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रुबल नहीं आया -- जगदीश बाली

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 कहानी


मंगलू चाचा का मकान गांव में से गुज़रते रास्ते से सटा हुआ था। मिट्टी, कंकर-पत्थर से बना मकान था। छत बड़ी-बड़ी अलग-अलग आकार की स्लेटों को बेतरतीब जोड़कर बनी थी। बस दो मंज़िलें थी- धरातल और ऊपर वाली मंज़िल। ऊपर की मंजिल के आगे लकड़ी के तख्तों का खुला बरामदा था। बरामदे में एक चौरस खोल था। बरामदे में आने-जाने के लिए इस खोल से एक तंग लकड़ी की सीढ़ी लगी थी। इस सीढ़ी पर सर झुका के चढ़ना-उतरना पड़ता था। निचली मंजिल में तीन कमरे थे जिनकी ऊंचाई छ-सात फ़ुट के आसपास थी। मंगलू खेती बाड़ी करता था और एक कमरे में उसके बैल बंधे होते थे। दूसरे कमरे में चाचा की रसोई थी। तीसरे कमरे में चाचा की छोटी सी दुकान थी। ऊपर के कमरों में चाचा और उसका बेटा रुबल सोते थे। एक कमरा मेहमानों के लिए भी था। एक छोटी सी दुकान चलाते थे मंगलू चाचा। खेतों में काम न होता, तो चाचा बरामदे में बैठते और ग्राहक आने पर उतर कर दुकान पर आ जाते। चाचा बीड़ी-तंबाकू बेचते थे। साथ में बच्चों के लिए टॉफी और छोटी-छोटी मीठी गोल-गोल गोलियां भी, जिन्हें हम अंग्रेज़ी मिठाई कहते थे, रखी रहती थी। 10 पैसे में 9 आ जाती थीं। मंगलू चाचा कभी-कभी 10 भी दे दिया करते थे। दुकान पर कंचे और गुड़ भी रखा रहता था। गांव के बच्चे कंचे खरीद कर निकट ही खेला करते थे और गुड़ का आंनद भी लेते। उस ज़माने में गुड़ किसी शाही मिठाई से कम न होता था। बच्चे गुड़ को बड़े चाव व खुशी से एक दूसरों को चिढ़ा-चिढ़ा कर चाटते और खाते। बस इतना सा सामान बेचते थे मंगलू चाचा। कमाते कुछ नहीं थे, न कमाने का लालच था उनमें। लोगों व बच्चों का आना-जाना लगा रहता। मंगलू का एक बेटा था। रुबल नाम था उसका। रूबल को जन्म देते समय मंगलू की पत्नी की मौत हो गई थी। पत्नी की मौत पर बहुत रोया था मंगलू। पर इसे नियति मान कर मंगलू बहुत लाड़-प्यार से रूबल को पाल-पोस रहा था। यूं कहिए रूबल के लिए मंगलू मा-बाप दोनों थे। वो बड़े शौक से उसे पढ़ा लिखा रहे थे। अगले वर्ष उसे डॉक्टर बनने शहर भेजना चाहते था। मंगलू राह गुज़रते लोगों को राम-राम कहते और थोड़ी घड़ी बैठने का इसरार ज़रूर करते। कहते, "अरे काम वाम तो होता रहेगा। तनिक बैठ कर कुछ गप-शाप करते हैं।" वो उन्हें चाय, बीड़ी, तंबाकू भी पेश करते। किसी को रुपए-पैसों की ज़रूरत होती तो चाचा तुरंत दे देते। मंगलू को यह सब बहुत अच्छा लगता। ये सब करने के बाद उनके दिल को सकून मिलता और चेहरे पर संतोष की आभा झलकती। राह से गुजरने वाला हर कोई मंगलू की आओभगत, अपनेपन व स्नेह के कायल थे। एक बार जब चाचा बीमार हुए थे, तो पूरा गांव खड़ा हुआ था उनकी तीमारदारी के लिए। चाचा खेती-बाड़ी भी करते थे। घर की ड्योढ़ी के साथ मंगलू चाचा ने एक पोस्टर मेख से फंसा कर लटका रखा था। इस पोस्टर में एक स्त्री हाथ जोड़ कर खड़ी दिखती थी और इस पर 'स्वागतम' लिखा होता-  मंगलू की स्नेहशीलता और आओभगत से बिल्कुल मिलता जुलता पोस्टर। 

रूबल ने 12वी कक्षा अच्छे अंको में पास कर ली। पूरे 90 प्रतिशत अंक लिए थे उसने। मंगलू बहुत खुश था। उसे अपना सपना साकार होते दिख रहा था। उसने रूबल को प्री-मेडिकल टैस्ट की कोचिंग के लिए चंडीगढ़ भेज दिया। रूबल ने यह टैस्ट पास किया और उसे इंदिरा गांधी मैडिकल कॉलेज शिमला में दाखिला मिल गया। इधर रूबल डॉक्टरी का कोर्स पूरा करने के लिए मेहनत कर रहा था और उधर मंगलू चाचा उसके डॉक्टर बनने की बाट जोह रहे था। वह छाती-फैला कर कहता, 'अपना बेटा डॉक्टर बनेगा। देखना मुझे बुढ़ापे में भी बीमार न होने देगा।' रूबल ने डॉक्टरी का कोर्स पूरा किया। जब वह घर आया था, तो पूरा गांव उसे देखने के लिए उमड़ पड़ा था। आखिर गांव का पहला डॉक्टर था रुबल। सब कहते, "भई मंगलू चाचा की तपस्या रंग लाई। कोई कमी न रखी है उसने बेटे की परवरिश व लिखाई- पढ़ाई में।" ऐसा लगा जैसे रूबल मंगलू चाचा का ही नहीं, बल्कि पूरे गांव का बेटा है।

रुबल शहर से अपने बाबा के लिए एक सैल फोन भी लेता आया था। गांव में यह नई चीज थी। उसने चाचा को इसका इस्तेमाल करना भी सीखा दिया।

रूबल जब शहर जाने लगा, तो मंगलू चाचा से बोला, "बाबा मैं अमेरिका जा कर डॉक्टरी का पेशा करना चाहता हूं। वहां बहुत पैसा है।" यह सुन कर चाचा चुप हो गए। सोचने लगे कि बेटा अमेरिका चला जाएगा, तो वो बिल्कुल अकेले हो जाएंगे। रूबल समझ गया। वह बोला, "बाबा, चिंता मत करो। तीन-चार साल में लौट आउंगा। तब तक काफी पैसा कमा लूंगा। हर महीने तुमको फोन करता रहूंगा और हर साल आता रहूंगा। लौट कर यहीं डॉक्टरी करूंगा।' चाचा कुछ देर कुछ न बोले। फिर मुकुराते हुए कहने लगे, "ठीक है बेटा। कुछ सालों की तो बात है।" रूबल शहर चला गया। कुछ दिनों बाद उसे अमेरिका से ऑफर भी आ गया। रूबल अब अमेरिका में डॉक्टरी कर रहा था। उधर मंगलू चाचा गांव में अपना खेती बाड़ी का काम करते रहे और दुकान भी चलाते रहे। रूबल का फोन पहले तीन-चार महीने तो लगातार आते रहे। फिर फोन का सिलसिला कम होने लगा। एक साल बाद फोन आने लगभग बंद हो गए। एक दिन रूबल का व्हाट्सएप पर मैसेज आया, "बाबा मेरी शादी की चिंता न करना। मैने शादी कर ली है।" अपनी गोरी मैम साहिबा का फोटो भी भेजा था उसने। चाचा बहुत दुखी हुए थे उस दिन। रूबल ने पहले बताया तक नहीं शादी के बारे में। चाचा खुद को दिलासा देते रहे और मन को मनाते रहे, 'वक्त ही नहीं मिला होगा बताने का। व्यस्त जो इतना रहता है।'

पर मन ही मन बहुत दुखी रहने लगे थे चाचा। लोग रूबल के बारे में पूछते तो अपना दुख छुपाते हुए कहते, "बस आने ही वाला है कुछ हफ्तों में।" फिर एक दिन अचानक मंगलू चाचा बिमार हो गए। बेटे को सूचना भेजी गई, पर जवाब आया, "अभी छुट्टी नहीं है। नज़दीक के किसी डॉक्टर को दिखा लो।" यह जवाब पा कर पूरा गांव सन्न था। सब आपस में बुदबुदाते, "सोचा न था मंगलू का रूबल भी ऐसा निकलेगा। ये है आज के वच्चों को पढ़ाने-लिखाने का नतीज़ा। इससे अच्छे तो हम रहे भैया। पढ़ा न सके अपने बच्चों को, पर हैं तो हमारे पास ही न। दुख-सुख में साथ तो हैं।" जब रूबल नहीं आया' तो गांव वाले मंगलू चाचा को शहर के डॉक्टर के पास ले गए। मंगलू को ट्यूमर हो गया था। ट्यूमर अंतिम स्टेज पर था। डॉक्टर ने कह दिया, "बचना मुश्किल है। घर पर ही सेवा करो।" गांव वाले मंगलू को घर ले गए। खूब तीमारदारी की थी गांव वालों ने मंगलू चाचा की। फिर एक सुबह मंगलू चाचा ये कहते हुए चल बसे, "मेरा रूबल नहीं आया।" रूबल को उसके पिता के देहांत की खबर दे दी गई। इस बीच गांव वाले मंगलू चाचा के दाह संस्कार की तैयारी करने लगे। एक दूसरे से कहते, "पता नहीं भैया रुबल आता भी है या नहीं।" उधर मंगलू चाचा की अर्थी अपने बेटे के कंधों का इंतज़ार कर रही थी। खैर गांव वाले मंगलू चाचा की अर्थी ले कर शमशान घाट की ओर चल पड़े। एक के बाद एक कंधा अर्थी को कंधा देने आ रहा था, परंतु जिन कंधों को होना चाहिए था, वे अभी कहीं और व्यस्त थे। चाचा की अर्थी को चिता पर लिटा दिया गया और जल्द ही उनका मृत शरीर पंच तत्वों में विलीन हो गया। गांव वाले अस्थियों को इकट्ठा कर रहे थे ताकि गंगा में बहायी जा सके। तभी रूबल अपनी मैम साहिबा के साथ पहुंचता है। उन्हें देख अस्थियां इकट्ठा कर रहे दो-तीन गांव वाले कहने लगे, "आ गए बेटा। तुम्हारे बाबा तो रहे नहीं, बस उनकी अस्थियां बची हैं। वक्त है तुम्हारे पास इन्हें गंगा में बहाने का?" रुबल अस्थियां ले लेता है, पर कोई जवाब नहीं दे पाता। गांव वाले मंगलू चाचा का क्रिया-कर्म सब पूरे विधी-विधान व शास्त्रानुसार करते हैं। रुबल अस्थियां गंगा में बहाने के बाद गांव आता है। उसके साथ शहर का एक  बड़ा 

प्रॉपर्टी डीलर भी आता है। रुबल चाचा की सारी ज़मीन व पुश्तैनी घर उसे बेच देता है।  प्रॉपर्टी डीलर उसे 50 लाख का चैक देता है। इन्हीं 50 लाख में कहीं पुश्तैनी संस्कार व जज़्बात भी बिक जाते हैं। चाचा के खेतों की जगह अब बहुत बड़ा फार्म हाउस है। पुराने मिट्टी के घर की जगह एक आलीशान भवन है जिसके गेट पर 'स्वागतम' करती महिला के पोस्टर की जगह एक लोहे की तख्ती लटकी है, जिस पर लिखा है "कुत्तों से सावधान।"

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