदूकची कातिल क्यॊं पैदा हो रहे हैं? अगर अपने शिष्य को सही राह दिखाना, पथभ्रष्ट होने से रोकना, गलती पर टोकना, उसे संस्कार और शिष्टाचार का सबक सिखाना गुरु के लिए अब गुनाह है, तो आखिर शिक्षक और शिक्षा के मंदिरों का औचित्य क्या है? जिस देश में शिष्य अपने गुरु को देवतुल्य मानता आया है, वहीं आज इस रिश्ते में इतनी तल्खी और हिकारत आ गयी है कि नौबत कत्ल तक पहुंच जाती है।

                      रचनाकार परिचय

जगदीश बाली हिमाचल प्रदेश शिक्षा विभाग में स्‍कूल स्‍तर पर अंग्रेजी के प्राध्‍यापक के पद पर कुमारसैन में  कार्यरत है। समसामायिक विषयों पर लेखन के साथ साथ उनकी दो पुस्‍तकें The Spark is within You और चल चला चल आ चुकी है। 
अभी गुड़गांव के रेयान इं‍टरनेशनल स्‍कूल में 11वी कक्षा के छात्र द्वारा दूसरी कक्षा के छात्र प्रद्युम्‍न की हत्या की सिहरन ताज़ा  ही थी, कि अब दिल दहला देने घटना सामने आई है। चंद रोज़ पहले यमुनानगर के स्वामी विवेकानंद स्कूल में 12वी कक्षा के एक छात्र ने पैरैंट्स टीचर मीटिंग के दौरान ही स्कूल प्रिंसिपल की अपने पिता की रिवॉलवर से गोली मार कर कर हत्या कर दी। त्रिवैनी नगर के ब्राइटलेंड स्कूल मे भी पहली कक्षा के छात्र पर चाकू से हमला कर घायल करने का मामला सामने आया है। पिछले वर्ष दिल्ली के सुलतानपुरी इलाके के एक सरकारी स्कूल में अध्यापक का उसके ही शिष्य ने कत्ल कर दिया था। दिसंबर 2014 में झारखंड के एक स्कूल के सातवी कक्षा के तीन छात्रों ने अपने अध्यापक को इसलिए मार डाला क्योंकि उक्त अध्यापक ने उन्हें धुम्रपान न करने की सलाह दी थी। फ़रवरी 2012 में चिन्नई के एक स्कूल में नवी कक्षा के छात्र ने चाकू से अपने अध्यापक की जान ले ली। हमारे प्रदेश में भी इस तरह की घटनाएं होती आयी हैं। 14 दिसम्बर 1998 में अरसू के एक सरकारी स्कूल के नवी कक्षा के एक छात्र ने प्रधानाचार्य पर सरिये से वार किया जिसके कारण उनकी मौत हो गयी। पिछले वर्ष गंगथ के सरकारी स्कूल के एक छात्र ने सुबह-सवेरे स्कूल ग्राउंड में प्रधानाचार्य का गला पकड़ लिया था। उनकी गलती ये थी कि उन्होंने उस छात्र को एक विद्यार्थि की तरह अनुशासित होने की हिदायत दी थी। अध्यापकों से थप्पड़बाज़ी, गाली गलोज, बदसलूकी जैसी घटनाएं बढ़ती जा रही है। ज़ाहिर है कि धीरे-धीरे शिक्षण संस्थान अनुशासनहीनता, बदज़ुबानी, मारपीट, और हिंसा का केंद्र बनते जा रहे हैं। ये घटनाएं गुरु-शिष्य के बीच बिगड़ते रिश्ते की पराकाष्ठा है। यदि शिक्षण संस्थानों में ऐसा होता रहा, तो ऐसे असुरक्षित वातावरण में गुरु कैसे अपने कर्तब्य का निर्वाह कर पाएगा?
आखिर हमारे विद्यालयों में पढ़ रहे छात्र क्यों इतने हिंसक होते जा रहे हैं? मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि इस तरह की हिंसक घटनाओं का सबसे बड़ा कारण है गुरू-शिष्य-अध्यापक के बीच संवाद की कमी। गुरू-शिष्य कक्षाओं में मिलते तो हैं पर उनमें संवाद नहीं हो पाता। कई बार शिष्य गुरू की बात को नहीं समझ पाता, तो कई बार गुरू शिष्य तक नहीं पहुंच पाता। यही संवादहीनता मा-बाप और बच्चे के बीच में भी बनी रहती है। और कुंठित हो कर बच्चा गलत कदम उठाने पर उतारू हो जाता है।
मेरा मानना है कि अति स्व्छंदवाद भी छात्रों को पथ से भटका रहा है। अति सर्वत्र वर्जयेत अर्थात किसी भी चीज़ का आवश्यकता से अधिक होना नुकसानदेह होता है। अपने घर से ले कर विद्यालय तक वह अति स्वछंदवाद का शिकार होता जा रहा है। यह स्वछंदवाद उसके पहनावे, बात-चीत और व्यवहार में साफ़ झलकता है। उसकी वेश-भूषा को देख कर वह विद्यार्थी कम और फ़िल्मी हीरो ज़्यादा लगता है। जो पोशाक वह पहनता है, वो केवल रंग से ही स्कूल की वर्दी लगती है। तरह तरह के हेयर कट, कानों में बाली, बाज़ू में ब्रेसलैट, टाइट बॉटम पैंट, गले में चेन - ऐसा लगता है जैसे कोई मॉडल शूटिंग करने जा रहा है। उस पर तुर्रा ये कि अगर इस बावत अध्यापक उन्हें कुछ हिदायत दे या समझाए तो उनकी नज़रें गुरूजी की ओर तरेरी हो जाती हैं और और कई बार विभाग के आला अधिकारियों को शिकायत कर दी जाती है कि अध्यापकों ने ज़्यादती कर रखी है। अखबार में भी हैड्लाइन आ जाती है - छात्रों पर अध्यापकों का कहर, बाल कटवाए। कई बार वे इससे ज़्यादा भी कर लेते हैं, मार पीट और कत्ल भी। अब अध्यापक बेचारा करे तो क्या? उस पर बंदिशें लगाई जा रही है और विद्यार्थी मनमर्ज़ी करने के लिए स्वछंद है। इस उम्र में वह मन मर्ज़ी और विवेक में अंतर नहीं समझ पाता।
उधर अभिभावक और समाज ये समझने लगे हैं कि शिक्षक महज़ एक कर्मचारी है जिसे सरकार मोटी तनख्वाह दे रही है या वे मोटी रकम फीस के रूप में अदा कर रहे हैं। वे भूल गए हैं कि गुरु-शिष्य का रिश्ता ग्राहक और दुकानदार का पेशा नहीं है। शिक्षण के लिए शिष्य में ज्ञान प्राप्ति का जुनून व समर्पण की भावना होनी चाहिए और गुरु में अपने ध्येय के प्रति निष्ठा। अपने बच्चों के मन में शिक्षक के प्रति आदर-भाव भरने की बात तो दूर, आज अभिभावक उनकी शिकायत करने या उनके विरुद्ध मुकद्दमा दायर करने के लिए आतुर रहते हैं। ऐसी स्थिति में बच्चों में गुरु के लिए सम्मान की भावना कैसे विकसित होगी? ऐसे माहौल में गुरु और शिष्य के बीच में आत्मीयता नहीं रहती। किताबों की पढ़ाई किताबों से ही नहीं, बल्कि दिल से होती है। अध्यापक और शिष्य का रिश्ता वर्चस्व स्थापित करने का नहीं, बल्कि आपसी समझ का एक ज़हनी रिश्ता है।
घर बच्चे की पहली पाठशाला होती है और मा-बाप पहले अध्यापक। परन्तु कई मा-बाप अपने बच्चॊं के प्रति पोज़ेसिव होते हैं और उनकी हर उचित और अनुचित मांग को पूरा करने के लिए तैयार रहते हैं। बच्चों के मानस पटल पर इसका बहुत बार बुरा प्रभाव पड़ता है। वह ’नो’ सुनने के लिए तैयार नहीं हो पाता। कुछ माता-पिता ’बैस्ट पापा’ या ’बैस्ट मॉम’ कहलाने के चक्कर में अपने बच्चॊ की हर बात या मांग पर ’यैस’ कहने की होड़ में शामिल रहते हैं। इस होड़ में न माता-पिता, न ही बच्चे ये समझ पाते हैं कि ’नो’ शब्द की अहमियत कितनी है। ’यैस’ को सुनते-सुनते बच्चे को ’नो’ सुनना अखरने लगता है। उधर हमारी शिक्षा पद्धति ऐसी है कि बच्चा पढ़े चाहे न पढ़े उसे पास होना ही है। उसे लगता है कि गलत और सही से कोई फ़र्क नहीं पड़ता। ऐसे अति स्व्छंदवाद का जीवन जीते-जीते उसे अनुशासन में बंधना बोझ लगने लगता है। ’दरवाज़ा खुला है’ वाली निति पर चलते-चलते पता भी नहीं चलता कि बच्चा कब हाथ से निकल गया और राह से भटक गया। वास्तव में आज उचित समय पर कहा गया ’नो’ कल बच्चे के भविष्य के लिए ’यैस’ साबित होता है।
मा-बाप को याद रखना चाहिए कि एक चिंगारी को बुझाने के लिए चुल्लु भर पानी भी काफ़ी होता है, मगर जब वह ज्वाला बन जाए, तो दमकल विभाग का टनों पानी भी कुछ नहीं कर पाता। उठते ज़ख्म को वक्त पर दवा न मिले तो वह नासूर बन जाता है। बच्चे की बेहतर परवरिश के लिए डांट व दुलार, फ़टकार व तारीफ़, थपेड़े व पुचकार की ज़रूरत होती है, ताकि उसका विकास एकतरफ़ा न हो। शायर राहत इंदौरी ने सही फ़रमाया है:
नई हवाओं की सोहबत बिगाड़ देती है, कबूतरों को खुली छत बिगाड़ देती है.
जो जुर्म करते हैं इतने बुरे नही होते सज़ा ना देकर अदालत बिगाड़ देती है
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विकलांग ---- आशा शैली

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काठगोदाम से बरेली जाने वाले रेल-मार्ग पर ‘किच्छा’ एक छोटा-सा रेलवे स्टेशन है, काठगोदाम लाइन के लालकुआँ जंकशन से इस लाइन पर बहुत सारी गाड़ियाँ आती-जाती हैं। खास तौर पर बरेली, मथुरा, लखनऊ आदि मार्गों की गाड़ियों का तो दिन भर आना-जाना रहता है। उस दिन इस छोटे से रेलवे स्टेशन पर कुछ अधिक ही भीड़ थी, तरुणा को लालकुआँ जाना था, पर गाड़ी आने में अभी बहुत समय था इतनी देर तक खड़े रहना भी तो कठिन था। तरुणा दे दूर तक नज़र दौड़ाई। कहीं बैठने की जगह न पाकर तरुणा आगे बढ़ती गई। स्टेशन के आखिरी कोने के बेंच पर उसे थोड़ी-सी जगह मिल गई थी।
आस-पास के वातावरण को देख कर बैठने की इच्छा तो नहीं हो रही थी लेकिन अभी गाड़ी आने में काफी देर थी। लकड़ी के बेंच पर तरुणा के बगल में लगभग 30/35 वर्ष के एक साफ-सुथरा व्यक्ति को बैठा देखकर तरुणा को संतोष हुआ, चलो इतना भी परेशान होने की आवश्यकता नहीं है।
‘‘तुम कहाँ जाओगे अंकल?’’ तरुणा ने चौंककर देखा, उसके बगल में बैठा व्यक्ति सामने जमीन पर उकड़ूँ बैठे एक लगभग बूढ़े आदमी से बतिया रहा था। तरुणा ने पर्स में से एक पत्रिका निकाली और पढ़ने लगी। फिर भी उसके कानों में आवाजें तो पड़ ही रही थीं।
‘‘मुझे मथुरा जाना है बाबूजी। अभी गाड़ी आने में कितनी देर है?’’
‘‘वहाँ क्यों जा रहे हो, और इतने सामान के साथ तुम गाड़ियाँ कैसे बदलोगे? अभी यह गाड़ी तो बरेली तक जाएगी, फिर कासगंज बदलोगे।’’ तरुणा ने फिर एक बार पलटकर देखा सचमुच वह व्यक्ति जो शक्ल से बूढ़ा और बीमार लग रहा था अपने पास रक्खी साइकिल पर छः-सात गठरी लादे था। फटे-पुराने बोरों में बंधा सारा सामान अपने मालिक की हैसियत की चुगली खा रहा था। तरुणा की रुचि उस व्यक्ति में जगने लगी, अनायास ही उसके मुँह से निकल गया,
‘‘गाड़ी तो यहाँ सिर्फ पाँच मिनट ही रुकेगी बाबा, यह भाई साहब ठीक कह रहे हैं। तुम इतने सामान के साथ आखिर कैसे चढ़ पाओगे उसमें। भीड़ भी देख ही रहे हो। कौन चढ़ने देगा तुम्हें सामान लेकर? अगर जाना जरूरी है तो सामान घर छोड़कर जाओ।’’
‘‘अरे मैडम जी, आपको पता नहीं यह आदमी बहुत बीमार है और पेशाब की नली भी इसे लगी हुई है। ऐसी हालत में इतने सामान के साथ। आप ही समझाइये न, क्या हम इसके भले की बात नहीं कह रहे?’’
‘‘हाँ बाबा, ये भाई ठीक ही तो कह रहे हैं। यदि तुम इस तरह से बीमार हो तो क्यों जा रहे हो मथुरा, घर में आराम करो न? और इस सामान में क्या है ऐसा जो आपको ले जाना ज़रूरी हो गया है?’’ तरुणा को उसकी हालत पर दया भी आ रही थी और उसे देखकर असमंजस में भी थी।
‘‘कुछ ज्यादा नहीं, बौश भोण्डा-बोरतन ;बस भाण्डा-बरतनद्ध और कुछ दाल-चावल वगैरा है बेटी।’’ तरुणा को उसके बोलने से लगा कि वह बंगाली समुदाय से सम्बंध रखता है।
‘‘कहाँ से आए हो?’’
‘‘शक्ति फारम से आया हूँ माँ।’’ अब तरुणा को विश्वास हो गया कि उसका सोचना सही है। शक्ति फार्म बंगाली मज़दूर बहुल इलाका है।
‘‘ऐसी क्या मजबूरी है जो आप इस हालत में यह भाण्डा-बरतन और राशन भी उठा लाए हैं और साइकिल भी? शायद हम लोग आपकी कुछ मदद कर सकें।’’
‘‘अरे मैडम जी, यह आदमी, शक्ति फारम से यहाँ तक इस हालत में साइकिल पर इतना सामान लादकर पैदल आया है। मैंने इसे आते हुए दूर से देखा है।’’ तरुणा ने देखा, वह बूढ़ा दिखने वाला अधेड़ खाली-खाली आँखों से आसमान को ताक रहा था।
‘‘मुझे मेरे बेटे-बहू ने मुझे घर से निकाल दिया है। मेरे पास झोंपड़ी बनाने के लिए भी जगह नहीं है और जो छोटी-सी मढ़ैया थी वह उन्होंने कब्जा में ली है। मैं कहाँ रहता?’’
‘‘तो अब कहाँ रहेगे तुम? मथुरा में कोई रिश्तेदार है क्या??’’
‘‘नहीं, माँ! कोई नहीं, बस वृन्दावन जाकर कहीं बिरद आशरम में रह जाऊँगा।’’
‘‘तुम काम क्या करते हो?’’ इस बार फिर पास बैठा व्यक्ति बोल उठा।
‘‘लुहार हूँ बाबू, इस सामान में कुछ काम के औजार भी हैं। ठीक हो गया तो कुछ काम भी कर लूँगा।’’
‘‘देखो बाबा, न तो तुम्हें वृन्दावन में कुछ मिलने वाला है और न मथुरा में। सब जगह ठग बैठे हैं। तुम्हारे पास जो कुछ है, वह भी ठग लेंगे और तुम्हें कहीं जगह भी नहीं मिलेगी। इससे अच्छा तो यह है कि यह सब कबाड़ बेच दो और उस पैसे की रोटी खरीद कर खाओ। किसी मन्दिर गुरुद्वारे के सामने भी बैठोगे तो तुम्हें रोटी मिल जाएगी। हमारा कहना मानो और यह सब बेच दो। सबसे पहले तो तुम इस साइकिल को बेचो। जो थोड़ा-बहुत पैसा मिलता है, लेकर फिर अगर तुम्हें लगता है कि मथुरा-वृन्दावन जाकर तुम्हारा कल्याण होगा तो अवश्य जाओ। पर बिना सामान के तुम गाड़ी में भी चढ़ पाओगे। यहाँ से मथुरा का किराया भी ज्यादा नहीं है, पैसेंजर गाड़ी में 35/- रुपए का टिकट है। जाओ, अभी गाड़ी आने में पूरे दो घण्टे हैं, इस सामान को बेच दो।’’
अब तक आस-पास बैठे बहुत से लोग उन लोगों की बात-चीत में रुचि लेने लग गए थे। प्लेटफार्म पर लगी भीड़ में सभी ने बाबू लगने वाले व्यक्ति की बात का समर्थन किया तो अध्ेड़ रोगी सोचने पर विवश हुआ-सा लगने लगा।
‘‘बाबा, ये भाई साहब ठीक कह रहे हैं, इस बीमारी की हालत में सबसे पहले तो तुम्हें इस साइकिल से मुक्ति पानी चाहिए।’’ तरुणा ने उस ज़ंग लगी साइकिल की ओर संकेत किया, जिस पर बंधी हुई गठरियाँ लटकी हुई थीं, ‘‘फिर जो चार पैसे मिलते हैं उन्हें जेब में डालो और कहीं फुटपाथ पर भी सो रहोगे तो कोई परेशानी नहीं होगी। जहाँ जाना चाहो चले जाना। कहाँ ठेलते रहोगे यह सारा ताम-झाम?’’
‘‘पर माँ! मुझे तो पता नहीं कि यह सामान कहाँ बेचना है।’’
‘‘स्टेशन से बाहर ही ज़रा दूर पर कबाड़ी बैठे हैं। बाहर होटल वाला है, राशन उसे दे दो।’’ तमाशा देखने वाले एक तीसरे मुसाफिर ने कहा।
‘‘तुम्हें किस गाड़ी से जाना है भैया?’’ तरुणा ने उसी से पूछ लिया तो वह सकपका कर बोला, ‘‘मुझे भी उसी गाड़ी से जाना है जिससे यह जाना चाह रहा है।’’
‘‘उसके लिए तो अभी बहुत समय है, यदि आप इनके साथ बाहर तक चले जाएँ और इनका सामान ठीक से बिकवा दें तो आपका भी भला हो जाएगा। कुछ पुण्यलाभ आप भी करलो।’’ बोलने वाला बगलें झाँकने लगा इस पर वह बाबू फिर कूद पड़ा,
‘‘भैया जी, मुझे लालकुआँ जाना है और मेरी गाड़ी आने में अब अधिक समय नहीं रहा, वरना मैं इन बुजुर्ग के साथ चला जाता। आपके पास अभी बहुत समय है, आप ड्डपा करके इन के साथ चले जाइये।’’
‘‘बाबा, कुछ मेरे काम की चीज़ है तो मैं भी तुम्हें पैसे दे देता हूँ, मुझे गठरी खोलकर दिखाओ।’’ पास ही खड़े एक तमाशबीन ने कहा तो बाबा ने गठरी खोली। पुरानी आरी, बसोला और ऐसे ही कुछ औज़ार लेकर उस व्यक्ति ने अस्सी रुपए रोगी के हाथ पर धरे तो उसकी आँखें चमक उठीं। वह एक झटके से उठ खड़ा हुआ। उसे बाहर जाने को तैयार देखकर एक-दो युवकों को उनकी माताओं ने जो उनके साथ थीं उस व्यक्ति की सहायता करने के लिए उकसाया। तभी लालकुआँ जाने वाली गाड़ी ने स्टेशन में प्रवेश किया और भगदड़ मच गई। तरुणा भी भाग कर सामने पड़ने वाले डिब्बे में चढ़ने लगी तो गार्ड ने पूछ लिया, ‘‘आप ने देखा नहीं, ये विकलांग कम्पार्टमेंट है?’’ अब जो तरुणा ने चौंककर देखा तो यह वास्तव में विकलांग कक्ष था और इसके साथ ही दूसरा गार्ड का कक्ष। गार्ड अपने कक्ष के दरवाजे पर खड़ा था।
‘‘क्षमा कीजिए, जल्दीबाज़ी में......’’
‘‘कहाँ जाएँगी?’’
‘‘लालकुआँ।’’
‘‘बैठ जाइए, आगे जाने के लिए आपके पास समय नहीं है। गाड़ी चल पड़ेगी।’’ वह बेबस-सी भीतर जाकर बैठ गई और खिड़की से उस साइकिल वाले अधेड़ बूढ़े को देखने लगी जो दोनों युवकों के साथ स्टेशन से बाहर जा रहा था।
उसे अच्छा लगा कि अब वह बीमार व्यक्ति बेकार के सामान को नहीं ढोयेगा। अब वह पलटकर कम्पार्टमेंट का जायज़ा लेने लगी तो उसे यह देखकर संतोष हुआ कि गलत कम्पार्टमेंट में बैठने वाली वह अकेली दोषी नहीं है, उसके साथ स्टेशन की बेंच पर बैठा वह उसका पड़ौसी भी सामने बैठा था। उसने इत्मीनान से पर्स में से किताब निकाल ली जो उसने खाली समय में पढ़ने के लिए घर से चलते समय पर्स में रख ली थी। उस रोगी के कारण समय रहते भी वह वहाँ कुछ पढ़ नहीं पाई थी। तभी उसे लगा कि पर्स में से कुछ नीचे गिरा है। वह पेन था, जिसे उठाने के लिए तरुणा को नीचे झुकना ही पड़ेगा और वह झुकी।
पैन फिसलकर सामने बैठे व्यक्ति की तरफ चला गया, तरुणा ने देखा वह दोनों पैरों से विकलांग था, उसके पैर टेढ़े थे। चौंक कर तरुणा ने उसकी ओर देखा, वह हर बात से बेपरवाह आँखें बंद किए कुछ गुनगुना रहा था। उसके चेहरे पर असीम संतोष था, जैसे वह कोई बहुत बड़ा मोर्चा जीतकर आया हो। तरुणा सोचने लगी, यदि ऐसी सोच उस बीमार अधेड़ के बच्चों की भी होती तो.....? हाँ, शायद वे विकलांग थे, बु( से विकलांग। यह व्यक्ति तो हरगिज़ विकलांग नहीं था।

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डॉ. कांता शर्मा का बुधवार सुबह देहांत

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हिमाचल प्रदेश की चर्चित कवयित्री एवं साहित्यकार डॉ. कांता शर्मा का बुधवार सुबह देहांत हो गया। मंडी जिला से संबंध रखने वाली कांता शर्मा संवेदनशील कवयित्री, सांस्कृतिक शोधार्थी के अलावा एक अच्छी मंच संचालक भी थीं। उनके निधन से साहित्यिक जगत में शोक की लहर है। वे कुछ समय से बीमार चल रही थीं। दो दिन पूर्व उन्हें पीजीआई ले जाया गया था जहां बुधवार तड़के करीब साढ़े चार बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके परिवार में उनके पति नागेंद्र शर्मा, बेटी आकांक्षा और एक बेटा आयुष है।
29 दिसंबर 1966 को जन्मी कांता शर्मा जिला शिक्षण एवं प्रशिक्षण संस्थान में बतौर प्रवक्ता के तौर पर कार्यरत थीं। हंसमुख और मिलनसार स्वभाव की कांता ने अपनी कविताओं और शोध कार्यों से हिमाचल के हिंदी साहित्य को समृद्ध किया। छोटी उम्र में ही शादी के बंधन में बंध जाने के बावजूद कांता ने दसवीं के बाद बीए और हिंदी में एमए की शिक्षा पूरी की।
इसके बाद एमफिल और डॉ. धर्मवीर भारती के उपन्यासों पर पीएचडी तक का सफर घर-गृहस्थी की जिम्मेदारियों के साथ पूरा किया। इसमें उनके पति नागेंद्र शर्मा का योगदान सराहनीय रहा। डॉ. कांता शर्मा के दो कविता संग्रह और दो शोध ग्रंथ प्रकाशित हो चुके हैं। वे हिंदी के अलावा पहाड़ी भाषा में भी कविताएं लिखती थी। उनकी रचनाएं पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती थी। इसके अलावा दिल्ली दूरदर्शन और आकाशवाणी से भी उनकी रचनाओं का प्रसारण होता रहा है। पांडुलिपियों के सर्वेक्षण में भी उनका कार्य सराहनीय रहा है। वे साहित्य की कई संस्थाओं से जुड़ी हुई थीं।
हिमाचल के साहित्यकारों और साहित्यिक संगठनों ने कांता शर्मा के निधन पर शोक व्यक्त किया है। हिमाचल प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ के राज्य अध्यक्ष दीनू कश्यप और जनवादी लेखक संघ के सचिव प्रो. सुंदर लोहिया ने कहा कि कांता शर्मा संभावनाशील कवयित्री थी। मशहूर कहानीकार एसआर हरनोट ने कांता शर्मा के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहा कि यह विश्वास ही नहीं होता है कि कांता शर्मा हमारे बीच नहीं रही।


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यूं भी कोई चुपचाप जाना होता है ? ---- SR Harnot

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SR Harnot 
यूं भी कोई चुपचाप जाना होता है ?
हैलो मॉम, मैं हरनोट बोल रहा हूं।

मैं उस 18 वर्ष की 84 वर्षीय युवा लड़की से रोज बात किया करता था। वे हम सभी की माॅम थी, क्‍योंकि उन्‍हें कभी
भी 'आण्‍टी' बोलना पसन्‍द नहीं था। 4 दिसम्‍बर, 2015 को मैं शिमला आकाशवाणी उनके साथ गया था। पिछले कई दिनों से उनकी कहानियों की किताब 'जिंदानी' की कहानियां प्रसारित हो रही थीं जिसकी रिकार्डिंग वे अपनी आवाज में करवा रही थीं। अब उनका प्रसारण समाप्‍त हो रहा था, इसलिए मुझे उनकी कहानियों पर बात करने के लिए आकाशवाणी से सपना जी ने बुलाया था। हम जब साढ़े ग्‍यारह बजे स्‍टुडियो पहुंचे तो तत्‍तकाल रिकार्डिंग के लिए बुलाया गया लेकिन इसी पल कोई दूसरी रिकार्डिं होनी थी, इसलिए आधे धण्‍टें मैं और माॅम खूब बातें करते रहें, इसी बीच उनके अपने मोबाइल से कई चित्र भी खींच लिए------विडंबना देखिए, मेरे पास वही चंद तस्‍वीरें आज शेष रह गईं और वे चुपचाप चली गईं। वैसे उनके चले जाने की उम्र भी थीं, लेकिन जिस तरह वे गईं, विश्‍वास नहीं होता। एक साल पहले सोए सोए उनके पती सतीश जी चुपचाप निकल गए, और वैसे ही सरोज जी भी, लेकिन जिस तरह यह सब हुआ वह दिल दहलाने वाला था।
5 दिसम्‍बर को उन्‍होंने गिरीश और शीला से खूब बातें फोन पर कीं लेकिन मैं घर पर नहीं था और उस दिन कोई बात उनसे नहीं हुई। मैं सुन्‍नी में था और जब आज सुबह 5 बजे दिल्‍ली से अशोक ने फोन पर बताया तो मैं दंग रह गया। अशोक उनका मुंह बोलता बेटा है जो दिल्‍ली और शिमला में उनका पूरा ध्‍यान रखता है। सरोज जी के दोनों बेटे विदेशों में हैं और बेटी शायद हैदराबाद में। वे शिमला में अकेली रहती थीं। 5 की रात यानि 3 बजे के करीब शायद वे बाथरूम जाने के लिए उंठीं थीं। वे सर्दी से बचने के लिए हीटर लगाए रखती थीं और लगता है उठते हुए रजाई या चादर का किनारा हीटर पर पड़ गया। जब वे वापिस आने लगी होंगी तब तक उनका स्‍टी रूम जहां वे अब सोया करतीं, धुंए से भर गया था। आग ने पूरा साम्राज्‍य जमा लिया था उस कमरे में। वे वाकर के सहारे चलतीं थीं, सोचा होगा, बाथरूम में बचाव हो जाएगा, लेकिन वैसा नहीं हुआ और उनका दम घुट गया। उनके पड़ोसी ने जब धुएं और अाग की लपटें खिड़की से बाहर आते देखीं तो उनके एक पड़ोसी बातिश उनके घर आए लेकिन दरवाजा भीतर से बंद था, पुलिस और फायर ब्रिगेड बुलाई गई। भीतर वह 18 वर्ष की लड़की बाथरूम के साथ अचेत पड़ी थी, स्‍नोडन अस्‍पताल ले जाया गया लेकिन वह पहले ही चली गई थीं। अशेाक शिमला पहुंच गया है। उनका बेटा विदेश से शायद कल रात पहुंचेगा। बेटी कल यानि 7 की सुबह पहुंच जाएगी और उनका दाहसंस्‍कार मंगलवार को किया जाना है, आप यदि इस पोस्‍ट को पढ़ें तो अशोक से 09811418182 या भाई बातिश से 09418647046 से सम्‍पर्क कर लें और उनकी अंतिम यात्रा में अवश्‍य शामिल होने का प्रयास करें, पता नहीं मुझे यह अवसर मिलता है या नहीं, मैं शिमला से बाहर हूं।
हमारी संस्‍था हिमालय साहित्‍य मंच ने उन्‍हें वर्ष 2013 के 'आजीवन उपलब्धि सम्‍मान' से नवाजा था। पिछले दिनों
हम से बिछड़े रामदयाल नीरज जी को भी उन्‍हीं के साथ यह सम्‍मान दिया गया था। आज वे दोनों ही नहीं है, बस उनकी यादें शेष रह गई हैं। मंच का प्रयास है कि शीघ्र ही उनको हम मिलजुल कर याद करेंगे, आपका सहयोग रहा तो।
मेरे पास उनकी ये चंद तस्‍वीरें हैं और आंखों में आंसू हैं-----इन्‍हें ही यहां आपके लिए छोड़ रहा हूं, आगे कुछ कहने का साहस नहीं है-------क्‍या ऐसे भी कोई जाता है ? आज उनके अनेक काम शेष हैं, जिंदा हैं और जिंदा रहेंगे, हमेशा के लिए।
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दुश्मनों से घिरा हूँ

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दुश्मनों से घिरा हूँ तू देख ज़रा
फिर भी जिंदा हूँ तू देख ज़रा
खुश है तू खुश रह सदा सदा
मर के जी रहा हूँ तू देख ज़रा
कोन अपना कोन पराया यहाँ
कितना अकेला हूँ तू देख जरा
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[ साहित्‍य सुगंध पर प्रकाशित रचनाओं की मौलिकता के लिए सम्‍बधित प्रेषक ही उतरदायी होगा। साहित्‍य सुगंध पर प्रक‍ाशित रचनाओं को लेखक और स्रोत का उललेख करते हुए अन्‍यत्र प्रयोग किया जा सकता है । किसी रचना पर आपत्ति हो तो सूचित करें]
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