Advertise

साहित्‍य सुगंध हिन्दी साहित्य की सेवा का मंच, है, आप भी सहयोग देना चाहते हैं तो अपना परिचय, तस्वीर,रचनायें -मेल पते पर प्रेषित करें।
 
0 comments

संस्कृति सेतु में अब तक आप कहानी श्रृंखला के तहत् चार अनूदित कहानियों से रू-ब-रू हैं हो चुके हैं। आज प्रस्तुत है अनूदित कविता श्रृंखला - प्रथम, जिसमें हमने शामिल किया है तसलीमा नसरीन की रचनाओं को।

तसलीमा नसरीन की छह कविताएं

बांग्ला से अनुवाद - नीलम शर्मा 'अंशु '

अस्वीकार - 1



भारतवर्ष कोई रद्दी कागज़ नहीं था
कि उसे फाड़कर दो टुकड़े कर दिया गया ।
'सैंतालीस' शब्द को मैं रबर से मिटा देना चाहती हूँ ।
सैंतालीस की कालिमा को मैं पानी, साबुन से धो देना चाहती हूँ।
सैंतालीस नामक काँटा गले में चुभता है,
मैं यह काँटा निगलना नहीं चाहती ।
उगल देना चाहती हूँ
अपने पूर्व-पुरुषों की अखंड भूमि का उध्दार करना चाहती हूँ।

*


अस्वीकार - 2


मुझे ब्रह्मपुत्र भी चाहिए, और स्वर्ण रेखा भी
सीताकुंड पर्वत भी चाहिए, और कंचनजंघा भी।
श्रीमंगल चाहिए, जलपाईगुड़ी भी
शीतल वन विहार चाहिए, और एलोरा-अजंता भी।
कर्जन हाल यदि मेरा है, तो फोर्ट विलियम भी।
इकहत्तर में जिस मानव ने युध्द किया,
विजयी हुआ,
द्विजाति नामक वस्तु को दूर भगाया-
सैंतालीस के समक्ष वह मानव कभी पराजित नहीं होता ।

*


पराधीनता


यह मेरा घर है
मेरा ही घर है यह,
लोग कहते हैं लड़कियों का कैसा घर?

यह मेरी ज़मीन है,
इसमें मैं अपने हाथों से फसल बोऊँगी।
देखकर हंसते हैं लोग,
कहते हैं, नारी तो स्वयं ही है
एक प्रकार का लहलहाता खेत
जिसमें हम शौक से बीज वपन करते हैं।

ये मेरे हाथ हैं,
लोग कहते हैं ये तुम्हारे हाथ नहीं,
हमारी सेवा-सुश्रुषा के लिए बने विशेष अंग मात्र हैं।

ये मेरे होंठ हैं,
लोग कहते हैं ये तुम्हारे कुछ नहीं
चुंबन के लिए बना एक जोड़ा अलंकार है।

यह मेरा गर्भाशय है,
लोग कहते हैं,
यह वास्तव में हमारे वीर्य को रखने वाली थैली है,
जहाँ प्रस्फुटित होंगे हमारे पौरुष के भ्रूण।

* साभार - अविरल मंथन, जुलाई-सितंबर - 1998

कालरात्रि का समय



टेलीफोन सिरहाने अकेला पड़ा रहता है
टेलीफोन अब पहले की भाँति नहीं बजता है,
यदि बजता भी है तो हैलो कहने वाला स्वर
अपरिचित सा लगता है ।
ऐसा भी वक्त गुज़रा है, कि
रवीन्द्र संगीत सुनते हुए सारी रात गुज़ारी है
अंगड़ाई को परे धकेल कर
आलस रहित सुबह लाई हूँ/ ऐसा भी वक्त गुज़रा है
उसकी साँसों में सुलाने का स्वर था
घोर संकट के दिनों में उसी स्वर में/ बेवक्त सो गई हूँ।
आनंदध्वनि के गीत स्नायुयों की सीढ़ी पर गहरी
पद-चाप छोड़ गए हैं।
पृथ्वी पर इतना पानी नहीं है कि धो डालूं,
इतनी मिट्टी भी नहीं है कि प्रणव को लीप कर मिटा दूं।
टेलीफोन के उस पार कितने लोग हैं
रवीन्द्र संगीत सुनाने वाला कोई रतन नहीं है
ेवो पहले सा अनिद्रारोग भी नहीं है
प्रवासी, घर लौट आओ कहकर तंद्राहीन स्वर
में गीत गाकर कोई मेरे दोपहर के एकांत को
पूर्ण भी नहीं करता/ टेलीफोन बजता है,
हैलो हैलो कहने वाला स्वर अपरिचित सा लगता
है ।
**

द्विखंडित


वह तुम्हारा पिता है, वास्तव में वह तुम्हारा कोई नहीं
वह तुम्हारा भाई है, वास्तव में वह तुम्हारा कोई नहीं
वह तुम्हारी बहन है, वास्तव में वह तुम्हारा कोई नहीं
वह तुम्हारी माँ है, वास्तव में वह तुम्हारा कोई नहीं
तुम अकेले हो।
तुम जब रोते हो, तुम्हारी उंगली
तुम्हारी आँक के आँसू पोंछ देती है।
वही उंगली तुम्हारी आत्मीय है
तुम जब चलते हो, तुम्हारा पाँव
तुम जब बोलते हो, तुम्हारी जिह्वा
तुम जब हँसते हो, तुम्हारी प्रसन्नचित आँखे तुम्हारी मित्र हैं।
तुम्हारे सिवा तुम्हारा कोई नहीं
कोई प्राणी या उद्भिज नहीं
फिर तुम इतना मेरा मेरा क्यों करते हो?
क्या वास्तव में तुम भी अपने हो?
* *


विषधर



दो मुँहे साँप से भी ज़हरीला है दो मुँहा मनुष्य।
यदि साँप काटे
तो साँप का ज़हर कभी भी उतारा जा सकता है
मनुष्य के काटने पर किसी भी पद्धति से वह
ज़हर हर्गिज़ नहीं उतरता।


** साभारदिशा (कोलकाता) – अंक – 4, 1996




Leave a Reply

 
[ साहित्‍य सुगंध पर प्रकाशित रचनाओं की मौलिकता के लिए सम्‍बधित प्रेषक ही उतरदायी होगा। साहित्‍य सुगंध पर प्रक‍ाशित रचनाओं को लेखक और स्रोत का उललेख करते हुए अन्‍यत्र प्रयोग किया जा सकता है । किसी रचना पर आपत्ति हो तो सूचित करें]
stats counter
THANKS FOR YOUR VISIT
साहित्‍य सुगंध © 2011 DheTemplate.com & Main Blogger. Supported by Makeityourring Diamond Engagement Rings

[ENRICHED BY : ADHARSHILA ] [ I ♥ BLOGGER ]