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' कभी ज़िन्दगी में किसी के लिए मत रोना
क्योंकि वह तुम्हारे आँसुओं के काबिल नहीं होगा........
और वो जो इसके काबिल होगा
वो तुम्हें कभी रोने नहीं देगा......
'


जिन दिनों हम टालीगंज में रहा करते थे, उन्हीं दिनों एफ. एम. ज्वॉयन किया था। 120 कवार्टरों वाली बिल्डिंग में हम चौदहवीं मंज़िल पर रहते थे। कोई न जानता था कि ये एफ. एम. पर आती हैं। दरअसल कभी कोई पूछता भी तो मैं इन्कार कर देती कि नहीं वो मेरी आवाज़ नहीं है। ऐसे ही एक लड़का छठी-सातवीं में पढ़ता था, वह हमारे घर अख़बार दिया करता था। उसे किसी तरह पता चल गया। अब जिस दिन वह अख़बार देने आता (क्योंकि रोज़ अलग-अलग लड़के आया करते थे), घंटी बजाकर मम्मी से कहता, दीदी से पूछ कर बताईए न कि अगला प्रोग्राम किस दिन है। मैं उसे कहती, अरे पढ़ाई किया करो। प्रोग्राम वगैरह के चक्कर में मत रहो। तो वह कहता, मेरी पढ़ाई का नुकसान मैं नहीं करता, मैं आपके प्रोग्राम से पहले या बाद में पढ़ाई कर लेता हूँ। फिर हमने दिसंबर 2004 में ठाकुरपुकुर इलाके में शिफ्ट किया। यही कोई साल या डेढ़ साल पहले सुबह-सुबह एक दिन साईकिल पर तफ़रीह के लिए जा रही थी तो पास से गुज़र रहे एक लड़के ने पुकारा, नीलम दी। रुक कर उसकी तरफ देखा, लंबा-चौड़ा सा युवक। परंतु चेहरा क़तई जाना-पहचाना नहीं लगा। उसके चेहरे पर स्माईल थी। उसने कहा – चीनते पारले न तो (नहीं पहचाना न।) मैं अमुक। आपके घर अख़बार दिया करता था। आप इस इलाके में.....? आजकल इधर रहती हैं क्या ? मेरे पूछने पर कि आजकल क्या करते हो तो उसने कहा, अब मैं इंवनिंग कॉलेज में बी.ए. फर्स्ट ईयर में हूँ, पढ़ाई के साथ-साथ काम भी करता हूँ। मैंने कहा, अब तो देखने में तुम मेरे दादा (भईया) लगते हो, इतने बड़े हो गए हो। कैसे पहचानूं। वैसे भी इतने सालों में वह मेरे ज़ेहन से निकल चुका था। ख़ैर.... उसने मुझे पहचाना क्योंकि बड़ा तो वह हुआ था, (मेरे ज़ेहन में तो उसके बचपन की सूरत ही थी)। मेरे हिसाब से मेरी शक्ल में तो कोई बदलाव नहीं आया। हाँ, यह अलग बात है कि बहुत से लोग कहते हैं कि पहले की तुलना में मेरी पर्सनैलिटी बहुत बदल गई है। तो चलिए धन्यवाद उन दोस्तों का, जिनकी सोहबत में यह बदलाव आया होगा (कहते हैं न, मैन इज़ नोन बाय द कंपनी ही कीप्स)। उस बच्चे ने मुझे पहचाना। अरे.... अरे, हो सकता है अब उसे बच्चा कहलवाना पसंद न आए। ऐसे ही वह मुझे अब भी आते-जाते रास्ते में मिल जाता है, कभी-कभी मेट्रो स्टेशन पर भी। कहता है दीदी, मैं तुम्हें रोक कर बात कर लेता हूँ, तुम बुरा तो नहीं मानती न ? मेरा मोबाईल नंबर ले रखा है। एस. एम. एस. और फोन भी कर लेता है। अक्सर कहता है - दीदी, प्लीज़ कोई सैड सॉन्ग सुनवाना। और प्रोग्राम की डेट बता दिया करें। मैं कहती हूँ, मुझे सैड सॉन्ग सुनवाना क़तई पसंद नहीं। ये क्या बात हुई कि सबको मनोरंजन के नाम पर सैड कर दो। जब तक स्क्रिप्ट की बहुत ज़्यादा माँग न हो, मैं सैड सॉन्ग नहीं रखती। बच्चे हो, अभी से कौन से दु:खों का पहाड़ टूट पड़ा। उसने कहा, नहीं ज़िंदगी में बहुत दु:ख देखे हैं। मैंने कहा, अभी तो बहुत बड़ी ज़िंदगी बाकी है, अभी से हार गए तो कैसे चलेगा। उसके एस. एम. एस. भी सैड होते हैं। मैंने उसे मना किया, एस.एम.एस.भेज कर पैसे मत बर्बाद किया करो, क्योंकि मेहनत की कमाई है उसकी तथा साथ-साथ वह पढ़ाई भी तो करता है। यानी अभी जीवन से स्थापित होने के लिए संघर्षरत है। पिछले प्रोग्राम से पहले मैं तैयारी कर रही थी तो उसके एक के बाद एक पाँच मैंसेज आए। 02 जुलाई को जब मैं मुहम्मद अज़ी़ज़ पर प्रोग्राम कर रही थी तो उसका मैसेज आया, दीदी तुमने बताया ही नहीं लेकिन देखो मैं तुम्हारा प्रोग्राम सुन रहा हूँ।


लेकिन, आज सुबह बस यूं ही कंप्यूटर पर काम करते-करते अचानक किसी बात पर आँखें नम हो आईं (बहुत ही इमोशनल हूँ न, ये दिल है कि मानता ही नहीं, यह जानते हए भी कि इस तरह के लोग आज की सोसायटी में मिसफिट हैं)। अचानक उसी वक्त मोबाईल का एसएमएस बीप बज उठा। देखा 9. 25 पर उसी नीलकमल का एस. एम. एस. था। नीलकमल बंगलाभाषी है, लेकिन इलैक्ट्रॉनिक मीडिया की बदौलत यह पीढ़ी हिन्दी भी सीख गई है। एस. एम. एस. रोमन हिन्दी में था, लिखा था –


' कभी ज़िंदगी में किसी के लिए मत रोना
क्योंकि वह तुम्हारे आँसुओं के काबिल नहीं होगा........
और वो जो इसके काबिल होगा
वो तुम्हें कभी रोने नहीं देगा......
'


और मेरे होठों पर मुस्कान खेल गई कि अनजाने में ही कितने सही वक्त पर उसने कितना माकूल मैसेज भेजा ( कहाँ तो मैं उसे कहा करती हूँ कि मैसेज भेजने में पैसे बर्बाद मत किया करो)। ख़ैर ! आँखें नम होने की वजह चाहे जो भी रही हो लेकिन मैंने तुरंत आँखे पोंछ डाली।

3 Responses so far.

  1. Archana says:

    और वो जो इसके काबिल होगा.............तुम्हे कभी रोने नहीं देगा..........एकदम सही........

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