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कहानी- वह चली गई तो..

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घर के तीनों कमरे में बारी-बारी से जाकर वे फिर से अपने पढने की मेज-कुर्सी पर लौट आए। उनके चेहरे पर झल्लाहट साफ नजर आ रही थी। छत पर पंखा मद्धम गति से घूम रहा था। उन्होंने अपनी गर्दन उठाकर एक उचटती निगाह उस पर डाली और मेज पर औंधी रखी किताब को पलटकर फिर से उसमें मन लगाने का प्रयास करने लगे, पर उनका ध्यान लिखे हुए शब्दों पर नहीं टिका। कमरे में एक घुटन भरी उमस व्याप्त थी जो अक्सर ऐसे बरसाती दिनों में हो जाया करती है जब पारा अपने उच्चतम अंक को छूकर थका-थका सा ढलकने लगता है। अपनी नम बनियान को पेट से ऊपर सरकाते हुए वे बडबडाए, न जाने क्यों मेरी चीजों को इधर-उधर कर देती हैं?

वे फिर से उठे और झुककर पहले अपनी मेज और कुर्सी से नीचे झांका। अक्सर ऐसा ही होता है। चीज उनके समीप होती है और वे झल्लाते हुए यहां-वहां ढूंढते फिरते हैं, मृग की कस्तूरी की तरह। इसी कारण अक्सर उन्हें अपनी पत्नी से यह हिमाचली लोकोक्ति सुननी पडती है, कन्ना पर जूंगडा, घरा जो हक्कां।

न जाने कब से वे यह लोकोक्ति सुनते आ रहे हैं लेकिन पहले पत्नी तब सुनाती थी जब वह उनका इधर-उधर रखा सामान ढूंढकर दे दिया करती थी। ऐसा भी नहीं कि वे हमेशा अपनी कोई चीज इधर-उधर रखकर भूल जाते हैं। कई बार घर को करीने से सजाने के एवज में उनकी चीजें इधर-उधर हो जाती हैं। पहले बेटी जब परायी नहीं हुई थी तो कमरों को हमेशा सजा-संवारकर रखती थी। उन्हें अच्छा भी लगता था, परंतु वह उनकी आई हुई चिट्ठियों, पत्रिकाओं और पुस्तकों को भी सहेजकर टेबल के नीचे या ऊपर रख देती। वह पठन-पाठन की सामग्रियां सहेजकर रखी नहीं गई कि उनकी आंखों से हफ्ते-महीने के लिए ओझल हो जातीं। वे बेटी से सीधे कुछ नहीं कहते लेकिन अपनी पत्नी को सुना जाते- तुम लोग मेरी चीजों को वहीं रहने दिया करो, जहां पडी रहती हैं। आँखों से ओझल होते ही ये मेरे मन से भी ओझल हो जाती हैं।

पत्नी पलटकर कटुवचन कह देती, और घर को कबाडघर बना रहने दें।

वे आँख बचाकर कहते, पढने-लिखने वालों के घर ऐसे ही होते हैं।

किसी का घर ऐसा नहीं होता। सभी अपनी चीजों को करीने से सजाकर रखते हैं। आपकी तरह नहीं कि जहां बैठे वहीं किताबें, अखबार और पत्रिकाएं बिखेर दीं।

वे शुरू-शुरू में तर्क-वितर्क करते पर ज्यों-ज्यों उम्र में परिपक्वता आती गई, उन्होंने कहना छोड दिया फिर भी आदत पूरी तरह नहीं छूटी। घर में उनका चीजों को बिखेरना और पत्नी व बेटी का सहेजना एक नित्यकर्म की तरह चलता रहा। हाँ, बेटी के ब्याहने के बाद उनकी अस्त-व्यस्त जिंदगी में कमोबेश सुधार हुआ है।

चैन नहीं पडा तो वे उठकर धीरे-धीरे सभी कमरों तक गए। सब जगह अच्छी तरह देखा। अलमारी, बेड, टीवी-ट्राली के नीचे, पर उन्हें अपनी हवाई चप्पल कहीं भी दिखाई नहीं दी। वे चप्पल पहनकर थोडी देर घर के सामने खुली हवा में चहलकदमी करना चाहते थे। कल सुबह से बरखा नहीं हुई थी पर आसमान बादलों से ढका रहा। पत्नी रात के भोजन के बाद पडोस की एक महिला के साथ मुहल्ले की सडकों पर टहलने चली गई थी। बेटा एक मित्र की बर्थ-डे पार्टी मनाने किसी होटल में गया हुआ था। ऐसे क्षणों में जब वे घर में अकेले होते हैं, निश्चिन्त होकर अपने पढने-लिखने की मेज पर चले जाते हैं।

वे नंगे पांव बाहर बरामदे तक आ गए। स्ट्रीट-लाइट आज भी गुल थी। पिछले कुछ दिनों से इस वक्त गली में बिल्कुल अंधेरा पसर जाता है। वैसे इस मुहल्ले में चोरी-चमारी या लूटपाट का कोई डर नहीं रहता। सरकारी मकानों की कालोनी है। मकान भी सारे बाबा आदम के जमाने के हैं। कई दीवारें इस कदर उघडी हुई हैं जैसे किसी गरीब औरत का पहरावा। उखडे हुए प्लास्टर, मौसमों की मार से बदरंग बाहरी दीवारें और बूढे-बूढे से जर्जर घर। खिडकियों के कपाट ढीले, चिटखनियां असमर्थ। फिर भी भय, आशंकाएं व असुरक्षा खिडकियों तक आतीं और कुछ सूंघकर वहां से लौट जातीं। अत: यहां सब अपने आप को सुरक्षित महसूस करते हैं। साल में एकाध बार कभी किसी घर में चोरी हो भी जाती है तो चोरों के पल्ले कुछ खास नहीं पडता।

थोडी देर बरामदे में खडे रहने के बाद वे निराश होकर अंदर चले गए। घर में और भी चप्पलें हैं, पर उनसे बेखबर वे अपनी उसी चप्पल को ढूंढते फिर रहे हैं जो उनकी खास अपनी हैं। नंगे पांव ही कमरों में इधर-उधर डोलते हुए वे बेड-रूम की तरफ चले गए। पढने का सिलसिला कब का टूट चुका था। उन्होंने टीवी ऑन कर रिलैक्स होना उचित समझा। एक चप्पल की वजह से उनका ब्लड-प्रेशर बढ सकता है, इनका उन्हें इल्म था और इससे बचने के टोटके भी। टीवी पर देश की अर्थ-व्यवस्था को लेकर दो विद्वान विचार-विमर्श कर रहे थे। उन्होंने दूसरा चैनल घुमाया। वहां फैशन परेड जारी था। वे बेड पर अधलेटे इत्मीनान से एक के बाद एक चैनल बदलने लगे। चैनल बदलने के साथ-साथ वे सहज भी होते चले गए।

इसी बीच बाहर पत्नी का स्वर सुनाई दिया है। वह किसी से बातें करते हुए घर में प्रवेश कर रही थी। अंदर आने पर खुलासा हुआ कि वही पडोसन साथ है जिसके संग वह टहलने गई थी।

उसने पडोसन को ड्राइंग-रूम में बिठाया और खुद बेड-रूम में आ गई। पत्नी पर नजर पडते ही उन्होंने पूछा, भला मेरी चप्पल कहां है, मिल ही नहीं रही है? यहीं होंगी कहीं। पत्नी ने सहज भाव से कहा और एक कैरीबैग उठाकर ड्राइंगरूम में चली गई। पडोसन को सूट दिखाने जिसे वह आज ही दिन में खरीदकर लायी थी। उनकी इच्छा हुई कि वहीं जाकर कहे, तुम्हें यह सूट दिखाना जरूरी लग रहा है या मेरी चप्पल ढूंढना?

मगर वे चुप रहे और टीवी के एक चैनल पर समाचार सुनने लगे। थोडी देर में उनकी आँखें बोझिल होने लगीं। उन्होंने लेटे-लेटे रिमोट से टीवी बंद किया और दूसरे ही पल गहरी नींद में चले गए।

सुबह आंख खुलने पर देखा कि पत्नी रसोई में चाय बना रही है। उन्होंने टीवी के मेन-स्विच पर निगाह डाली। रात उनसे बंद करने से रह गया था। स्विच ऑफ था। बिस्तर से उतरते ही उन्होंने पूछा, मेरी चप्पल मिली क्या? रात भी तुमने पूछा पर तुम्हें फुर्सत थी ही कहां?

आप भी कमाल करते हैं। दूसरी चप्पल ले लेते। कहते हुए पत्नी ने आकर अपनी चप्पल उनके सामने उतार दीं।

वे बिस्तर से उतरे लेकिन पत्नी द्वारा उतारी चप्पल को पांव में नहीं पहना और नंगे पांव सीधे बाथरूम की ओर चल दिए। वहां बाहर ही उनकी चप्पल पडी हुई थी। फिर ख्याल आया कि कल शाम को ही वे उन्हें वहां उतार गए थे। फिर भी अपनी पत्नी के प्रति अप्रसन्न रहे। मलाल यह था कि वह इन दिनों उनके प्रति लापरवाह होती जा रही है। उनकी आवश्यकताओं को गंभीरता से नहीं लेती। पहले कितना ख्याल रखती थी उनका! मन में ताजी कचोट यह थी कि रात पति की जरूरत को नजरअंदाज कर पडोसन को सूट दिखाना उसे कहीं जरूरी लगा था।

बाथरूम से निकलकर तौलिये की तलाश में वे अपनी मेज तक गए। उनका तौलिया वहां कुर्सी के हत्थे से झूल रहा था। रात मेज पर बेतरतीब रखी उनकी किताबें, कलम और चश्मे को सहेजा जा चुका था। वे बाहर लॉन में आ गए जहां कुर्सी बिछाए पत्नी चाय की ट्रे के साथ उनका इंतजार कर रही थी। उन्होंने अभी-अभी आया अखबार उठाया और कुर्सी पर आ बैठे। पत्नी ने चाय का प्याला उनकी ओर बढाया।

चाय की चुस्की लेते हुए उन्होंने अखबार का एक हिस्सा पत्नी के सम्मुख कर दिया। बिना चश्मे के शब्द उनकी आंखों को धुंधला रहे थे। अखबार के मोटे-मोटे शीर्षकों से नजरें हटाकर उन्होंने पत्नी की ओर बडी आत्मीयता से देखा जो सिर झुकाए शहर की खबरें पढने में तल्लीन थी। वे मन-ही-मन सोचने लगे।

आखिर कब तक हम दोनों एक डाल पर बैठे रहेंगे। किसी एक को तो, कभी-न-कभी, पहले वहां से उडना ही पडेगा। यदि उन्हें ईश्वर ने पहले बुला लिया तो पत्नी को अपनी बची हुई जिंदगी गुजारने में उतनी दिक्कत नहीं होगी। उन्हें संतुष्टि हुई।- लेकिन मुझसे पहले वह चली गई तो...?


(जागरण में प्रकाशित)

7 Responses so far.

  1. आपकी रचनायें प्रेरणा दायक होती है! कभी हमारी पाठशाला के ब्लोग पर भी पधारें ! आपकी उपस्थिति हमें प्रोत्साहित करेगी!

  2. ...प्रभावशाली कहानी !!!

  3. हिन्दी के उत्थान पर आपका प्रयास सराहनीय है।

  4. हमेशा की तरह सुन्दर कहानी है।

  5. kahani kaa ant bahut kuchh sochane par mazbur karta hai.GoooooooooooD !

  6. बहुत अच्छी कहानी...

    "कन्ना पर जूंगडा, घरा जो हक्कां।" पढ़ कर हिमाचल की याद आ गयी.

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