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रूठ कर हमसे जो तुम यूं चले जाओगे,
सच कहते हैं कि तुम बहुत याद आओगे! - (1)
( 29 सितंबर जन्मदिन पर विशेष)

उसे पढ़ने-लिखने का शौक़ क़तई नहीं था। सातवीं क्लास तक आते-आते वह कई स्कूल बदल चुका था, लगभग 14 स्कूल। जनाब! पढ़ाई के नाम पर जीरो और शैतानियों में हीरो था। शैतानियों के लिए सज़ा भी मिलती थी, जम कर धुलाई भी होती। कहते हैं उनके घर जो मेहमान एक बार आता, वह दुबारा आने का नाम न लेता या यूं कहें कि तौबा कर लेता क्योंकि पहली बार आने पर ही उसके पैसे चोरी हो जाते थे। चोरी करना उस बच्चे का शौक था। जो मज़ा चुराने में था, भला वह मांगने में कहाँ था ? (और मांगने पर कौन सा हर चीज़ मिल ही जाती है।) तभी तो कालांतर में उसने यह कहा कि बाप बड़ा न मईया, द होल थिंग इज़ दैट कि सबस बड़ा रुपैय्या।

शरारतों का आलम यह था कि स्कूल जाते वक़्त पड़ोस की एक लड़की उससे कहा करती थी – ‘बड़ी होकर मैं तुझसे शादी करूंगी।’ चिढ़कर इस बच्चे ने एक दिन गुलेल से पत्थर दे मारा, और साहब! फ़िर क्या था, उस लड़की का कान ही ग़ायब हो गया। आप सोचिए ज़रा एक लड़की का कान ही न रहे तो क्या हालत होगी ? आप उत्सुक होंगे इस बच्चे का नाम या परिचय जानने को। जी हाँ, तो वह बच्चा था....... ग्लैमरस, मायाबी और स्वप्निल फिल्मी दुनिया का हास्य कलाकार यानी महमूद ।

महमूद साहब ने बचपन में लोकल ट्रेन में पारले की पिपरमेंट गोलियां भी बेचीं। आठ साल की उम्र में एक्टिंग का काम भी मिला। बॉम्बे टॉकीज़ की क़िस्मत, फ़िल्मस्तान की शिकारी, सोना-चाँदी आदि फ़िल्मों में काम किया। मगर एक्टिंग का शौक कभी नही रहा। शौक था, कार ड्राइविंग का। और इस तरह महमूद ड्राइवर बन गए। ज्ञान मुखर्जी, गोपाल सिंह नेपाली, गीतकार भरत व्यास, पी. एल. संतोषी की गाड़ियां चलाईं।

देवानंद साहब मधुबाला को लेकर फ़िल्म बना रहे थे, नादान। संतोषी जी के दफ़्तर के पास शूटिंग चल रही थी। सीन में एक बस कंडक्टर का कैरेक्टर था। मधुबाला जी के साथ जूनियर आर्टिस्ट नर्वस हो गया। फ़िल्म के निर्देशक को मालूम था कि महमूद दूसरों की अच्छी नकल कर लेते हैं। उन्होंने संतोषी जी के दफ़्तर से महमूद को बुलवा भेजा। बतौर ड्राइवर उन्हें पचहत्तर रुपए पगार मिलती थी। महमूद से कहा गया कि तीन-चार दिन की शूटिंग है, सौ रुपए रोज़ाना मिलेंगे। महमूद को अचरज हुआ कि चार महीनों की तनख्वाह चार दिनों में! महमूद के बॉस संतोषी जी ने काम करने की अनुमति दे दी। महमूद ने फर्स्ट क्लास सीन दिया। अब हुआ ये कि कहाँ तो मधुबाला के साथ जूनियर आर्टिस्ट नर्वस हो रहा था और अब महमूद का शॉट देख मधुबाला नर्वस हो गईं।


तो धीरे-धीरे अधिक आमदनी वाली एक्टिंग महमूद को भा गई। एक दिन महमूद अपने दोस्त किशोर कुमार के पास गए और बोले, मुझे एक्टिंग करनी है। तो किशोर कुमार साहब में कहा कि एक नाई कभी नहीं चाहेगा कि दूसरा नाई उसके बगल में दुकान खोल ले। तुम डायरेक्शन, कैमरा, म्युज़िक जिसमें कहो, मैं हेल्प करूंगा परंतु एक्टिंग में नहीं। तो महमूद ने पलट कर जवाब दिया, देखना मैं एक दिना इतना नाम कमाऊंगा और तुझे अपनी फ़िल्म में लूंगा। और, महमूद साहब ने यह कर भी दिखाया। उनके द्वारा प्रोड्यूस की गई सब फ़िल्मों में किशोर कुमार रहे।

धीरे-धीरे महमूद को काम मिलने लगा जॉनी वॉकर की बदौलत उन्हें ‘सी.आई.डी’ में अच्छा रोल मिला। राजकपूर के साथ ‘परवरिश’ में काम किया। इस फ़िल्म का एक गीत ‘मामा-मामा’ सुपरहिट हुआ। फ़िर फ़िल्मस्तान की फ़िल्म ‘अभिमान’ जिसके निर्देशक महेश कौल थे, ने जुबली मनाई।

फ़िल्म ‘छोटी बहन’ से महमूद को पहली बार हीरो बनने का मौक़ा मिला। फ़िर शबनम, क़ैदी नं. 911, रोड नं. 303, फर्स्ट लव जैसी15-20 फ़िल्मों में हीरो की भूमिका निभाई। एल.वी. प्रसाद की फ़िल्म ससुराल से महमूद कॉमेडियन बने।

एक ज़माना ऐसा भी था जब महमूद के बिना फ़िल्म नहीं बनती थी। उन दिनों शुभा खोटे, धुमल और महमूद की तिकड़ी काफ़ी हिट हुई थती। एक मज़ेदार बात यह कि..... महमूद शिवजी के भक्त थे। जिस फ़िल्म में उनका नाम महेश होता था, वह सुपरहिट होती थी।

महमूद के पिता मुमताज़ अली भी स्टार रहे हैं तथा उनकी बहन मीनू भी फ़िल्मों में काम करती रहीं हैं।
अभिनय के साथ-साथ महमूद साहब ने फ़िल्म निर्माण के क्षेत्र में भी क़दम रखा। पहली फ़िल्म बनाई छोटे नवाब। इस फ़िल्म में उन्होंने संगीतकार आर. डी. बर्मन को ब्रेक दिया। इस फ़िल्म में आर. डी. ने अभिनय भी किया था।

1953 में मीना कुमारी जी की बहन मधु से महमूद साहब की शादी हुई लेकिन यह शादी ज़्यादा दिनों तक नहीं चली। फ़िल्म भूत बंगला की शूटिंग के दौरान उनकी मुलाक़ात एक अमेरिकन युवती से ट्रेसी से हुई। ट्रेसी उनकी जीवनसंगिनी बनी। लेकिन कालांतर में वे भी अमेरिका लौट गईं।

उनका मानना था कि इन्सान को ज़िंदगी में इतनी जद्दो-ज़हद करनी पड़ती है कि उसे दो फुट ज़मीन भी नसीब नहीं हो पाती। इसलिए उनकी ख़्वाहिश थी कि मृत्यु के बाद उनके शरीर को दफ़नाने की बजाय जला कर अंत्येष्टि की जाए। वे इस धरती की माटी में मिल जाना चाहते थे।

29 सितंबर 1932 को जन्में महमूद अली की प्रमुख, मशहूर फ़िल्में रहीं – भूत बंगला, पड़ोसन, गुमनाम, बॉम्बे टू गोया और प्यार किए जा उनके द्वारा निर्देशित अंतिम फ़िल्म थी – दुश्मन दुनिया के। फ़िल्मों से अवकाश के बाद उनका अधिकतर समय बंगलौर में गुज़रता था। उन्होंने मंद बुद्धि बच्चों के लिए स्कूल तथा अस्पताल भी बनवाया। 23 जुलाई 2004 की सुबह लंबी बीमारी के बाद अमेरिका में उनका निधन हो गया।

2 Responses so far.

  1. इस जानकारी के लिये धन्यवाद ।महमूद अली जी को विनम्र श्रद्धाँजली

  2. bahut khub.plz come to me also.

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