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कहानी :अपराधिनी -- नन्द लाल भारती

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वैभव बाबू और गरिमा के पुत्र कनक का ब्याह
  अशुद्ध रतन  और अपवित्रा की बेटी आख्या के साथ बड़ी धूमधाम से सम्पन्न हुआ था । वैभवबाबू ने बेटे के ब्याह मे दिल खोल कर खर्च किया परन्तु दहेज एक पैसा नहीं लिये। हां   आख्या को दहेज मे एक बड़ी पीतल की परात और पांच तगारी फल के अलावा और कुछ नहीं मिला,गहना गुरिया तो अशुद्ध रतन के बूते की बात भी नहीं थी। शेखी ऐसी जैसे बावन बीघा पुदीना बोये हो। खैर वैभव बाबू को एक सुलक्षणा बहू चाहिए थी जो घर परिवार की जिम्मेदारी सम्भाल ले। वैभव बाबू दहेज न लेने की कसम तो कनक के जन्म के बाद ही ले लिए थे।

आख्या देखने तो आधुनिक लग रही थी पर उसने जो लक्षण दिखाये निहायत पारिवारिक थे। गरिमा को पूरा विश्वास हो गया कि आख्या के हाथ में परिवार और मर्यादा सुरक्षित रहेंगे। बातों पर यकीन कर वैभव और गरिमा ने हामी भर लिया था,और कनकबाबू ने भी अपनी सहमति की मुहर लगा दिया था।कनक को तो लगाना ही था अपनी सहमति की मुहर ।

 

आख्या से वैभव बाबू और उनके कुटुम्ब को बड़ी उम्मीदें थी। आख्या ने भी वादा किया था।आख्या के ब्याह के महीने भी नहीं बीते थे कि उसके सारे स्वांग धूल गए वह अपने असली रूप मे आ गई। सास-ससुर ननद-देवर पर इल्जाम लगाने लगी । राक्षसी प्रवृति वाली आख्या घर परिवार का चैन छिनने लगी । दो रोटी भी नहीं बनाती कहती मै सास-ससुर को रोटी बना कर खिलाने नहीं आयी हैं। जिस घर मे खुशियां थी अपराधिनी आख्या ने दर्द देना शुरू कर दिया। गरिमा की आंखें आंसुओं से लबालब भरी रहने लगी।आख्या आत्महत्या की धमकी देने लगी, वैभव बाबू का एच आई जी का मकान झोपड़ी लगे लगा।लाख रुपये महीना तनख्वाह पाने वाले वैभव भीखारी लगने लगे।

आख्या के पागलपन के दौरे से वैभव बाबू और गरिमा का जीवन महीने भर में नरक जैसा हो गया। आख्या को   ननद रोशनी और देवर चमन फूटी आंख नहीं भा रहे थे। समाज मे प्रतिष्ठित वैभव बाबू को भीखारी देवर को गुण्डा और ननद को चोरनी कहने लगी।

 

बेटी से बड़े तो आख्या के मां बाप बड़े डकैत निकले। घर परिवार अपराधिनी के आतंक मे जी रहा था। इसी बीच  अपराधिनी का बाप आया और वैभव बाबू से बिना किसी विमर्श के अपने साथ लेकर चला गया क्या भगा ले गया।

अशुद्ध रतन पागल बेटी को उसकी ससुराल से तो हांक ले गया।कनकबाबू पर दबाव डालकर हवाई जहाज की टिकटें बुक करवाया  पागल आख्या को लेकर अपने परिवार के साथ कनकबाबू के पास सिकन्दराबाद पहुंच गया। डकैत अशुद्ध रतन अब कनकबाबू को परिवार का विद्रोही बनाने की पाठशाला शुरू कर दिया जैसे आतंकवादी सरगना शरीफ परिवार के बच्चों को अगवा कर नक्सली बनाते हैं। हर तरह का टार्चर, दहेज के केस में पूरे परिवार को  जेल भेजवाने की धमकी के आगे कनक हार मान लिया। कनक जो आदर्श की प्रतिमूर्ति था वह अपराधी प्रवृति के सास ससुर अशुद्ध रतन,अपवित्रा पागल पत्नी के आगे घुटने टेक दिया।

 

आख्या थी तो ठग की पागल बेटी पर शौक बिगड़े रईसों की औलादों जैसा था।कनकबाबू का घर परिवार से रिश्ता तोड़वा चुकी आख्या को शापिंग करना बड़े बड़े होटलों मे खाना खाना और बिस्तर पर पड़े रहना उसकी आदत मे शुमार थे। ठग की बेटी को दस हजार से कम की पोशाक नहीं भाती, पांच -पांच हजार के ब्लाउज तक खरीदने मे जरा भी नहीं हिचकती, कनक का डेबिट और क्रेडिट कार्ड अपने कब्जे मे रखती।

 

कनक सीनियर इंजीनियर और आख्या शायद फर्जी डिग्रियों की मालकिन पति को घर परिवार से  अलग कर पति का खू़न पीने वाली अपराधिनी तनख्वाह मिलने से सप्ताह भर पहले कैकेयी बन जाती  । डकैतों के झुंड से घिरा कनकबाबू आख्या को समझाने की कोशिश करता पर पागल कहां समझने वाली पति को लूट कर ठग बाप की तिजोरी भरना ही उसके शादी का मूल उद्देश्य था। कनक ठगों के हाथ की कठपुतली बन चुका था। ना उसे पेट भर खाने को मिलता न पहनने को । 

मां-बाप को बेटा से दूरी बर्दाश्त नहीं हो रही थी। बेटा के वियोग मे गरिमा बिस्तर मे सिमट रही थी,वैभव बाबू भी बीमारियों के जाल में फंसते जा रहे थे। कनक से सम्पर्क करने की कोशिश करते तो वह ढंग से बात नहीं करता,इतने गंदे ताने मारता बातें कहता की कलेजा मुंह को आ जाता। 

 

अपराधिनी आख्या कनक के तन मन और धन पर पूरी तरह से कब्जा तो किए हुए उसके फोन पर आने वाली हर काल और किससे क्या बात हुई पूरा रिकॉर्ड रखती, खुद टार्चर करती उसका डकैत बाप भी धमकाता कहता बहुत परिवार वाले हुए हो। एक शरीफ मां बाप की शरीफ औलाद का जीवन अपने आर्थिक लाभ के लिये रिश्ता विरोधी डकैतों ने नरक बना दिया था।

 

अपराधिनी आख्या ने तिरिया चरित्र के भरोसे कनक को परिवार से अलग किया, उसकी कमाई पर फन काढकर बैठ गई ।कनक खुद की कमाई की दो रोटी चैन से खाने को तरस आ रहा था।

उधर ठग परिवार हवाई यात्राएं कर रहा था,जश्न मना रहा था एक मां -बाप के बुढापे की लाठी छिनकर,भाई का हौशला तोड़कर, बहन का गुमान भाई छिनकर। अपराधिनी बेसुध पति की कमाई छिनकर हफ्ता वसूली करने वाले डकैत मा -बाप और आधा दर्जन भाई बहनों पर लूटा रही थी  खुद के भविष्य से बेखबर। कनक बाबू के जूनियर क्लासमेट्स कार बंगला के मालिक बन चुके थे जबकि अधिक कमाई के बाद भी रोटी कपड़ा के लिए वह संघर्ष कर रहा था। अपराधिनी आख्या खुद के शौक और बाप की मदद करने के लिए अपने पति को अवसाद मे ढकेल रही थी,.डेबिट कार्ड के साथ क्रेडिट का भरपूर दुरुपयोग कर रही थी। कनक को धोबी का कुत्ता बनाकर छोड़ दी थी।कनक मां -बाप की समझाइश को लतिया कर ठगों के जाल मे बुरी तरह फंस चुका था।

 

मां-बाप लाचार आंसू बहा रहे थे।कनक डकैत सास ससुर और उनकी विक्षिप्त बेटी के हाथों की कठपुतली बना हुआ था। वैभव और गरिमा जब फोन करते तो रुष्ट हो जाता शायद फोन पर बात करने पर पाबंदी थी,कभी बात भी कर लेता कनक तो महाभारत हो जाती क्योंकि ठग की बेटी ने कोई ऐसा सिस्टम लगा रखा था जब कोई फोन करता तो अपराधिनी आख्या पूरी बात सुनती और कनक का जीना दुश्वार कर देती, उधर उसका गुण्डा बाप भी धमकाता, इतना ही नहीं वैभव बाबू और उसके परिवार को दहेज के केस मे जेल भेजवाने की  कत्ल करवाने की सुपारी देने की धमकी भी देता। एक बेटी के बाप की इतनी दबंगई, कहते हैं ना अपना ही सिक्का खोटा हो तो कोई भी कुछ कह और कर सकता है।

 

कनक विषधर मां बाप की विषकन्या के मोहफांस मे मां- बाप के अरमानों का स्वाहा तो कर ही दिया था पर खुद भी सुखी और सुरक्षित नहीं था। कनक के लाचार मां-बाप के सामने परमात्मा की आराधना के अलावा कोई रास्ता भी न था। मां-बाप का दिल कहा मानता है बेटे के वियोग मे मरे जा रहे थे। कनक मां बाप भाई बहनों के सामने शेर की तरह दहाड़ता था ठग बाप की बेटी और उसके खूनी मां-बाप के सामने भीगी बिल्ली हो चुका था। अनजाने मे डकैत की बेटी से ब्याह क्या हुआ जीवन के अरमान ठगों ने लूट लिए ।

 

कभी -कभी कनक चोरी छिपे किसी दूसरे के फोन से बात करता, कनक का दुःख सुनकर कलेजा मुंह मे आ जाता। इस सब के लिए वह खुद ही जिम्मेदार था। डकैतों की बात मे आकर घर आना भी छोड़ दिया,विषकन्या के इश्क ने भाई बहन तक को दुश्मन बना दिया था।इकलौती बहन से राखी बंधवाने की याद न आती ।काश मां बाप की समझाइश पर गौर कर लिया होता तो इतने बुरे दिन नहीं देखने पड़ते।

 

आख्या के मां बाप खुद वैभवबाबू के घर आये थे,शराफत और संस्कार का उच्चतम प्रदर्शन किया।आख्या ने भी सभ्यता, संस्कृति और पारिवारिक जिम्मेदारियों का इतना श्रेष्ठतम प्रदर्शन किया की किसी को तनिक भी शक नहीं हुआ। आसपड़ोस की कई माताओं-बहनों ने भी बहुत तारीफ किए और यह भी कहा कि गरिमा तुम्हारे भाग्य बहुत प्रबल हैं लक्ष्मी,सरस्वती और अन्नपूर्णा की प्रति मूर्ति आख्या तुम्हारे घर चलकर आयी है, बहू बना लो । किसी को क्या पता थी कि आख्या डकैत मां-बाप की लिखी कहानी का सजीव मंचन कर रही है।

 

ब्याह पर कानूनी मुहर लगते ही ठग की बेटी अपने असली कैकेयी के रौद्र रुप मे आ गई थी। धीरे धीरे कई साल बीत पर आख्या की प्रेतात्मा मे वैवाहिक जीवन की दृष्टि से देवत्व का विकास नहीं हुआ।वह नरभक्षी की तरह पति को नोंच नोंच कर अपने मां बाप को अमीर बना रही थी खुद की गृहस्थी से बेखबर ।

 

इसी बीच आख्या गर्भवती भी हो गई जिसकी सूचना चोरी छिपे कनक ने दिया था।कुछ महीनों के बाद कनक का विदेश जाना हुआ जिसकी भनक वैभव बाबू को नहीं लगने दी गई। कनक विदेश उड़ान भरने के पहले अपनी मां गरिमा को बताया तब जाकर पता चला। इतनी बड़ी खुशी आख्या ने कनक के परिवार से छिन ली । देर से ही सही खुशी का समाचार सुनते ही वैभवबाबू ने बेटे कनक को फोन लगाया तब कनक की फ्लाइट दुबई एअरपोर्ट पर थी वहां से दूसरी फ्लाइट पकड़ना था।वैभव बाबू ने कनक को जी भर कर दुआएं और शुभकामनाएं दिये। फ्लाइट का समय हो गया था....हैप्पी जरनी कहते ही फोन डिसकनेक्ट हो गया।

 

उधर आख्या अपने डकैत मां बाप और भाई बहनों के साथ लूट का माल लेकर मायके पहुंच गई। कनक बाप भी बन गया जिसकी खबर ठग अशुद्ध रतन ने नहीं दिया।अब ठगों के हाथ कनक को लूटने का पख्ता मोहरा  कुलदीपक आ गया। कनक विदेश की मियाद पूरी होते ही सीधे ससुराल कानपुर पहुंचा महीनों ससुराल मे रुका पर घर आने की सुधि नहीं आई या ठगों की डर से घर की तरफ रुख नहीं किया। सीधे लूटेरा परिवार से विदा होकर आख्या और कुलदीपक को लेकर सिकन्दराबाद की  उड़ान भर लिया ।आख्या ने बेटा पैदा करने की कीमत दस लाख कनक से लूटकर डकैत मां बाप की झोली मे डाल दी। बेचारा कनक निरीह सा देखता रह गया। कनक के मां बाप कुटुम्ब परिवार राह ताकते ही रह गये।भाई का हौसला, बहन की राखी,बूढ़े मां-बाप के अरमानों का आसमान अशुद्ध रतन और उसकी जादूगर पत्नी ने छल से छिन लिया था। वैभव बाबू और गरिमा दुखी तो बहुत थे पर बेटे के लौटने की उम्मीद बलवंत थी।

 

सेरोगेट मां आख्या अपने ही तन से पैदा किये कुलदीपक को छाती का दूध नहीं पी लायी नहीं कभी डरायपर बदली नौकरी के साथ घर का काम बच्चे की देखरेख सब कनक के जिम्मे था। कनक ही कुलदीपक का बाप और मां दोनों था। कनक के जबान पर जैसे ही मां बाप का नाम आता चोर की बेटी कनक का जीना हराम कर देती उपर से उसके डकैत मां बाप दहेज के केस मे पूरे परिवार को जेल भेजवाने की धमकी देते । हाफमाइण्ड हाफ ब्लाइण्ड पत्नी द्वारा पीडित कनक के आगे विरान ठहरा हुआ था। उसे अपनी गलती का एहसास होने लगा था। मां बाप के दुख से चिन्तित तो था पर बेबस।

 

ठग अशुद्धरतन खुद और  अपनी बेटी  आख्या  द्वारा दादा ससुर की मौत,सास के कई बार सीरियस होने पर हास्फिटलाइजेशन, सांप डंसने, हफ्तों जीवन के लिए संघर्षरत रहने, ससुर के कोरोना जैसी मौत के मुंह मे फंसे होने के वक्त एवं अन्य बुरे वक्त मे बहिष्कार करवा दिया सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए ।

 

पत्नी पीड़ित कनक के पांव के नीचे की जमीन तब खिसक गई जब बेशर्म अशुद्धरतन ने अपने बच्चों की पढाई और उनके शादी-ब्याह की जिम्मेदारी कनकबाबू के कंधों पर डालने पर जोर देने लगा । कनक की अचेतन अवस्था तो टूटी पर ठग की बेटी का जुल्म बढ़ गया।ठग की बेटी की निगाहें कनक की कमाई के साथ उसके बाप की चल-अचल सम्पत्ति पर भी ठहरी हुई थी। लाचार को विचार क्या पुत्रमोह में ठग की बेटी आख्या की शर्तों पर जीने को बेबस हो गया । कनक जरा भी आनाकानी करता तो अपराधिनी कालोनी की घर बिगाड़ू महिलाओं को बुलाकर जुलूस निकलवा।ये महिलाएं  पत्नी पीड़ित कनक की एक ना सुनती ,उसे और उसके मां बाप बहू उत्पीड़न का आरोप लगाती ।

 

कनक के माता पिता के सामने अंधेरा पसरा हुआ था,आंखें डबडबाई हुई थी पर उन्हें उम्मीद थी कि उनके जीवन और परिवार के अच्छे दिन आयेंगे ।

उधर ठग अशुद्धरतन  और उसका परिवार दमाद को प्रताड़ित कर उसकी कमाई पर डांका डाल रहा था । बेटी के बूढ़े सास-ससुर की लाठी छिनवाकर, देवर का हौसला तोड़वाकर,ननद के राखी बांधने के हक को मारवाकर बेटी का भविष्य लूटकर,परिवार की उम्मीदें लूटकर अपनी ही बेटी आख्या का घर उजाड़ रहा था अपनी ही हाफमाइण्ड हाफब्लाइण्ड बेटी आख्या को अपराधिनी बनाकर ।

 

डां नन्द लाल भारती

 

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