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गुनाह के रास्ते चलता बचपन..---- जगदीश बाली

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जो हाथ गुरु से आशीर्वाद पाने के लिए उठने चाहिए, जिन हाथों को कलम थाम कर अपना भविष्य लिखना चाहिए, जिन हाथों में किताबें शोभा देती हैं, अगर उन हाथों में चाकू-बंदूकें आ जाएं तो हम कैसे समाज और राष्ट्र निर्माण की ओर बढ़ रहे हैं, हर कोई अंदाज़ा लगा सकता है। जिस नाज़ुक उम्र में व्यक्तित्व तराशा जाता है और भविष्य संवारा जाता है, अगर वो बचपन गुनाह के रास्ते पर चलने लगे, तो ज़रा सोचिए उस राष्ट्र का मुस्तकबिल क्या होगा। जिस ज्ञान के मंदिर में ज्ञान की लौ जलनी चाहिए, उस मुकद्दस जगह पर अगर गोलियों की आवाज़ें आए, हिंसा की चीख-पुकार सुनाई दे, तो सोचिए - हमारी अति स्वछंदवादी शिक्षा व्यवस्था किस ओर जा रही है। जिस छात्र को अध्यापक अनुशासन का पाठ पढ़ा कर सही राह दिखाता है, अगर वो हाथ उस अध्यापक के गले तक जा पहुंचे, तो हमारी ’गुरु कुम्हार शिष कुंभ’ वाली परंपरा का क्या? जहां आदर्श व्यक्तित्व के बीज बोए जाते हैं, वहां चाकूबाज़ व बंदूकची कातिल क्यॊं पैदा हो रहे हैं? अगर अपने शिष्य को सही राह दिखाना, पथभ्रष्ट होने से रोकना, गलती पर टोकना, उसे संस्कार और शिष्टाचार का सबक सिखाना गुरु के लिए अब गुनाह है, तो आखिर शिक्षक और शिक्षा के मंदिरों का औचित्य क्या है? जिस देश में शिष्य अपने गुरु को देवतुल्य मानता आया है, वहीं आज इस रिश्ते में इतनी तल्खी और हिकारत आ गयी है कि नौबत कत्ल तक पहुंच जाती है।

                      रचनाकार परिचय

जगदीश बाली हिमाचल प्रदेश शिक्षा विभाग में स्‍कूल स्‍तर पर अंग्रेजी के प्राध्‍यापक के पद पर कुमारसैन में  कार्यरत है। समसामायिक विषयों पर लेखन के साथ साथ उनकी दो पुस्‍तकें The Spark is within You और चल चला चल आ चुकी है। 
अभी गुड़गांव के रेयान इं‍टरनेशनल स्‍कूल में 11वी कक्षा के छात्र द्वारा दूसरी कक्षा के छात्र प्रद्युम्‍न की हत्या की सिहरन ताज़ा  ही थी, कि अब दिल दहला देने घटना सामने आई है। चंद रोज़ पहले यमुनानगर के स्वामी विवेकानंद स्कूल में 12वी कक्षा के एक छात्र ने पैरैंट्स टीचर मीटिंग के दौरान ही स्कूल प्रिंसिपल की अपने पिता की रिवॉलवर से गोली मार कर कर हत्या कर दी। त्रिवैनी नगर के ब्राइटलेंड स्कूल मे भी पहली कक्षा के छात्र पर चाकू से हमला कर घायल करने का मामला सामने आया है। पिछले वर्ष दिल्ली के सुलतानपुरी इलाके के एक सरकारी स्कूल में अध्यापक का उसके ही शिष्य ने कत्ल कर दिया था। दिसंबर 2014 में झारखंड के एक स्कूल के सातवी कक्षा के तीन छात्रों ने अपने अध्यापक को इसलिए मार डाला क्योंकि उक्त अध्यापक ने उन्हें धुम्रपान न करने की सलाह दी थी। फ़रवरी 2012 में चिन्नई के एक स्कूल में नवी कक्षा के छात्र ने चाकू से अपने अध्यापक की जान ले ली। हमारे प्रदेश में भी इस तरह की घटनाएं होती आयी हैं। 14 दिसम्बर 1998 में अरसू के एक सरकारी स्कूल के नवी कक्षा के एक छात्र ने प्रधानाचार्य पर सरिये से वार किया जिसके कारण उनकी मौत हो गयी। पिछले वर्ष गंगथ के सरकारी स्कूल के एक छात्र ने सुबह-सवेरे स्कूल ग्राउंड में प्रधानाचार्य का गला पकड़ लिया था। उनकी गलती ये थी कि उन्होंने उस छात्र को एक विद्यार्थि की तरह अनुशासित होने की हिदायत दी थी। अध्यापकों से थप्पड़बाज़ी, गाली गलोज, बदसलूकी जैसी घटनाएं बढ़ती जा रही है। ज़ाहिर है कि धीरे-धीरे शिक्षण संस्थान अनुशासनहीनता, बदज़ुबानी, मारपीट, और हिंसा का केंद्र बनते जा रहे हैं। ये घटनाएं गुरु-शिष्य के बीच बिगड़ते रिश्ते की पराकाष्ठा है। यदि शिक्षण संस्थानों में ऐसा होता रहा, तो ऐसे असुरक्षित वातावरण में गुरु कैसे अपने कर्तब्य का निर्वाह कर पाएगा?
आखिर हमारे विद्यालयों में पढ़ रहे छात्र क्यों इतने हिंसक होते जा रहे हैं? मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि इस तरह की हिंसक घटनाओं का सबसे बड़ा कारण है गुरू-शिष्य-अध्यापक के बीच संवाद की कमी। गुरू-शिष्य कक्षाओं में मिलते तो हैं पर उनमें संवाद नहीं हो पाता। कई बार शिष्य गुरू की बात को नहीं समझ पाता, तो कई बार गुरू शिष्य तक नहीं पहुंच पाता। यही संवादहीनता मा-बाप और बच्चे के बीच में भी बनी रहती है। और कुंठित हो कर बच्चा गलत कदम उठाने पर उतारू हो जाता है।
मेरा मानना है कि अति स्व्छंदवाद भी छात्रों को पथ से भटका रहा है। अति सर्वत्र वर्जयेत अर्थात किसी भी चीज़ का आवश्यकता से अधिक होना नुकसानदेह होता है। अपने घर से ले कर विद्यालय तक वह अति स्वछंदवाद का शिकार होता जा रहा है। यह स्वछंदवाद उसके पहनावे, बात-चीत और व्यवहार में साफ़ झलकता है। उसकी वेश-भूषा को देख कर वह विद्यार्थी कम और फ़िल्मी हीरो ज़्यादा लगता है। जो पोशाक वह पहनता है, वो केवल रंग से ही स्कूल की वर्दी लगती है। तरह तरह के हेयर कट, कानों में बाली, बाज़ू में ब्रेसलैट, टाइट बॉटम पैंट, गले में चेन - ऐसा लगता है जैसे कोई मॉडल शूटिंग करने जा रहा है। उस पर तुर्रा ये कि अगर इस बावत अध्यापक उन्हें कुछ हिदायत दे या समझाए तो उनकी नज़रें गुरूजी की ओर तरेरी हो जाती हैं और और कई बार विभाग के आला अधिकारियों को शिकायत कर दी जाती है कि अध्यापकों ने ज़्यादती कर रखी है। अखबार में भी हैड्लाइन आ जाती है - छात्रों पर अध्यापकों का कहर, बाल कटवाए। कई बार वे इससे ज़्यादा भी कर लेते हैं, मार पीट और कत्ल भी। अब अध्यापक बेचारा करे तो क्या? उस पर बंदिशें लगाई जा रही है और विद्यार्थी मनमर्ज़ी करने के लिए स्वछंद है। इस उम्र में वह मन मर्ज़ी और विवेक में अंतर नहीं समझ पाता।
उधर अभिभावक और समाज ये समझने लगे हैं कि शिक्षक महज़ एक कर्मचारी है जिसे सरकार मोटी तनख्वाह दे रही है या वे मोटी रकम फीस के रूप में अदा कर रहे हैं। वे भूल गए हैं कि गुरु-शिष्य का रिश्ता ग्राहक और दुकानदार का पेशा नहीं है। शिक्षण के लिए शिष्य में ज्ञान प्राप्ति का जुनून व समर्पण की भावना होनी चाहिए और गुरु में अपने ध्येय के प्रति निष्ठा। अपने बच्चों के मन में शिक्षक के प्रति आदर-भाव भरने की बात तो दूर, आज अभिभावक उनकी शिकायत करने या उनके विरुद्ध मुकद्दमा दायर करने के लिए आतुर रहते हैं। ऐसी स्थिति में बच्चों में गुरु के लिए सम्मान की भावना कैसे विकसित होगी? ऐसे माहौल में गुरु और शिष्य के बीच में आत्मीयता नहीं रहती। किताबों की पढ़ाई किताबों से ही नहीं, बल्कि दिल से होती है। अध्यापक और शिष्य का रिश्ता वर्चस्व स्थापित करने का नहीं, बल्कि आपसी समझ का एक ज़हनी रिश्ता है।
घर बच्चे की पहली पाठशाला होती है और मा-बाप पहले अध्यापक। परन्तु कई मा-बाप अपने बच्चॊं के प्रति पोज़ेसिव होते हैं और उनकी हर उचित और अनुचित मांग को पूरा करने के लिए तैयार रहते हैं। बच्चों के मानस पटल पर इसका बहुत बार बुरा प्रभाव पड़ता है। वह ’नो’ सुनने के लिए तैयार नहीं हो पाता। कुछ माता-पिता ’बैस्ट पापा’ या ’बैस्ट मॉम’ कहलाने के चक्कर में अपने बच्चॊ की हर बात या मांग पर ’यैस’ कहने की होड़ में शामिल रहते हैं। इस होड़ में न माता-पिता, न ही बच्चे ये समझ पाते हैं कि ’नो’ शब्द की अहमियत कितनी है। ’यैस’ को सुनते-सुनते बच्चे को ’नो’ सुनना अखरने लगता है। उधर हमारी शिक्षा पद्धति ऐसी है कि बच्चा पढ़े चाहे न पढ़े उसे पास होना ही है। उसे लगता है कि गलत और सही से कोई फ़र्क नहीं पड़ता। ऐसे अति स्व्छंदवाद का जीवन जीते-जीते उसे अनुशासन में बंधना बोझ लगने लगता है। ’दरवाज़ा खुला है’ वाली निति पर चलते-चलते पता भी नहीं चलता कि बच्चा कब हाथ से निकल गया और राह से भटक गया। वास्तव में आज उचित समय पर कहा गया ’नो’ कल बच्चे के भविष्य के लिए ’यैस’ साबित होता है।
मा-बाप को याद रखना चाहिए कि एक चिंगारी को बुझाने के लिए चुल्लु भर पानी भी काफ़ी होता है, मगर जब वह ज्वाला बन जाए, तो दमकल विभाग का टनों पानी भी कुछ नहीं कर पाता। उठते ज़ख्म को वक्त पर दवा न मिले तो वह नासूर बन जाता है। बच्चे की बेहतर परवरिश के लिए डांट व दुलार, फ़टकार व तारीफ़, थपेड़े व पुचकार की ज़रूरत होती है, ताकि उसका विकास एकतरफ़ा न हो। शायर राहत इंदौरी ने सही फ़रमाया है:
नई हवाओं की सोहबत बिगाड़ देती है, कबूतरों को खुली छत बिगाड़ देती है.
जो जुर्म करते हैं इतने बुरे नही होते सज़ा ना देकर अदालत बिगाड़ देती है

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