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तो ऐसे में कंजकें कहाँ से आएंगी.........?



26 सितंबर, पूरे देश भर में हर्ष व उल्लास सहित माँ दुर्गा के नवरात्र मनाए जा रहे हैं। हाँ, तरीका अलग-अलग हो सकता है लेकिन इसके पीछे छुपी आस्था की डोर एक है। आज माँ दुर्गा की अष्टमी के मौके़ पर धूम दिखी। उत्तर भारत में तो अष्टमी और नवमी के दिन कंजकों की पूजा की जाती है। उससे पहले उपवास रखे जाते हैं। जागरण होते हैं। बंगाल में इन दिनों दुर्गा पूजा की धूम है। माँ दुर्गा इन दिनों मायके आती हैं और बड़ी धूम-धाम से माँ का स्वागत किया जाता है मायके में आगमन पर और उसी धूम-धाम से दशमी के बाद माँ ससुराल विदा भी किया जाता है। विदा करने के पश्चात् औरतें आपस में सिंदूर खेला खेलती हैं। और इसके बाद शुरू होता है परस्पर बधाईयां देने का तांता यानी शुभो बिजोया। बंगाल में तो जिस तरह दुर्गा पूजा बंगाली समाज का अभिन्न अंग बन गई है उसे देख कर हैरानी नहीं होती क्योंकि जिस जज़्बे से वे माँ की पूजा करते हैं वही जज़्बा उनके घरों में भी बेटियों के प्रति देखने को मिलता है। आजकल तो एक ही संतान का चलन हैं। आम बंगाली परिवारों में एक ही बेटी देखने को मिलती है, उसे ही वे हर तरह की उच्च शिक्षा दिला कर अच्छा इन्सान बनाने की जी तोड़ कोशिश करते हैं। उन्हें देखकर क़तई नहीं लगता कि उन्हें फिक्र है कि बेटा नहीं है तो आगे वंश कैसे चलेगा ? आजकल तो हर घर में एक ही कन्या संतान देखने को मिलती है। सलाम है इन परिवारों के जज़्बे को। आज के ज़माने में कन्या संतान और पुत्र दोनों के करियर पर एक जैसा ही खर्च आता है।
और उधर उत्तर भारत में अष्टमी तथा नवमी के दिन कन्याओं की खूब पूछ होती है। कंजकों की पूजा की जाती है, चरण स्पर्श कर आशीष ली जाती है। बेचारी कन्याएं थाली उठाए एक घर से दूसरे घर जाते थक जाती हैं। बचपन में मुझे भी इस दौर से ग़ुज़रना पड़ा है, जी नहीं चाहता, फिर भी जाना ही है। इन अंचलों में वैसे कन्या की पैदाईश पर चेहरे लटक जाते हैं। पहले के ज़माने में पुत्र संतान की आकांक्षा में कन्याओं की क़तार लग जाती थी। और आज के आधुनिक दौर में तो पैदाईश पर ही अंकुश लग गया है, पैदा होने से पूर्व ही परीक्षण कर कन्या भ्रूण की हत्या कर दी जाती है। तो फिर ऐसे में कंजकें कहाँ से मिलेंगी ?
मैं परिवार में अपनी पीढ़ी में एक ही बेटी हूं। दो भाईयों की एक बहन। छोटा भाई मुझसे ग्यारह बरस छोटा है। वह कहा भी करता था, माँ आपका परिवार तो एक बेटे और एक बेटी से पूरा हो गया था फिर मेरे जन्म की ज़हमत क्यों उठाई ? मुझे अच्छी तरह से याद है कि मुझे बचपन में कभी लड़के या लड़की के फ़र्क का अहसास परिवार में नहीं हुआ। लेकिन बचपन में बड़ी इच्छा होती थी कि मुझे भी कोई दीदी कहने वाला हो(ये अलग बात है कि सर्विस में आने के बाद इस संबोधन की कोई कमी नहीं रही)। लिहाज़ा माँ के साथ मंदिर जाती तो भगवान से एक भाई की मन्नत मांगती ( भाई ही क्यों, बहन की क्यों नहीं, अब समझ में नहीं आता) । भाई की पैदाईश पर माँ को मन्नत के बारे में बताया तो फिर मंदिर में जाकर मन्नत की सामग्री भी चढ़ाई(अलीपुर द्वार जंशन के शिव बाड़ी में जाया करते थे हम) । मन्नत उन दिनों की अपनी हैसियत यानी जेब खर्च के अनुरूप ही थी - एक केला और पाँच पैसे। भगवान शिव भोले भंडारी हैं ही भोले, इतने में ही मान गए। बड़े होने के बाद भाई कहा करता कि भगवान भी कितना लालची है, तुम्हारी बात पर राज़ी हो गया।
तो बात हो रही थी कन्या भ्रूण हत्या की। सिंतबर 2006 समाचार पत्रों में पंजाब के पटियाला जिले का पत्तड़ां गांव काफ़ी चर्चा में रहा था। वहां के एक प्राइवेट नर्सिंग होम के पिछवाड़े में बनाए गए दो कुओं से 9, 10 अगस्त 2006 को लगभग तीन सौ कन्या भ्रूण नष्ट किए पाए गए। यानी इतनी तरक्की के बावजूद देश के कुछ हिस्सों में बेटियों को अभी भी अभिशाप समझा जाता है कि उनकी पैदाईश पर ही प्रश्न चिह्न लगा दिया जाता है। पंजाब में ये जुमला तो अक्सर सुना करते थे कि कुड़ियां तां भार हुंदीयां ने। लोग तो यह भी कहा करते कि पढ़ा लिख कर क्या करना है कल को तो पराए घर ही भेजनी है। मुझे याद है पंजाब के हमारे पुश्तैनी गांव में एक वृद्धा जिसे मेरी मां ताई कहा करती थीं, ने पूछा था कि बिटिया किस क्लास में है। माँ ने कहा था चौदहवीं में(बी.ए.) क्योंकि वे लोग बी.ए. के लिए चौदहवीं और एम.ए. के लिए सोलहवीं कहा करते थे। तो उसने कहा था, क्या करोगे इतना पढ़ा कर, कल को तो बेगाने घर ही देनी है। मुझे याद है जब भी कॉलेज में हमारा रिजल्ट निकलता तो माँ प्रशाद ज़रूर बांटा करती। ( बहुत ज़्यादा इंटेलीजेंट नहीं भी थी तो पढ़ाई में बुरी भी नहीं थी। हाँ इतना ज़रूर था कि जिन स्कूलों और कॉलेज में पढ़ाई की, टीचरों पर इम्प्रेशन रहा। टीचरों को इतने स्टुडेंटस् में भी नीलम शर्मा का नाम याद रहता था। इक्नॉमिक्स कभी भी पसंदीदा विषय नहीं रहा, मर मर कर पढ़ा। क्लास में पढ़ाने के बाद मैडम किसी और से सवाल पूछे न पूछे मेरी बारी ज़रूर आती, चाहे नाम से आए या रोल नंबर से। जवाब देने के लिए हाथ उठाओ तो मैडम कभी नहीं पूछती थीं और हाथ नीचा रहे तो बारी ज़रूर आनी है। यह तो मुझे समझ आ गया था। )
2006 के सितंबर 8 को आजतक चैनल पर एक न्यूज़ ब्रॉडकास्ट हुई थी। राजस्थान के जैसलमेर जिले के देवड़ा गांव में जसवंत नामक युवती की शादी हुई। शादी होना भला कौन सा बड़ी बात है ? लेकिन दोस्तो, जसवंत की शादी होना सचमुच बड़ी बात थी क्योंकि उस गाँव में 110 वर्षों बाद होने वाली किसी लड़की की यह पहली शादी थी। एक सौ दस वर्षों बाद उस गाँव में बारात आई। दरअसल उस गाँव के लोग किसी ज़माने में आर्थिक रूप से संपन्न न होने के कारण बेटियों की शादी का खर्च उठाने में ख़ुद को असमर्थ पाते थे। परिणामस्वरूप बेटी को पैदा होते ही मार दिया जाता था। जसवंत के माता-पिता ने सूझ-बूझ से काम लिया और पैदा होते ही उसके नाना-नानी उसे अपने साथ ननिहाल ले गए। बचपन में जब भी वह माँ-बाप से मिलने आती तो लड़के के वेश में उसे लाया जाता। तो इस तरह उसे बचा कर रखा गया और उसकी शादी संपन्न हुई।
हालांकि लोग सजग हो रहे हैं फिर भी यह जागृति का ग्राफ़ बहुत धीमी रफ़्तार से चल रहा है। हमारे घर जब हमारी भतीजी कुहु ने जन्म लिया तो चंडीगढ़ के पी.जी. हॉस्पिटल में डिलीवरी के दौरान महिलाएं बड़ी उत्सुकता से उसकी माँ को पूछती थीं कि क्या बेटी होने पर तुम्हारे ससुराल वाले खुश हैं। उन्होंने कुछ नहीं कहा तुम्हें ?
तो, नवरात्र उत्सव पर कंजकों को बहुत-बहुत बधाई, चलिए इन दिनों तो उनकी जम कर पूछ होती है।
- नीलम शर्मा 'अंशु '

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