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कंकाल (रतन चंद 'रत्नेश' द्वारा अनूदित गुरुदेव टैगोर की कहानी)

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जब मैंने अपनी स्कूली शिक्षा पूरी कर ली तो मेरे पिताजी ने वैद्य बनाने के उद्देश्य से मेरे लिए एक प्रसिद्घ और योग्य गुरु को नियुक्त  किया। मेरे नये गुरु न केवल देशी जड़ी-बूटी में महारत थे, बल्कि वे आधुनिक  चिकित्सा पद्घति भी जानते थे। मनुष्य के शरीर की संरचना समझाने के लिए उन्होंने एक मनुष्य का ढांचा अर्थात् नर-कंकाल मंगवा लिया, जो उसी कमरे में रखा गया, जहां मैं पढ़ता था। हर व्यक्ति  जानता है कि हड्डियों के पिंजर से कम आयु वाले बच्चे डरेंगे, खासकर जब वे अकेले होंगे। सच तो यह है कि मुझे भी डर लगता था और शुरू-शुरू में मैं कभी उस कमरे में अकेला नहीं जाता था। अगर कभी जाना भी पड़ जाता तो उसकी ओर आंख उठाकर नहीं देखता था। एक और विद्यार्थी भी मेरा सहपाठी था। जो बहुत निडर था। वह कभी उस पिंजर से नहीं डरता था बल्कि कहा करता था कि इसकी औकात ही क्या है जो किसी जीवित व्यक्ति  को हानि पहुंचा सके। अभी हड्डियां हैं, कुछ दिनों बाद मिट्टी में बदल जाएंंगी। पर मैं इस विषय में उससे कभी सहमत न हो सकता और हमेशा यही कहता रहा कि माना कि आत्मा इन हड्डियों से विलग हो चुकी है, फिर भी जब तक इसका अस्तित्व रहता है, वह समय-असमय पर आकर अपने पुराने मकान को देख जाया करती है। दरअसल मेरा यह विचार अनोखा या असम्भव प्रतीत होता था और कभी किसी ने यह नहीं देखा होगा कि आत्मा फिर अपनी हड्डियों में वापस आई हो। पर यह एक अमर घटना है कि मेरा विचार सत्य था और सत्य निकला।
कुछ दिनों पहले की घटना है कि एक रात घर की आवश्यकताओं के चलते मुझे उस कमरे में सोना पड़ा। मेरे लिए यह नई बात थी। अत: नींद नहीं आई और मैं बहुत देर तक करवटें बदलता रहा। यहां तक कि पास के गिरजाघर ने बारह का घंटा भी बजा दिया। जो लैम्प मेरे कमरे में प्रकाश दे रहा था, वह मद्घम होकर धीरे-धीरे बुझ गया। उस समय मैंने उस प्रकाश के बारे में सोचा कि क्षण-भर पहले वह यहां था पर अब हमेशा के लिए अंधेरे में तब्दील हो गया है। संसार में मानव-जीवन की भी यही दशा है। जो कभी दिन और कभी रात के अनन्त में जा समाता है।
धीरे-धीरे मेरे विचार अस्थि-पिंजर की ओर परिवर्तित होने लगे। मैं मन ही मन सोच रहा था कि भगवान जाने ये हड्डियां अपने जीवन में क्या कुछ न होंगी। सहसा मुझे ऐसा लगा मानो कोई अनोखी चीज मेरे पलंग के चारों ओर अन्धेरे में घूम रही है। फिर लम्बी सांसों की आवाजें, जैसे कोई दुखी व्यक्ति  सांस ले रहा हो। मुझे किसी के पांवों की आहट भी सुनाई दी। मैंने सोचा यह मेरा भ्रम है और बुरे सपनों के कारण काल्पनिक आवाजें आ रही हैं। पर पांव की आहट फिर सुनाई दी। इस पर मैंने अपना भ्रम दूर करने के लिए ऊंंचे स्वर में पूछा, ”कौन है?”
यह सुनकर वह अपरिचित व्यक्ति मेरे पास आया और बोला, ”मैं हूं! अपने पिंजर को देखने आई हूं।”
मुझे लगा कि मेरा कोई परिचित मुझसे मजाक कर रहा है। अत: मैंने कहा, ”यह भी कोई समय है पिंजर देखने का। असल में तुम चाहते क्या हो।”
स्वर सुनाई दिया, ”इस असमय से मुझे क्या मतलब? मेरी चीज है, मैं जिस समय चाहूं इसे देख सकती हूं। क्या तुम्हें नहीं दिखाई देता कि ये मेरी पसलियां हैं और जिनमें वर्षों मेरा हृदय रहा है। मैं पूरे छब्बीस वर्ष इस घोंसले में बन्द रही, जिसको अब तुम पिंजर कहते हो। यदि मैं अपने पुराने घर को देखने चली आई तो इसमें तुम्हें क्या आपत्ति है।”
मैं डर गया और उस आत्मा को टालना चाहा, ”अच्छा ठीक है, तुम जाकर अपना पिंजर देख लो, मुझे नींद आ रही है। मैं सोने लगा हूं।” मैंने दृढ़ निश्चय कर लिया कि वह जैसे ही यहां से हटेगी, मैं भागकर बाहर चला जाऊंगा। पर वह टलने वाली नहीं थी, कहने लगी, ”क्या तुम यहां अकेले सोते हो? अच्छा आओ कुछ बातें करें।”
उसका आग्रह मेरे लिए व्यर्थ की विपत्ति से कम न था। मृत्यु की रूपरेखा मेरी आंखों के सामने घूमने लगी। फिर भी विवश होकर मैंने कहा, ”ठीक है, बैठ जाओ और कोई मनोरंजक बात सुनाओ।”
आवाज आई, ”तो सुनो। पच्चीस वर्ष पहले मैं भी तुम्हारी तरह मनुष्य थी और मनुष्यों में बैठ कर बातें किया करती थी, लेकिन अब सूने श्मशान में इधर-उधर घूमती रहती हूं। आज मेरी इच्छा हुई कि फिर से एक लम्बे अंतराल के बाद किसी  मनुष्य से बात करूं। मुझे प्रसन्नता हुई कि तुम मेरी बातें सुनने के लिए राजी हो गए। क्यों? तुम सचमुच मुझे सुनना चाहते हो या नहीं।”
यह कहकर वह आगे सरकी और मुझे लगा कि कोई व्यक्ति मेरे पायताने आ बैठा है। फिर इससे पहले कि मैं कुछ कहूं, उसने अपनी कथा सुनानी आरम्भ कर दी।
”महाशय, जब मैं मनुष्य के रूप में थी तो सिर्फ एक व्यक्ति  से डरती थी और मेरे लिए मानो यमराज था। वह था मेरा पति। जिस प्रकार कोई मछली को कांटे में फंसाकर पानी से बाहर ले आता है, ठीक उसी तरह वह व्यक्ति  मुझे मेरे माता-पिता के घर से ले आया था और मुझे वहां जाने से रोकता था। अच्छा हुआ कि उसका पत्ता जल्दी ही साफ हो गया यानी कि विवाह के दूसरे महीने ही वह संसार से चल बसा। लोगों की तरह मैंने वैष्णव रीति से उसका क्रियाकर्म तो किया, पर मन से बहुत प्रसन्न थी कि उससे पीछा छूटा। अब मुझे अपने माता-पिता से मिलने की आज्ञा मिल जाया करेगी और मैं अपनी उन पुरानी सहेलियों से मिल सकूंगी जिनके संग खेला करती थी। पर अभी मुझे मायके जाने की आज्ञा मिलने ही वाली थी कि मेरे ससुर घर आए और मेरा चेहरा ध्यान से देखने के बाद बुदबुदाने लगे, ”मुझे इसके हाथ और पांव के चिन्ह देखने से लगता है कि यह लड़की डायन है।”
अपने ससुर के वे शब्द मुझे अब तक याद हैं। वे मेरे कानों में गूंज रहे हैं। उसके कुछ दिनों बाद मुझे अपने पिता के यहां जाने की आज्ञा मिली। पिता के घर जाने पर जो खुशी मुझे मिली, उसका बयान शब्दों में नहीं किया जा सकता। मैं वहां आनंदपूर्वक अपने यौवन के दिन बिताने लगी। मैंने उन दिनों कई बार लोगों से अपने बारे में कहते सुना कि मैं बहुत सुन्दर हूं, पर तुम कहो तुम्हारी क्या राय है?”
मैंने कहा, ”मैंने तुम्हें जीवित देखा नहीं, मैं कैसे अपनी राय दे सकता हूं। जो कुछ तुमने कहा ठीक ही होगा।”
वह बोली, ”मैं तुम्हें कैसे विश्वास दिलाऊं कि मेरी आंखें देखने वालों पर बिजलियां गिराती थीं। खेद है कि तुम मेरी वास्तविक मुस्कान का अनुमान इन हड्डियों के खुले मुखड़े से नहीं लगा सकते। इन हड्डियों के चारों ओर जो सौन्दर्य बिखरा था, अब उसका नामोनिशान नहीं।  मेरे जीवन के उन पलोंं में कोई योग्य-से-योग्य डाक्टर भी कल्पना नहीं कर सकता था कि मेरी हड्डियां मानव-शरीर की रूप-रेखा दर्शाने के काम आएंगी। मुझे वे दिन याद हैं जब मैं चला करती थी तो प्रकाश की किरणें मेरे एक-एक बाल से निकलकर प्रत्येक दिशा में फैल जाती थीं। मैं अपनी बांहों को घण्टों निहारा करती थी। आह, ये वे बांहें थीं, जिसे भी दिखाईं, वही आसक्त होकर रह गया। सम्भवत: सुभद्रा को भी ऐसी बांहें नसीब न हुई होंगी। मेरी कोमल और पतली उंगलियां कमल नाल को भी मात देती थीं। खेद है कि मेरे इस नग्न-ढांचे ने तुम्हें मेरी सुन्दरता को लेकर बिल्कुल झूठी राय निर्धारित करने का अवसर दिया। तुम मुझे यौवन के क्षणों में देखते तो तुम्हारी आंखों से नींद उड़ जाती और इस आयुर्वेदिक ज्ञान की ललक मस्तिष्क से अशुद्घ शब्द की भांति समाप्त हो जाती।
उसने कहानी अबाध रूप से जारी रखी, ”मेरे भाई ने निर्णय लिया कि वह विवाह नहीं करेगा। इस तरह घर में मैं ही एकमात्र महिला थी। जब शाम को मैं अपने बगीचे में छायादार वृक्षों के नीचे बैठती तो तारे मुझे घूरा करते और मेरे पास से गुजरती शीतल हवा तो मेरे साथ अठखेलियां करने लगतीं। मैं अपनी सुन्दरता पर इतराती और अक्सर सोचा करती थी कि जिस धरती पर मेरे पांव पड़ते हंै, अगर उसमें अनुभव करने की शक्ति  होती तो प्रसन्नता से फूली न समाती। कभी ऐसा लगता जैसे संसार के सारे प्रेमी युवक घास के रूप में मेरे पैरों पर पड़े हैं। अब ये समस्त विचार मुझे दुखी करते हैं कि आह! क्या था और क्या हो गया।
”मेरे भाई का एक मित्र सतीश कुमार था जिसने मेडिकल कालेज से डाक्टरी की शिक्षा प्राप्त की थी। वह हमारा भी घरेलू डाक्टर था। वैसे उसने मुझेे नहीं देखा था पर मैंने उसे एक दिन देख ही लिया और मुझे यह कहने में भी संकोच नहीं कि उसकी सुन्दरता ने मुझे बेहद प्रभावित किया। मेरा भाई अजीब किस्म का व्यक्ति  था। वह कभी घर के कामों में दिलचस्पी नहीं लेता और न ही कोई हस्तक्षेप करता। उसे  मौन और एकान्त प्रिय था जिसका परिणाम यह हुआ कि संसार से विरक्त होकर वह एकान्तप्रिय बन गया और साधु-महात्माओं सा जीवन बिताने लगा।”
”हां तो वह युवक सतीश कुमार हमारे यहां अक्सर आता। वही एक ऐसा था, अपने घर के पुरुषों के अलावा जिसे मुझे देखने का संयोग प्राप्त हुआ था। जब मैं बगीचे में अकेली होती और फूलों से लदे हुए वृक्ष के नीचे महारानी की तरह बैठी रहती, मेरे मन में सतीश कुमार का ख्याल कुछ अधिक ही आने लगता।  पर तुम किस सोच में डूब गए। तुम्हारे अंदर क्या चल रहा है?”
मैंने ठंडी सांसें लेते हुए कहा, ”मैं यह सोच रहा हूं कि कितना अच्छा होता कि मैं ही सतीश कुमार होता।”
वह हंसकर बोली, ”अच्छा, पहले मेरी कहानी सुन लो फिर प्रेमालाप कर लेना। एक दिन वर्षा हो रही थी। मुझे कुछ बुखार था। उस समय डाक्टर यानी कि मेरे प्रिय सतीश मुझे देखने आए। यह पहला अवसर था जब हम दोनों ने एक-दूसरे को आमने-सामने देखा और देखते ही डाक्टर मूर्ति की तरह जड़ हो गए। तब मेरे भाई की मौजूदगी ने उन्हें होश संभालने के लिए बाध्य कर दिया। वे मेरी ओर इशारा करके बोले, ”मैं इनकी नब्ज देखना चाहता हूं।” मैंने धीरे-से अपना हाथ दुशाले से बाहर निकाला। डाक्टर ने मेरी नब्ज पर हाथ रखा। मैंने कभी नहीं देखा है कि कोई डाक्टर  साधारण ज्वर के निरीक्षण में इतना सोच-विचार करता हो। उनके हाथ की उंगलियां कांप रही थीं। बड़ी मुश्किल से उन्होंने मेरे ज्वर को अनुभव किया, पर मेरा ज्वर टटोलते-टटोलते वे स्वयं ही बीमार हो गए। क्यों, तुम इस बात को मानते हो या नहीं?”
मैंने डरते-डरते कहा, ”हां, बिल्कुल मानता हूं। मनुष्य में बदलाव आना स्वाभाविक है।”
उसने आगे कहा, ”कुछ दिनों बाद मुझे भान हुआ कि मेरे मन में डाक्टर के अलावा और किसी युवक का विचार तक नहीं आया। शाम के समय हर रोज बसन्ती रंग की साड़ी पहनकर बालों में कंघी, गले में फूलों का हार डाले, बगीचे में जाकर घंटों स्वयं को आइने में निहारती। क्यों, क्या दर्पण देखना बुरा है?”
मैंने घबराकर कहा, ”नहीं तो।”
उसने कहानी का सिलसिला जारी रखते हुए कहा, ”आइना  देखकर मैं ऐसा अनुभव करती जैसे मेरे दो रूप हों यानी कि मैं स्वयं ही सतीश कुमार बन जाती और स्वयं ही अपने प्रतिबिम्ब को प्रेमिका समझकर उस पर तन-मन न्यौछावर करती। यह मेरा बहुत ही प्रिय मनोरंजन था और मैं घण्टों बीता देती। कई बार ऐसा हुआ कि दोपहर को बिस्तर पर लेटकर जरा-सी झपकी लेती तो सपने में सतीश कुमार आ जाते और मेरे हाथ को चूम लेते। बस, अब मैं कहानी समाप्त करती हूं, तुम्हें तो नींद आ रही है।”
मेरी उत्सुकता बढ़ गई थी। अत: मैंने नम्रतापूर्वक कहा, ”नहीं, तुम कहती जाओ, मेरी जिज्ञासा बढ़ती जा रही है।”
वह राजी हो गई, ” ठीक है, सुनो! कुछ ही दिनों में ही सतीश कुमार का कारोबार बहुत बढ़ गया और उसने हमारे मकान के नीचे के हिस्से में अपनी डिस्पेन्सरी खोल ली। जब उसे रोगियों से अवकाश मिलता तो मैं उसके पास जा बैठती और हंसी-मजाक में तरह-तरह की दवाइयों का नाम पूछती रहती। इस प्रकार मुझे ऐसी दवाओं के बारे में भी जानकारी मिल गई जो घातक होती हैं। मैं उससे जो कुछ पूछती, वह बड़े प्रेम और नम्रता से बताया करता। इस तरह एक लम्बा समय बीत गया और मैंने अनुभव किया कि डाक्टर साहब होशोहवाश खोये से रहते है और जब कभी मैं उसके सामने जाती हूं तो उसके चेहरे पर मुर्दनी-सी छा जाती है। पर ऐसा क्यों होता है? इसका कोई कारण मैं जान न सकी। एक दिन डाक्टर ने मेरे भाई से गाड़ी मांगी। मैं पास बैठी थी। मैंने भाई से पूछा, ”डाक्टर साहब रात में इस समय कहां जा रहे हैं?” उसने कहा, ”बर्बाद होने।”
मेरी समझ में कुछ नहीं आया। अत: उससे अनुरोध किया कि मुझे बताए कि वे कहां जा रहे हंै? भाई ने कहा, ”वह विवाह करने जा रहा है।” यह सुनकर मुझ पर पहाड़ टूट पड़ा, पर मैंने अपने-आपको संभाला और भाई से फिर पूछा, ”क्या वह सचमुच विवाह करने जा रहे हंै या तुम मुझसे मजाक कर रहे हो?” उसने उत्तर दिया, ”सच यही है कि आज वह दुल्हन लेकर आएगा।”
”मैं बता नहीं सकती कि इस बात ने मुझे कितना कष्ट पहुंचाया। मैंने अपने आप से यह प्रश्न बार-बार पूछा कि डाक्टर ने मुझसे यह बात क्यों छिपाकर रखी। क्या मैं उन्हें रोकती कि विवाह मत करो? इन पुरुषों की बात का कोई विश्वास नहीं।
”दोपहर को वे रोगियों को देखकर डिस्पेन्सरी में आए तो मैंने उनसे पूछा, ”डाक्टर साहब! क्या यह सच है कि आज आपका विवाह है?” यह कहकर मैं बहुत हंसी और डाक्टर यह देखकर कि मैं इस बात को हंसी में उड़ा रही हूं, न केवल लज्जित हुए  बल्कि कुछ चिन्तित भी दिखे। फिर मैंने सहसा पूछा, ”डाक्टर साहब, क्या आप विवाह के बाद भी लोगों की नब्ज देखा करेंगे? आप तो डाक्टर हैं और अन्य डाक्टरों की अपेक्षा प्रसिद्घ भी। आप शरीर के सारे अंगों के बारे में भी पूरी जानकारी रखते हैं पर मुझे खेद है कि एक डाक्टर होकर भी किसी के हृदय के बारे में नहीं जान पाते हैं कि वह किस दशा में है जबकि हृदय भी शरीर का एक अंग है।”
मेरे शब्द डाक्टर को तीर की भांति लगे, पर वे मौन रहे।
”लग्न का मुहूर्त देर रात गए निश्चित हुआ था और बारात देर से जानी थी। अत: डाक्टर और मेरा भाई रोज की तरह शराब पीने बैठ गए और इस शगल में उन्हें बहुत देर हो गई।
ग्यारह बजने को थे कि मैं उनके पास गई और कहा, ”डाक्टर साहब, ग्यारह बजने वाले हैं। आपको विवाह के लिए तैयार होना चाहिए।” वे कुछ हद तक सचेत हो गए और बोले, ”अभी होता हूं।”
वे फिर से मेरे भाई के साथ बातों में तल्लीन हो गए और मैंने अवसर पाकर जहर की पुडिय़ा, जो मैंने दोपहर को डाक्टर की अनुपस्थिति में उनकी अलमारी से निकाली थी, उनके सामने रखे शराब के गिलास में डाल दी। कुछ ही देर में डाक्टर ने अपना गिलास खाली किया और दूल्हा बनने के लिए चले गए। मेरा भाई भी उनके साथ चला गया।”
”मैं अपने दो मंजिले कमरे में गई और नई बनारसी साड़ी पहनी। फिर मांग में सिंदूर भरकर सुहागन के वेश में बगीचे में चली गई जहां प्रतिदिन शाम को बैठा करती थी। उस समय चांदनी छिटकी हुई थी। हवा में सिहरन थी और चमेली की सुगन्ध ने बगीचे को महका दिया था। मैंने पुडिय़ा में बची जहरीली दवा निकाली और उसे मुंह में डाल लिया। थोड़ी देर में मेरा सिर चकराने लगा। आंखों के सामने अंधेरा छा गया। चांदनी मद्घम पड़ गई। धरती-आकाश, पेड़-पौधे और अब मेरा घर जहां मैं अपनी उम्र बिता रही थी,  सब धीरे-धीरे लुप्त होते हुए चले गए और मुझे मीठी नींद आ गई।”
”डेढ़ साल के बाद सुख के सपने से चौंकी तो मैंने क्या देखा कि तीन विद्यार्थी मेरी हड्डियों से डाक्टरी शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं और एक अध्यापक मेरी छाती की ओर बेंत से इशारा करके लड़कों को विभिन्न हड्डियों के नाम बताते हुए कर रहे हैं, ”यहां हृदय रहता है, जो विवाह और दु:ख के समय धड़कता है और यह वह स्थान है जहां युवावस्था में फूल खिलते हैं।” अच्छा अब मेरी कहानी समाप्त होती है। मैं विदा लेती हूं, तुम भी सो जाओ।”
बांग्ला से अनुवाद : रतन चंद ‘रत्नेश’

चित्रांकन : संदीप जोशी

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