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काबुलीवाले की बंगाली बीवी (फ्लैश बैक- 3)

(लेकिन दीदी आजकल आप हैं कहाँ ?)

इस आलेख से पहले आप काबुलीवाले..... की फ्लैश बैक-1 व 2 के तहत् दो समीक्षाएं पढ़ ही चुके हैं। आप भी सोच रहे होंगे कि अब अचानक इतने सालों बाद इन समीक्षाओं की क्या तुक ?

दरअसल यह सब लिखने का ख़याल इसलिए भी आया क्योंकि पिछले कुछ महीनों पहले मुझे बड़ी शिद्दत से उनकी तलाश थी। उनका जो पुराना पता था, वह फ्लैट बदल चुका है। एक ही शहर में रहते हुए न ही बांगला साहित्यिक मित्रों तथा न ही उनके बांगला प्रकाशक से मुझे उनका संपर्क सूत्र उपलब्ध हो पाया।

और उन दिनों कहाँ तो वे इतनी लाईम लाईट में थी कि हिन्दी अनुवाद आने से लगभग साल भर पहले बांगला भाषी मित्रों के माध्यम से प्रस्ताव आया था कि यह किताब बांगला में खूब बिक रही है। इसे पढ़ कर देखिए। किताब को मैंने सरसरी तौर पर पढ़ा परंतु अनुवाद का मन नहीं बना। लेकिन डेढ़-दो वर्षों बाद अचानक जब तालिबान सक्रिय हो गए तो नज़ारा ही बदल गया। लेखिका को लोगों ने हाथों-हाथ लिया था। क्या प्रिंट और क्या इलैक्टॉनिक मीडिया। तब सोचा चलो अनुवाद कर ही लिया जाए। लेखिका को तलाशा गया, बात की गई मगर उनके रिकॉर्ड की सुई एक ही बात अटकी रही – आमाके तिरिश हाजार टाका दिते हौबे (अर्थात् मुझे तीस हजार रुपए दीजिए)। ख़ैर उन्हें कौन समझाए कि कहाँ तो अनुवादक अपने पारिश्रमिक की मांग करे और कहां वे हैं कि उन्हें भुगतान करने का राग अलापे जा रहीं हैं। उन्हें समझाया गया कि पहले अनुवाद की अनुमति तो दें, अनुवाद होगा, प्रकाशक तलाशा जाएगा, वह प्रकाशन के लिए राज़ी होगा तब तो पैसे की बात आती है। लेकिन वे यही कहती रहीं मुझे बांगला वाले इतना दे रहे हैं, अमुक चैनल वाले इतना दे रहे हैं। खैर, उनसे अनुमति मिलने के बाद मैंने राजकमल प्रकाशन के प्रबंधक महोदय से फोन पर बात की और मार्केट की फीड बैक तथा संभावनाओं को देखकर वे तैयार हो गए। कहाँ मोहतरमा एक किताब यानी काबुलीवाले.... के लिए तीस हज़ार अग्रिम की माँग कर रही थीं और कहाँ प्रकाशक ने उनकी तीनों किताबों का अनुबंध कर लिया। यकीन मानिए ऑफिस से दो हफ्ते की अर्जित छुट्टी लेकर मैंने दिन-रात अनुवाद करके काबुलीवाले..... को पूरा किया। मार्केट में इसकी क्रेज देखते हुए प्रकाशक की तरफ से भी दबाव था कि जल्दी ख़त्म करें। सोचिए सुबह शाम जब इन्सान अपने इष्ट देव की पूजा-आराधना करता है तब मैं तालिबान..... का पाठ कर रही होती तड़के तीन-चार बजे। बाद की सीरीज़ की दोनों किताबों में मुझे उतना मजा़ नहीं आया क्योंकि उनमें ज्यादातर पुनरावृति वाले विवरण ही थे। वैसे मैं प्रोफेशनल अनुवादक हूं, लेकिन इतनी भी नहीं कि पैसों की ख़ातिर कोई भी काम हाथ में ले लो। मैं अपनी आत्म-संतुष्टि और पसंद के आधार पर पुस्तकों का चयन करती हूं। यह पहला ऐसा काम था जो बाज़ार की माँग और संभावनाओं को देखते हुए मैंने हाथ में लिया था। ख़ैर ऑफिस से छुट्टी लेकर घर बैठ इस किताब पर काम कर रही थी और सिर्फ़ तीन पृष्ठ बाकी थे, लेकिन शाम को एफ. एम. की ड्यूटी पर परफॉर्म करने जाना था, सो तीन बजे तक घर से निकलना था सोचा रात को आकर पूरा कर लूंगी। बीच में ही एक लेखक तथा उपक्रम के अधिकारी महोदय का फोन आ गया, उन्होंने आवश्यक कार्य की दुहाई देकर जल्दी से जल्दी मिलने की बात कही। चूँकि मैं छुट्टी पर थी और उस दिन तो मुझे रेडियो के काम से निकलना ही था तो सोचा जाते-जाते उनसे मिलते हुए रेडियो स्टेशन चली जाऊँगी। लिहाज़ा वे तीन पृष्ठ मुझे बीच में ही छोड़ने पड़े। उनसे मिलने का तकाज़ा न होता तो संभवत: अपने निकलने के शेडयूल तक मैं उनकों पूरा कर ही लेती।

जब उनसे मिली तो जो कार्य बताया गया वह उतना महत्वपूर्ण नहीं था जिस हिसाब से तकाज़ा किया गया था। हार कर मुझे कहना ही पड़ा कि इतना आवश्यक काम तो यह नहीं था जितना आवश्यक काम मैं घर पर छोड़ कर आई हूँ। उल्लेखनीय है कि कलकत्ते के साहित्यिक जगत में किसी को कानों-कान ख़बर नहीं थी कि मैं उस किताब पर काम कर रही हूँ। उन्होंने पूछा, ऐसा कौन सा काम कर रही हैं आप? सोचा अब तो काम लगभग पूरा हो चुका है अब बताने से क्या फर्क़ पड़ता है। मैंने बता दिया कि बांगला की अमुक किताब का काम कर रही हूं। छूटते ही उन्होंने कहा, आप कैसे कर रही है, यह सब करने का ठेका तो हमारी मैडम (उनके अधीन कार्यरत हिन्दी अनुवादक) ने ले रखा है। बस फिर क्या था उन्हें तो मौका मिल गया होगा मैडम को सुनाने के लिए कि अरे, आप क्या सोचती हैं, शहर में और भी लोग है काम करने वाले। इन बातों का पता मुझे बाद में चला। (ख़ैर, आज की तारीख़ में दोनों ही इस दुनिया में नहीं रहे)। यकीन मानिए अगले दिन लेखिका का फोन आता है कि मुझे किसी का फोन आया था, कहा गया कि हमने इस किताब का अनुवाद कर लिया है, आप सिर्फ़ अनुवाद की अनुमति दे दें। और वे मुझे इसके लिए और भी ज्यादा पैसे ऑफर कर रहे हैं। मैंने उनसे कहा कि दीदी सोच लीजिए, आप मुझे लिखित अनुमति दे चुकी है, इन लोगों ने आपकी अनुमति के बगैर ही अनुवाद पूरा भी कर लिया ? बाद में मुझे दोष मत दीजिएगा, ज्यादा पैसे के लिए आप कुछ भी कर लेंगी? यानी उस हॉट केक को भुनाने के लिए लोग तिकड़में भिड़ाने लगे और माज़रा मेरी समझ में आ गया कि मार्केट में इसकी भनक कैसे और कहाँ से लगी। मैंने अपने प्रकाशक को बताया और उन्होंने मुझे जल्द से जल्द काम ख़त्म कर डिसपैच करने को कहा, साथ ही यह भी कहा लेखिका को हम एडवांस दे चुके हैं, ऐसी स्थिति में वे किसी और से अनुबंध नहीं कर सकतीं, आप बेफिक्र रहिए। तब से मैंने सबक लिया कि चुपचाप काम करो, किसी को कुछ मत बताओ। अब जब भी कोई मिलता है और रस्मी तौर पर पूछा जाता है कि आजकल क्या हो रहा है, किस पर काम कर रही हैं, जवाब में कहती हूं बस, कुछ खास नहीं। और ...... फिर किताब के प्रकाशन के बाद कोलकाता पुस्तक मेले में उसकी हिन्दी बेस्ट सेलर के तौर पर खूब बिक्री हुई।

और जिन दिनों उनकी मीडिया में बहुत पूछ थी मैंने घर बैठे-बैठे देखा कि वे चैनेल्स पर साक्षात्कार दे रही थीं, गोद में हिन्दी अनुवाद रखा हुआ था, परंतु उन्होंने एक बार भी अनुवादक का नाम नहीं लिया कि अमुक ने इसका हिंदी अनुवाद किया है। मिलने पर मैंने उनसे कहा कि दीदी आप तो मीडिया वालों से ऐसे बात कर रही थीं मानो किताब सीधे हिन्दी में लिखी गई हो, आपने मेरा नाम एक बार भी लेना ज़रूरी नही समझा। तो, उन्होंने कहा – भूल होए गेछे, सॉरी।

फिर दैनिक ट्रिब्यून में अचानक इसकी समीक्षा देखी। समीक्षक मेरे परिचित नहीं थे, लेकिन उन्होंने समीक्षा में अनुवादक का ईमनादारी से जि़क्र किया था। समीक्षा के बाद मैंने ट्रिब्यून के दफ्तर से उनका (रतन चंद्र रत्नेश जी) संपर्क सूत्र प्राप्त कर उनसे संपर्क किया जो आज भी क़ायम है। फिर अचानक हंस में समीक्षा पर नज़र पड़ी। दो पृष्टों की लंबी चौड़ी सारगर्भित समीक्षा थी परंतु दो पन्नों के इतने बड़े आलेख में अनुवाद या अनुवादक पर टिप्पणी करने की ज़रूरत महसूस नहीं की गई। मैडम दूर्वा जी से जब मैंने पत्र में शिकायत करते हुए अपनी बात पहुंचाई तो उन्होंने जो जवाबी लॉलीपॉप थमाया वो कुल मिलाकर इस प्रकार था कि – नीलम जी आपका अनुवाद इतना बढ़िया था कि पढ़ते वक्त आदमी को महसूस ही नहीं होता कि वह अनूदित रचना है। मुझसे जो चूक हुई, उसके लिए माफ़ी चाहती हूँ।

समीक्षा सारी दुनिया के सामने से ग़ुज़री और चूक जो हुई उसे कोई न जान पाया।

यानी अनुवाद कार्य या अनुवादक को गंभीरता से लेने की आवश्यकता कोई नहीं समझता। अक्सर लोग कह देते हैं, छोड़िए न अनुवाद में क्या रखा है। अपनी कविता या कहानी लिखिए। मानो अनुवाद कार्य दोयम दर्जे का काम हो। दूसरों की संतान का लालन-पालन करने समान लेकिन साहब माता देवकी ने भगवान कृष्ण को सिर्फ़ जन्म दिया था, उनकी बाल लीलाओं के रसास्वादन का मौका तो मैय्या यशोदा को ही मिला।

ख़ैर, अनुवाद कार्य के दौरान एक दिन किसी मुलाक़ात में मैंने लेखिका से पूछा था कि क्या हिंदुस्तान लौट कर जांबाज को ढूँढा आपने ? तो उन्होंने बताया कि जांबाज के साथ ही रह रही हूँ। यह फ्लैट उसी ने लेकर दिया है। वही तो खर्चा दे रहा है। मैंने पूछा था, जो व्यक्ति आपको धोखे से एक अजनबी देश में अजनबी लोगों के बीच छोड़कर भाग आया और अपनी कोशिशों से इतनी मशक्कतों के बाद आप देश लौटती हैं और फिर से उसी आदमी के साथ एक ही छत के नीचे कैसे रह पाती हैं? कम से कम मैं तो ऐसा सपने में भी नहीं सोच सकती। जवाब में उन्होंने कहा था, मेरे पांवों तले अपनी ज़मीन भी नहीं है, मुझे तो उस पर ही निर्भर रहना है। लौटकर सबसे पहले मेरे सामने खुद को स्टैंड करने का सवाल था, मायका तो मेरा रहा नहीं, वहां तो ठौर मिलने से रहा, कौन सा मुंह लेकर जाऊँगी। ख़ैर, हो सकता है उनका नज़रिया या जवाब सही हो, पर मेरे गले नहीं उतरा। वैसे उनकी हिम्मत की दाद देनी होगी, कोई और युवती होती तो सिसक-सिसक कर, एडियां रगड़-रगड़ वहीं मर-खप जाती, हिंदुस्तान शायद ही लौट पाती।

उपन्यास पर फिल्म भी बनी, एस्केप फ्राम तालिबान। मनीषा कोईराला ने सुष्मिता की भूमिका निभाई। पुस्तक और फिल्म के कथानक में कोई तारतम्य नहीं दिखा। फिल्म सक्सेसफुल भी नहीं रही।


- नीलम शर्मा ‘अंशु’

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