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कैसे कैसे रिश्ते
- नीलम शर्मा ‘अंशु’

रोज़ की भाँति नीलोफ़र दफ़्तर आई। आते ही मेज़ पर पड़े ख़तों पर नज़र पड़ी। उनमें से छाँटकर एक ख़त उसने पहले खोला और एक ही साँस में पढ़ डाला। ख़त पढ़ते ही उसकी आँखें छलछला आईं। साथ वाली सीट पर बैठने वाली मीता अभी आई नहीं थी। सामने वाली सीट पर मिश्रा जी अख़बार पढ़ने में तल्लीन थे। उनका ध्यान नीलोफ़र की तरफ नहीं गया। वे अपने में मग्न अख़बार पढ़ते रहे। चंद लम्हों बाद नीलोफ़र के आँसू खुद-ब-खुद थम गए। ख़त चंडीगढ़ से आया था, भंडारी अंकल का था। वे राजकिशोर अंकल के सहकर्मी भी रह चुके थे।
ख़त पढ़ते ही उसे बेचैनी सी महसूस होने लगी। यकायक आई इस ख़बर ने उसके दिल-ओ-दिमाग में उथल-पुथल मचा दी थी। चाहते हुए भी उसका दिल इस बात पर यकीन नहीं कर पा रहा था। यकायक अतीत की कुछ घटनाएं फ्लैशबैक की भाँति उसके स्मृतिपटल पर दौड़ने लगीं। नज़रों के समक्ष ‘दैनिक प्रभात’ का वह विज्ञापन था –‘निजी दफ्तर के लिए कुछ क्लर्क चाहिएं। इच्छुक उम्मीदवार विस्तृत विवरण सहित आवेदन करें।’
नीलोफ़र ग्रेजुएट थी। साल भर पहले वह चंडीगढ़ से ग्रेजुएशन कर जलपाईगुड़ी आ गई थी। मक़सद था दुर्गा पूजा देखना और सालों के अंतराल के बाद अपनी जन्मभूमि का सैर-सपाटा। इसी शहर में उसकी पैदाईश हुई थी। पिता जलपाईगुड़ी स्थित एक कंस्ट्रक्शन कंपनी में कार्यरत थे। नीलोफ़र की स्कूली तालीम पूरी होते ही उसकी कॉलेज की पढ़ाई के लिए पिता ने परिवार को चंडीगढ़ भेज दिया था। दुर्गा पूजा के दौरान ही अचानक माँ की तबीयत ख़राब हो गई। पेट में दर्द उठने लगा। सिलीगुड़ी नर्सिंग होम ले जाया गया। डॉक्टरों ने तुरंत ऑप्रेशन करवाने का सुझाव दिया। आनन-फानन में ऑप्रेशन भी हो गया। डॉक्टर ने कुछ ज़रूरी हिदायतों के साथ कुछ दिनों बाद छुट्टी दे दी। साथ ही ज़्यादा लंबा सफ़र करने की निषेधी और साल भर के बेड रेस्ट की सलाह भी।
नीलोफ़र का सार कार्यक्रम गड़बड़ा गया। चंडीगढ़ में वह अपनी सहेलियों से वादा कर आई थी कि महीने भर के सैर-सपाटे के बाद लौट कर उनके साथ एम। ए. में दाख़िला लेगी। पर, अब डॉक्टर की हिदायतों का पालन ज़रूरी था। माँ को आराम और देखभाल की ज़रूरत थी। फिर भी चंडीगढ़ जाकर पढ़ाई पूरी करने को उसका मन मचल उठता था। यही सोचकर उसने ‘दैनिक प्रभात’ के उस विज्ञापन के लिए आवेदन कर डाला था। कुछ दिनों बाद उसका जवाब भी आ पहुँचा। पत्र राजकिशोर जी का था, चंडीगढ़ से। उन्होंने उत्सुकतावश नीलोफ़र के आवेदन का जवाब दिया था-
‘बेटा! कहाँ जलपाईगुड़ी और कहाँ चंडीगढ़ के लिए आवेदन किया है। हमारी तो एक छोटी सी सामाजिक संस्था है – ‘परिवार मिलन’, जो लोगों की वैवाहिक समस्याओं का समाधान करती है। मात्र सात-आठ सौ रुपये जेब-खर्च ही दे पाते हैं हम। अत: इस काम के लिए स्थानीय बच्चे ही सूट करते हैं। इतनी दूर से तुम्हारा आना ठीक न होग। तुममें योग्यता है, एक से बढ़कर एक नौकरियां मिल जाएंगी तुम्हें। तुम्हारी डिग्री तो चंडीगढ़ विश्वविद्यालय की है, पर तुम इतनी दूर कैसे जा पहुँची ? ईश्वर ने चाहा तो बेटा, तु्म्हें नौकरी ज़रूर मिल जाएगी। चाहो तो हमारे साथ यूं ही पत्राचार बरक़रार रखो, हमें खुशी होगी।’ बस यूं नीलोफ़र का राजकिशोर जी के साथ पत्राचार का सिलसिला शुरू हुआ। वह उन्हें अपने सगे अंकल से बढ़कर मानती। वे भी पत्रों में ढेर सारा प्यार और अपनत्व उड़ेल भेजते। देखते-देखते वक़्त गुज़रता जा रहा था। इसी बीच नीलोफ़र को भारत सरकार की नौकरी मिल गई और वह जलपाईगुड़ी से कलकत्ते आ गई। छोटे से शहर से महानगरीय दुनिया में आगमन। मानो छोटी सी मछली को विशाल समंदर में छोड़ दिया गया हो। राजकिशोर अंकल के साथ ख़तों का सिलसिला जारी रहा। अंकल के ख़त आते – ‘बेटा ! जब भी टी।वी। पर कलकत्ते की कोई ख़बर सुनता हूँ या कोई दृश्य दिखाया जाता है तो मैं उस भीड़ में अपनी नीलोफ़र बिटिया को तलाशता हूँ कि इस भीड़ में कहीं न कहीं वह भी शामिल होगी। तुम मुझे अपनी तस्वीर भेज दो ताकि भीड़ में मैं अपनी बिटिया को पहचान तो लूं।’
राजकिशोर जी ‘दैनिक प्रभात’ में उप संपादक थे, साथ ही वे ‘परिवार मिलन’ नामक अपनी सामाजिक संस्था का दफ़्तर भी चलाते थे। बतौर निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव भी लड़ते और समाज सेवा भी जम कर करते। ‘परिवार मिलन’ के माध्यम से लोगों के बिखरे परिवार को समेटने का प्रयास करते। खुद नि:संतान थे, पर देश के कोने-कोने में नीलोफ़र जैसी उनकी अनेकों संताने थीं। शायद इसी लिए उन्हें कभी संतान की कमी महसूस नही हुई। उनका हमेशा ख़त आता, ‘बेटा ! दफ़तर से छुट्टी लेकर पंजाब घूम जाओ।’
अचानक दो साल बाद नीलोफ़र का पंजाब जाने का प्रोग्राम बना। उन दिनों पंजाब के हालात अच्छे नहीं थे। अत: वहां जाकर भी राजकिशोर जी से मिलने का सबब न बना। अक्सर अंकल के ख़त में इस बात का ज़िक्र रहता, ‘बेटा ! किसी दिन तुम्हें सूचना मिलेगी कि तुम्हारे अंकल की हत्या हो गई है और तुमसे फिर कभी मुलाक़ात भी नही हो पाएगी।’ उनका नाम हिट लिस्ट में था। इससे पूर्व ‘दैनिक प्रभात’ के संपादक पर क़ातिलाना हमला कर उनकी इहलीला समाप्त कर दी गई थी। राजकिशोर जी की क़िस्मत में अभी चंद साँसें और लिखी थीं, शायद इसी लिए संपादक महोदय के साथ एक ही गाड़ी में दफ़्तर से लौटते वक्त वे कार्यवश पहले स्टॉप पर उतर गए थे। पंजाब जाकर भी उनसे नीलोफ़र के न मिल पाने के पीछे यही वजह थी। पिता का कहना था, हालात अच्छे नहीं हैं तिस पर जिस आदमी का नाम हिट लिस्ट में हो उससे मिलने का ख़तरा क़तई मोल नहीं लेना चाहिए। ख़ैर ! दो सप्ताह तक अन्य रिश्तेदारों के यहाँ घूम-फिर कर वह कलकत्ता लौट आई। आते ही अंकल को ख़त लिखा और न मिल पाने के लिए क्षमा याचना की। किशोरी अंकल का ख़त आया, ‘पगली, इतने पास आकर भी बिना मिले चली गई। अरे, इतनी व्यस्तता थी! तुम नहीं आ सकती थी तो मुझे सूचित किया होता, मैं ही समय निकाल कर तुमसे मिलने चला आता।’ मगर नीलोफ़र क्या करती ? चाहकर भी, न मिल पाने की असली वजह न बता पाई। ख़ैर! इसी तरह दो साल और गुज़र गए।
फिर अचानक चचेरे भाई की शादी के मौके पर नीलोफ़र अपने बड़े भाई के साथ शादी में शरीक होने जालंधर चली गई। जाने से पूर्व ही भाई से वादा लिया कि वह उसे किशोरी अंकल से मिलवाने चंडीगढ़ ज़रूर ले जाएगा। भाई भला क्यों इन्कार करता, वह तो उसे पहल ही फटकार चुका था कि जो व्यक्ति उसे सगी बेटी से भी ज़्यादा चाहता है, ममता भरे, अपनत्व भरे ख़त लिखता है, भला वह ऐसे शख़्स से मिले बिना ही क्यों चली आई ?
एक दिन समय निकाल कर दोनों भाई-बहन चंडीगढ़ ‘परिवार मिलन’ के दफ़्तर जा पहुँचे। किशोरी अंकल उस वक्त दफ़्तर में नहीं थे, उनकी सहायक शालिनी ने बताया कि वे आधे घंटे तक आ जाएंगे। जैसे ही नीलोफ़र ने अपना परिचय दिया तो शालिनी की खुशी का ठिकाना न रहा क्योंकि अंकल के माध्यम से वह नीलोफ़र से परिचित थी। कभी-कभी समय के अभाव में किशोरी अंकल सोनिया और शालिनी से ही ख़त लिखवा भेजते ताकि ख़त न लिखने की शिकायत उनकी नीलोफ़र बिटिया न कर सके।
किशोरी जी जब तशरीफ़ लाए तो शालिनी ने कहा, ‘ये लोग काफ़ी समय से आपका इंतज़ार कर रहे हैं।’ किशोरी अंकल ने पल भर के लिए ग़ौर से देखा और फिर कहा, ‘तुम कलकत्ते से मेरी नीलोफ़र बिटिया हो न ?’ फिर वे बच्चे की भाँति मचल उठे। नीलोफ़र और दीपक देख-देख कर हैरान होते रहे कि एक पचास-पचपन वर्षीय व्यक्ति इतना जीवंत भी हो सकता है। वे तीन दिन अंकल के साथ रहे। अंकल ने सारा शहर घुमाया, मुख्य-मुख्य स्थान दिखाए। क़ाफ़ी मौज़-मस्ती करवाई दोनों भाई-बहनों को। राह में जिससे भी मुलाकात होती कहते, ‘मिलो मेरी बिटिया से कलकत्ते से आई है। नौकरी करती है वहाँ।’ वे काफ़ी उत्साहित लग रहे थे।

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उस दिन वे लगेज सहित दोनों को सीधे अपने छोटे भाई के घर ले गए। दोपहर का खाना खाकर कुछ देर आराम करने के बाद शाम को इधर-उधर घुमाया और फिर अपने घर ले गए। ताला लगा था। डुप्लीकेट चाबी से ताला खोला, घर दिखाया। आंटी घर पर नहीं थीं, फिर से वे लोग अंकल के भाई के घर लौट आए। नीलोफ़र को बड़ा अटपटा सा लग रहा था कि अपने घर की बजाए उन्होंने भाई के घर क्यों ठहराया ? अगले दिन भाई के परिवार को शादी पर शहर से बाहर जाना था। अत: उस दिन शाम को वे उन्हें अपने घर लिवा लाए। आँटी आँगन में कपड़े धो रही थीं, उनसे परिचय करवाते हुए कहा – ‘यह मेरी वही कलकत्ते वाली बेटी है, मैंने तुम्हें बताया था न!’ सुमित्रा आँटी ने चाय बनाई, सबने मिल कर चाय पी। कुछ देर बाद उन्होंने आँटी से रात का खाना तैयार करने को कहा। फ्रिज से सरसों का साग निकालते हुए आँटी ने अंकल से पूछा – ‘ आप खाएंगे न ?’ जवाब में अंकल ने कहा – ‘हाँ बच्चों का साथ देने के लिए एक-आधी चपाती मैं भी खा लूंगा।’ नीलोफ़र को यह सब बड़ा अटपटा सा लगा रहा था। उसने दीपक से कहा – ‘लगता है मामला गड़बड़ है, भला कोई इस तरह भी पति से पूछता है कि तुम खाना खाओगे या नहीं ?’ दोनों ने सोच-विचार कर महसूस किया कि दाल में कुछ काला है, क्यों न हम खाना न खाने का बहाना गढ़ दें कि बाहर घूमते-फिरते बहुत कुछ खा लिया है, अब भूख नहीं है। ख़ैर ! नीलोफ़र रसोई में आँटी के पास जा पहुँची और भूख न होने की बात कही। उन्होंने कहा – ‘ठीक है, एक-एक चपाती ही खा लेना।’ सबने मिलकर खाना खाया। दीपक और नीलोफ़र की वाकई भूख ग़ायब हो चुकी थी, वे बड़ी मुश्किल से अंकल का मन रखने के लिए एक-एक निवाला निगल रहे थे। नीलोफ़र को आँटी की व्यवहार न जाने कैसा-कैसा लग रहा था। उसे लगा, उन लोगों ने घर आकर ग़लती की है। अंकल ने इतने प्यार से रुकने का अनुरोध किया था, इसलिए वे रुक गए थे। रात के खाने से निपटने के पश्चात् सोने की तैयारी शुरू हुई। अंकल और दीपक एक कमरे में सो गए। नीलोफ़र का बिस्तर आँटी ने दूसरे कमरे में लगा दिया। कुछ देर तक बात-चीत करने के बाद वे बिस्तर उठा कर जाने लगीं तो नीलोफ़र से रहा न गया। घबरा कर पूछा – ‘आँटी आप कहाँ चलीं ?’
छत पर बेटा, मुझे तो छत पर सोने की आदत है। वहीं चारपाई पर बिस्तर लगा कर सोती हूँ। हालाँकि पंजाब में गर्मियों में खुली छत या आँगन में सोने का ही चलन है, मगर नीलोफ़र को आँटी की अक्ल पर तरस आ रहा था। अजीब महिला हैं, एक लड़की जो कि घर में बतौर मेहमान आई हुई है और पहली बार आई है, उसे वे अकेली नीचे छोड़ ख़ुद छत पर सोने जा रही हैं। नीलोफ़र ने कहा, तो मैं भी आपके साथ छत पर चलती हूँ। परंतु छत पर एक ही चारपाई थी, दो जने भला कैसे सो सकते थे ? नीलोफ़र ने कहा, छत पर एक ही चारपाई है, तो क्यों नहीं आप भी नीचे ही कमरे में सो जाती ? इतना बड़ा पलंग है, दोनों साथ-साथ लेट जाएंगी, कोई मुश्किल नहीं होगी। ख़ैर नीलोफ़र की बात उन्हें माननी ही पड़ी, भले ही अनिच्छा से। उस रात वे दोनों काफ़ी देर तक बात-चीत करती रहीं, फिर पता नहीं कब आँख लग गई।
सुबह आँटी उठीं, नहा-धोकर चाय बनाई। नीलोफ़र ने उनके साथ चाय पी। फिर उन्हें डयूटी पर स्कूल जाना था, वे अध्यापिका थीं। कुछ हद तक रात का नज़ारा याद कर नीलोफ़र को कुछ-कुछ माज़रा समझ में आ गया था। अत: उसने आँटी को नाश्ता बनाने के लिए मना किया और कहा आप नाश्ता कर यथासमय डयूटी चली जाएं। आँटी के जाने के बाद दीपक तथा अंकल भी नहा-धोकर तैयार हो गए। अंकल ने ब्रेड और जेली नीलोफ़र के हाथ में थमाते हुए कहा – ‘बेटा ! चलो अब हम लोग नाश्ता कर लें, आँटी तो चली गईं। आओ, मैं तुम्हें अपना किचन दिखा दूं। तुम चाय बना लो और ब्रेड सेक लो। अपनी आँटी के व्यवहार का बुरा मत मानना। बस यूं ही अपना मस्त-मौला ज़िंदगी गुज़र रही है। ईश्वर ने जिस रज़ा में रखा, हम खुश हैं।’
नाश्ते के बाद अंकल उन्हे फिर ‘परिवार मिलन’ के दफ़्तर ले गए। नीलोफ़र को एक प्यारा सा तोहफ़ा लाकर दिया। उन्हें रवानगी की इजाज़त दे विदा किया। आँटी को तो नीलोफ़र सुबह ही बता चुकी थी कि आपके स्कूल से लौटने तक तो हम रुक नहीं पाएंगे। अत: उसी वक्त उनसे इजाज़त ले ली थी।
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नीलोफ़र ने आँटी के साथ हुई संक्षिप्त बात-चीत से यही निष्कर्ष निकाला कि कहीं तो, दोनों पति-पत्नी के बीच एक दूरी सी है। एक ही छत के नीचे रहते हुए भी दोनों अजनबी से थे। दोनों की रसोईयां अलग थीं। शायद इस सबकी ठोस वजह थी, उनके इतने वर्षों के वैवाहिक जीवन में, उनके आँगन में किसी नन्हीं किलकारी की गूंज का अभाव। संतान ही एकमात्र ऐसी कड़ी है, जो पति-पत्नी को एक सूत्र में आबद्ध किए रखती है। किशोरी अंकल ने इसे विधि का विधान समझ संतोष कर लिया था। भगवान ने जो दिया उसे हँसकर स्वीकार किया, जो नहीं दिया उस पर किसी प्रकार का गिला नहीं किया। वे अख़बार की नौकरी, निजी दफ़्तर, समाज सेवा के कार्यों में व्यस्त रहते। यानी ख़ुद को ज़्यादा से ज़्यादा व्यस्त रखने का ज़रिया ढूँढ लिया था। पत्नी अध्यापिका थीं, सुबह आठ बजे निकल जातीं, दोपहर दो़-तीन बजे तक लौट आतीं। उन्होंने भी स्वयं को स्कूल में व्यस्त रखने की कोशिश की। ख़ैर ! नारी फिर भी नारी है। बहन, बेटी, पत्नी के बाद जननी बनकर ही पर परिपूर्ण बनती है। शायद यही कमी उन्हें सालती रही होगी और इस बात को उन्होंने इतनी गंभीरता से दिल को लगा लिया होगा। परिणामस्वरूप एक ही पेड़ की, एक ही शाख पर, एक ही नीड़ में रहते हुए भी वे परस्पर दूर-दूर थे।
नीलोफ़र को जहाँ पहले अंकल से न मिलने का दु:ख सालता रहता था, वहीं अब मिलकर भी दु:ख हो रहा था। उनके पारिवारिक विघटन के विषय में जानकर उसे हार्दिक पीड़ा हुई। इससे पूर्व, पाँच साल से नियमित पत्राचार में उन्होंने कभी इस बात का आभास तक न होने दिया था कि वे जीवन में इस दौर से गु़ज़र रहे हैं। पत्राचार द्वारा किशोरी अंकल के व्यक्तित्व के विषय में जो छवि नीलोफ़र के मन में बनी थी, ठीक वैसा ही पाया – हँसमुख, तनाव रहित।
नीलोफ़र के हृदय में अंकल के प्रति श्रद्धा और बढ़ गई कि ऐसी स्थिति में उन्होंने संतान की ख़्वाहिश में दूसरी शादी जैसी हरकत नहीं की, जैसा कि साधारणत: लोग कर बैठते हैं। उनका मानना था कि अगर भाग्य में संतान सुख लिखा होता तो इसी गुलशन में फूल खिलता। उन्हें कोई मलाल न था । मगर उनकी पत्नी चाहकर भी शायद ईश्वर को इस निर्णय को स्वीकार न कर पाई थीं। नीलोफ़र ने देखा कि अंकल के स्वभाव के विपरीत वे चिड़चिड़ी सी, रूखे स्वभाव वाली बन चुकी थीं। मानो ईश्वर द्वारा दी गई साँसों को बस औपचारिकतावश गिन रहीं हों। फलत: दोनों के बीच इस मामूली सी कमी ने गहरी खाई उत्पन्न कर दी थी। कुदरत का कैसा क्रूर मज़ाक था कि यह व्यक्ति जो परिवार मिलन के माध्यम से दूसरों के बिखरे परिवार को एक सूत्र में आबद्ध करने का प्रयत्न करता है उसका अपना ही गुलशन वीरान था। एक ही घरौंदे में एक ही छत के नीचे रहते हुए भी वे कितने बेगाने से थे।
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समय की धारा अपने वेग से बहती रही। फिर समाचार मिला कि अंकल ने दैनिक प्रभात की नौकरी छोड़ कर अपना अख़बार निकालना शुरू कर दिया है, नया ज़माना। फलत: उनकी व्यस्तताएं बढ़ती गईं, स्वास्थ्य भी ख़राब रहने लगा था। दो बार दिल का दौरा भी पड़ चुका था।
भंडारी अंकल का ख़त हाथ में थामे जब नीलोफ़र अतीत से वर्तमान में लौटी तो उसका दिल उनक प्रति आभार महसूस कर रहा था। भंडारी जी दो महीने के आऊटडोर टुअर के बाद जब चंडीगढ़ लौटे तो समाचार पाकर उन्होंने तुरंत नीलोफ़र को सूचित करना मुनासिब समझते हुए लिखा था, ‘लौट कर सुना कि दो माह पूर्व मेरे अज़ी़ज़ दोस्त और तु्म्हारे अंकल का अस्वस्थता के काराण निधन हो गया। सोचा तुम्हें कौन ख़बर करेगा, इसीलिए तुम्हें सूचित करना ज़रूरी समझा।’ नीलोफ़र सोच रही थी कि भंडारी अंकल ने सूचित न किया होता शायद वह कभी न जान पाती कि उसके अंकल अब इस दुनिया में नहीं रहे, तभी तो उनके ख़त नहीं आते। पगली उनसे ख़त न लिखने की शिकायत करती रह जाती। अत: उसने इस सूचना के लिए भंडारी अंकल को शुक्रिए का ख़त लिखना चाहा और उसके हाथ बरबस ही क़ाग़ज़-क़लम की ओर बढ़ गए। (स्वर्णिमा से साभार, 18-09-2009)

कोलकाता नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति की पत्रिका स्वर्णिमा 2००9 के सर्वोत्कृष्ट लेखन के प्रथम पुरस्कार से पुरस्कृत।

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