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स्मृति - ( 1 ) नवेन्दु घोष रचित 'चुनिन्दा कहानियां' का लोकार्पण ।

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हिन्दी फिल्म उद्योग की देवदास, सुजाता, बंदिनी, आर-पार,परिणीता, बिराज बहू, यहूदी तीसरी कसम, अभिमान तृषाग्नि जैसी फिल्मों को दर्शक भला कैसे भुला सकते हैं और इन्हीं फिल्मों से जुड़ा जाना-माना नाम है नवेन्दु घोष । इन क्लासिक फिल्मों के वे पटकथा लेखक रहे। पटना में पले-बढ़े, आजीविका के लिए बंबई में कार्यरत और पुणे के फिल्म इंस्टीट्यूट में सिनेमा के अध्यापन के साथ-साथ उनमें साहित्यिक लेखक भी बसता था। गीतकार प्रदीप, नीरज, शैलेन्द्र की भांति वे भी विशुद्ध साहित्यिक धारा के वाहक थे। फ़र्क सिर्फ़ इतना था कि वे सभी काव्य जगत से थे और नवेन्दु गद्य से। वे सभी हिन्दी साहित्य के संवाहक होते हुए फिल्म जगत से जुड़े और नवेन्दु घोष ने बागंला साहित्य से हिन्दी फ़िल्म जगत में प्रवेश किया। जब वे 1951 में बंबई गए तो बिमल राय ने उन्हें बतौर पटकथा लेखक अपनी टीम में शामिल होने का आमंत्रण दिया।
यूं तो उनके साहित्य लेखन में सारे भारत के दर्शन होते हैं फिर भी उसमें राष्ट्रीय आंदोलन, बंगाल का अकाल, विभाजन पूर्व दंगे, पचास के दशक का औद्योगीकरण, साठ के दशक की राजनीतिक उथल-पुथल, सत्तर के दशक के परमाणु परीक्षण आदि का रेखांकन मिलता है। संभवत: फिल्मों में पटकथा लेखन की वजह से ही बांगला में उनकी डाक दिए जाई, फीयर्स लेन, अजोब नौगरेर काहिनी जैसी कहानियां स्कूल एवं कॉलेज के पाठ्यक्रमों से भले ही अलग-थलग रहीं हों लेकिन बांगला पाठकों का उनके लेखन से नियमित जुड़ाव रहा । साथ ही फिल्म लेखन जगत में उनका अवदान अविस्मरणीय रहेगा। हां, कुछेक अनूदित कहानियां हिन्दी की धर्मयुग, कहानी, माया, हंस, राष्ट्र भारती, मनोरमा, बायस्कोप जैसी पत्रिकाओं में भी प्रकाशित हुई। इन्हीं चुनिंदा कहानियों को संकलित कर हिन्दी में कहानी संग्रह प्रकाशन का उन्होंने सपना संजोया था, जिसे अभी हाल ही उनके निधन के बाद उनकी बेटी रत्नोतमा ने साकार किया। हाल ही में 27 मई 2009 को कोलकाता के भारतीय भाषा परिषद के सहयोग से परिषद सभागार में नवेन्दु घोष के हिन्दी कहानी संग्रह ‘चुनिन्दा कहानियां’ का लोकार्पण बांग्ला के जाने-माने अभिनेता सौमित्र चटर्जी ने किया । इस मौके पर उन्होंने कहा कि नवेन्दु घोष एक ऐसा नाम है जो किंबदंती बन गया है। उनकी कहानियों में आज़ादी का स्वर मुखरित हुआ। घोष के लेखन का फणीश्वर नाथ रेणु के साथ सामंजस्य बताते हुए सौमित्र चटर्जी ने कहा कि हिन्दी संकलन के माध्यम से उनका लेखन बांग्ला की सीमा से निकल अनेकों तक जा पहुंचा है। इस अवसर पर भारतीय भाषा परिषद के निदेशक विजय बहादुर सिंह ने कहा कि उनकी कहानियां हाथ पकड़कर सीधे जीवन के सम्मुख खड़ा कर देती हैं। हिन्दी की सुपरिचित लेखिका अलका सरावगी ने भी इस पहल की सराहना करते हुए नवेंदु घोष के लेखन पर संक्षिप्त रौशनी डाली।
कार्यक्रम के आरंभ में परिषद के मंत्री नंदलाल शाह ने स्वागत वक्तव्य दिया। रंगकर्मी वीना किचलू ने

फ़ातिमा का क़िस्सा' कहानी का भावपूर्ण पाठ किया। श्रद्दांजलि के तौर पर शुभंकर घोष निर्देशित वृ्त्त चित्र ‘मुकुल’ प्रदर्शित किया गया तथा नवेन्दु घोष निर्देशित फ़िल्म ‘तृषाग्नि’ भी दिखाई गई। आशा है नवेंदु घोष लिखित क्लासिक फ़िल्मों की भांति रोशनाई प्रकाशन द्वारा प्रकाशित ‘चुनिंदा कहानियां’ का उनके प्रशंसकों तथा हिन्दी पाठकों द्वारा बड़े पैमाने पर स्वागत किया जाएगा ।
- नीलम शर्मा ‘अंशु’
31-5-2009

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