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पुस्तक समीक्षा
काबुली वाले की बंगाली बीवी
( फ्लैश बैक - 1 )
साभार - दैनिक ट्रिब्यून, 17 मार्च, 2002


धार्मिक कठमुल्लेपन के विरुद्ध एक और लेखिका का जेहाद


0 रतन चंद ‘रत्नेश’



धार्मिक कट्टरवाद और कठमुल्लेपन पर कलम चलाकर जिस तरह बांगलादेश की तसलीमा नसरीन और पाकिस्तान की तहमीन दुर्रानी चर्चित हुईं, उसी कड़ी में भारतीय लेखिका सुष्मिता बंद्योपाध्याय भी बांगला में एक आत्मकथात्मक उपन्यास ‘काबुलीवालार बांगाली बोऊ’ लिखकर चर्चा में आ गई हैं। बतौर बेस्ट सेलर बांग्ला में यह पुस्तक सात लाख और अंग्रेजी अनुवाद में एक लाख से अधिक बिक चुकी है, और अब यही कृति हिन्दी में ‘काबुलीवाले की बंगाली बीवी’ नाम से प्रकाश में आई है, जिसका अनुवाद नीलम शर्मा ‘अंशु’ ने बेहतर ढंग से किया है। जहां तसलीमा ने बांगलादेश की धार्मिक रूढ़िवादिता को अपना निशाना बनाया था और तहमीना ने पाकिस्तान की, सुष्मिता ने अपनी इस कृति में अफगानिस्तान की पुरुष दमनकारी नीतियों और तालिबानी पृष्ठभूमि की निरंकुश धार्मिक कट्टरताओं को बेनकाब किया है।

इस संदर्भ में लेखिका ने अपनी भूमिका में ही स्पष्ट कर दिया है कि किसी विशेष धर्म व्यक्ति या धार्मिक दर्शन को बेवजह आघात पहुँचाने की उनकी मंशा नहीं है। समाज और जीवन में धर्म का महत्वपूर्ण स्थान है और वह उसे दिल से स्वीकार करती हैं, परंतु धर्म के नाम पर प्रबल वीभत्सता और संत्रास उत्पन्न कर, धर्म की दुहाई देकर जो लोग इन्सानों के बीच अलगाव की दीवार खड़ी करते हैं, स्त्रियों की स्वाधीनता छीनकर उन्हें अंत:पुर की अंधेरी दुनिया में भेज देते हैं, निर्विकार संहार और लोगों की हत्याएं करते हैं, उन्हीं के विरुद्ध उन्होंने कलम उठाई है।

हालांकि, इसे आत्मकथात्मक उपन्यास बताया जा रहा है, पर यह आत्मकथा या डायरी अधिक और उपन्यास कम लगता है। सुष्मिता ने समाचारपत्रों में मुखर होकर जो कुछ अफ़गानिस्तान के बारे में लिखा या कहा था, वह भी अक्षरश: यहाँ नहीं है। जैसा कि उसने वहां के कुछ पात्रों और तालिबानों से बुरी तरह प्रताड़ित या मारपीट का ज़िक्र किया था जो कि इस पुस्तक में खुलकर नहीं आया है। इसके विरपीत लेखिका ने बहादुरी से उनसे टक्कर लेने तक की बात की है, हथियार भी अपने हाथ में थामा है और यही अधिक उभरा है। संभवत: इन्हीं कुछ घटनाओं के मद्देनज़र इसे उपन्यास का नाम दे दिया गया हो। इसी उपन्यास की अगली श्रृंखला में क्रमश: ‘तालिबान, अफ़गान और मैं’ और ‘एक अक्षर भी झूठा नहीं’ लिखी गई है और एक फ़िल्म भी बन रही है जिसे लेकर लेखिका पर अपने परिवार और बाहरी ताकतों का दबाव बना हुआ है। स्वयं उसके पति जांबाज खान जो सन् 1990 से कोलकाता में है, का मानना है कि अफ़गानिस्तान में रह रहे उसके परिवार को यह विवादग्रस्त फ़िल्म या पुस्तक मुश्किल में डाल सकती है।

लेखिका की यह पुस्तक मूल रूप में उन्हीं दिनों चर्चा में आ गई थी, जब वहाँ तालिबान का दमनकारी शासन था और आठ साल कैदियों की तरह रहकर वह अपने मायके कोलकाता लौट आने में सफल हो गई थी तथा अपनी पुस्तकों व लेखों के माध्यम से वहां की कुव्यवस्था का खुलासा करना शुरू कर दिया था। कोलकाता एक अरसे से पठानों या काबुलीवालों के व्यवसाय का केन्द्र रहा है और गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने ‘काबुलीवाला’ नाम से एक बेहद मार्मिक कहानी लिखी थी जिसका ज़िक्र भी इस कृति में एक-दो स्थानों पर आता है और उन थोड़े से शब्दों से ही तब के काबुलीवाले और आज के काबुलीवाले का चरित्र स्पष्ट हो जाता है। ‘अफ़गानिस्तान और यहाँ के बाशिन्दों के विषय में अच्छा लगने का बोध रवीन्द्रनाथ की कहानी ‘काबुलीवाला’ के पात्र रहमत के माध्यम से जगा था, परंतु आज उस रहमत खां का देश एक कलंक-सा लगता है। क्या यही रहमत का देश है? क्या इसी देश में रहमत की बेटी रहती थी? यहाँ के प्रत्येक व्यक्ति को असहायता लील रही है। पहाड़ों, पथरीली ज़मीन, खुले आकाश हर तरफ मानों हज़ार-हज़ार, लाखों-लाखों मनुष्यों का आर्तनाद, शिशुओं का रूदन सुनाई पड़ता है। तब तो और भी हैरानी होती है जब रहमत खान जैसे व्यक्ति की कोई भी झलक यहाँ के लोगों में देखने को नहीं मिलती। तब सोचती हूँ कि क्या सचमुच रवीन्द्रनाथ को रहमत जैसा कोई व्यक्ति मिला था या सब कल्पना मात्र थी।’ (पृष्ठ 21-22)
यहाँ विरोधाभास यह है कि लेखिका ने ऐसे कुछ लोगों की भी चर्चा की है जिन्होंने कमोबेश उनकी सहायता की। संभवत: अकेलेपन का एक लंबा प्रवास उनके मन-मस्तिष्क को प्रभावित करता है और वह वहाँ के लोगों की विवशता को अनदेखा कर जाती है।

कॉन्वेंट में पढ़ी लेखिका युवावस्था में कोलकाता में एक अफ़गानी युवक जांबाज खाँ से परिवार की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ प्रेम-विवाह करती है और पति ससुराल दिखलाने के बहाने उसे अफ़गानिस्तान के एक गाँव में छोड़कर (बिन बताए) वापस कोलकाता लौट आता है। अकेली लेखिका वहाँ अपने देवरों और अन्य पुरुषों के अत्याचार का शिकार होती रहती है और एक बंदी सा जीवन व्यतीत करती है। उस पर समस्त अफ़गानिस्तान में गृहयुद्ध जैसी स्थिति है और महिलाओं का पुरुष संरक्षण के बिना बाहर निकलना नामुमकिन है। पवित्र धर्मग्रंथ की झूठी कसमें खाने वाले गुलबुद्दीन हिकमतयार जैसे लोग भाई से भाई को लड़ाकर सत्ता जमाने की फ़िराक में हैं पर पहले सोवियत फौज, फिर तालिबानी आतंक के साये में यहाँ के लोगों को जीना पड़ता है। रूढ़िवादी परंपरा के दृष्टिगत महिलाओं की तो सर्वत्र शोचनीय अवस्था है। एक-एक पुरुष की कई-कई ब्याहताएं हैं और इनका काम सिर्फ़ बच्चे जनना है। हरेक दंपति की कम से कम दस-पंद्रह संतानें हैं। लड़कियों के बड़ी होते ही माता-पिता शादी का प्रहसन कर पैसे लेकर लड़के वालों को बेच देते हैं। किस्मत अच्छी हो तो अच्छा पति मिलता है वर्ना सब ख़त्म। अलबत्ता यौन-शोषण का कहीं उल्लेख नहीं मिलता।

पुस्तक का सर्वाधिक रोचक प्रसंग लेखिका का गोद ली हुई पुत्री तिन्नी के साथ स्वदेश भागने का प्रयास है। हिन्दुस्तानी होने के बावजूद पाकिस्तानी पुलिस, सरकारी अफ़सर और लोगों के सहयोगपूर्ण रवैये से वह काफ़ी अभिभूत होती है, जब कि भारतीय दूतावास उसे निराश करता है। इसका लेखिका ने विस्तार से वर्णन किया है।

पुस्तक में अफ़गानिस्तान के लोगों के रहन-सहन, खान-पान, पैदावार, पहरावे, समारोहों आदि का भरपूर उल्लेख है तथा अर्थों के साथ पश्तो या अफ़गानी भाषा की शब्दावलियों का भी। बहरहाल जगह-जगह प्रसंग का अधूरापन पुस्तक में खलता है। संभवत: त्रयी के अन्य दो खंडों में इसी कमी को पूरा किया गया हो।


पुस्तक : काबुलीवाले की बंगाली बीवी
लेखिका : सुष्मिता बंद्योपाध्याय
अनुवाद : नीलम शर्मा अंशु
पृष्ठ – 139, मूल्य – 150 रु.
प्रकाशक – राजकमल प्रकाशन प्रा. लि.,
1, बी, नेताजी सुभाष मार्ग,
नई दिल्ली – 110 002

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